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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 14

अध्याय 16 · श्लोक 14

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि | ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी || १४||

asau mayā hataḥ śatrur haniṣye cāparān api | īśvaro 'ham ahaṃ bhogī siddho 'haṃ balavān sukhī ||14||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

असौ: वह; मया: मेरे द्वारा; हत: मारा गया; शत्रु: शत्रु; हनिष्ये: मारूँगा; च: और; अपरान्: दूसरों को; अपि: भी; ईश्वर: ईश्वर (स्वामी); अहम्: मैं; अहम्: मैं; भोगी: भोगी; सिद्ध: सिद्ध; अहम्: मैं; बलवान्: बलवान्; सुखी: सुखी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया, और दूसरों को भी मारूँगा। मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, बलवान् हूँ और सुखी हूँ।

English Translation

I have slain this enemy, and I shall slay others also. I am the lord, I am the enjoyer, I am perfect, powerful and happy.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आसुरी व्यक्ति अपने को सर्वश्रेष्ठ मानता है। वह सोचता है कि वही ईश्वर है, वही भोगी है, वही सिद्ध है। यह अहंकार का चरम है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।