दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 14

श्लोक १४ में आसुरी व्यक्ति का घोर अहंकार: मैंने शत्रु मारा, मैं ईश्वर हूँ, भोगी, सिद्ध, बलवान, सुखी।

संस्कृत श्लोक

असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि | ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी || १४||

asau mayā hataḥ śatrur haniṣye cāparān api | īśvaro 'ham ahaṃ bhogī siddho 'haṃ balavān sukhī ||14||

पदच्छेद / शब्दार्थ

असौ: वह; मया: मेरे द्वारा; हत: मारा गया; शत्रु: शत्रु; हनिष्ये: मारूँगा; च: और; अपरान्: दूसरों को; अपि: भी; ईश्वर: ईश्वर (स्वामी); अहम्: मैं; अहम्: मैं; भोगी: भोगी; सिद्ध: सिद्ध; अहम्: मैं; बलवान्: बलवान्; सुखी: सुखी।

हिंदी अनुवाद

वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया, और दूसरों को भी मारूँगा। मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, बलवान् हूँ और सुखी हूँ।

English Translation

I have slain this enemy, and I shall slay others also. I am the lord, I am the enjoyer, I am perfect, powerful and happy.

टीका / Commentary

आसुरी व्यक्ति अपने को सर्वश्रेष्ठ मानता है। वह सोचता है कि वही ईश्वर है, वही भोगी है, वही सिद्ध है। यह अहंकार का चरम है।