श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 13

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 22 मिनट का पठन 150 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् | इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् || १३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
इदम्
यह
अद्य
आज
मया
मेरे द्वारा
लब्धम्
प्राप्त किया
इमम्
यह
प्राप्स्ये
प्राप्त करूँगा
मनोरथम्
मनोरथ
इदम्
यह
अस्ति
है
इदम्
यह
अपि
भी
मे
मेरा
भविष्यति
होगा
पुन
फिर
धनम्
धन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैंने आज यह प्राप्त कर लिया, अब उस मनोरथ को प्राप्त करूँगा। यह धन मेरे पास है, और यह भी मुझे भविष्य में मिलेगा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने 'दैवी' और 'आसुरी' संपदाओं का विस्तृत वर्णन किया है। यह श्लोक (१६.१३) आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य की उस मानसिक अवस्था को उद्घाटित करता है, जो निरंतर अतृप्ति, अहंकार और भविष्य की चिंता में डूबी रहती है। भारतीय दर्शन में 'आसुरी' का अर्थ केवल राक्षसी प्रवृत्ति नहीं, बल्कि वह अज्ञान है जो मनुष्य को ईश्वर से विमुख कर केवल भौतिकता के जाल में फँसा देता है।

जब मनुष्य यह सोचने लगता है कि "मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अपनी इच्छाओं के बल पर मैं भविष्य में और भी बहुत कुछ प्राप्त कर लूँगा," तब वह काल के चक्र को भूल जाता है। यह श्लोक हमें उस 'तृष्णा' के बारे में सचेत करता है जो कभी समाप्त नहीं होती। ब्रह्मांडीय दृष्टि से, यह श्लोक अहंकार के उस सूक्ष्म स्तर को दर्शाता है जहाँ जीव स्वयं को 'कर्ता' मान बैठता है। जबकि सत्य यह है कि प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के अधीन होकर ही मनुष्य कर्म करता है। इस श्लोक का अध्ययन हमें आत्म-निरीक्षण का अवसर देता है ताकि हम अपनी चेतना को भौतिक संग्रह से हटाकर आत्म-साक्षात्कार की ओर मोड़ सकें। यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक दर्पण है जो हमें हमारे भीतर छिपे उस लोभी अहंकार को देखने की दृष्टि प्रदान करता है, जो हमें शांति से दूर ले जाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् |
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् || १३ ||

इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह श्लोक आसुरी स्वभाव की निंदा करने के लिए है, न कि उसे अपनाने के लिए। इसका पठन हमें 'अपरिग्रह' (संग्रह न करने) के महत्व को समझने में सहायता करता है। प्रतिदिन गीता के १६वें अध्याय का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर 'दंभ', 'दर्प' और 'अभिमान' का नाश होता है। इस श्लोक को पढ़ते समय मन में यह संकल्प होना चाहिए कि "हे प्रभु, मैं अपनी उपलब्धियों का स्वामी नहीं, बल्कि आपका सेवक हूँ।" यह विधि साधक को अहंकार के उस दलदल से बाहर निकालती है जहाँ वह स्वयं को ही सब कुछ मान बैठता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
इदमद्यआज यहवर्तमान क्षण की उपलब्धि का अहंकार।
मया लब्धम्मेरे द्वारा प्राप्त किया गयास्वयं को कर्ता मानने का भ्रम।
इमं प्राप्स्येइसे प्राप्त करूँगाभविष्य की अतृप्त इच्छाओं का जाल।
मनोरथम्मन की कामनामाया के अधीन होकर रची गई योजनाएँ।
इदमस्तियह मेरे पास हैपदार्थों के प्रति आसक्ति और स्वामित्व।
इदमपियह भीसंग्रह करने की निरंतर बढ़ती भूख।
मे भविष्यतिमेरे पास होगाअनिश्चित भविष्य के प्रति असुरक्षा।
पुनर्धनम्और भी धनभौतिकता की कभी न समाप्त होने वाली दौड़।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है। जब अर्जुन विषाद में थे, तब भगवान ने उन्हें दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों के बीच का अंतर समझाया। पौराणिक संदर्भों में, हिरण्यकशिपु और रावण जैसे पात्रों का चरित्र इसी आसुरी वृत्ति का चरम उदाहरण है। रावण के पास सोने की लंका थी, फिर भी उसे और अधिक की लालसा थी। यह श्लोक उसी 'रावणत्व' को परिभाषित करता है जो मनुष्य के भीतर हर पल जन्म लेता है।

वेदों में 'ऋत' (ब्रह्मांडीय व्यवस्था) की बात कही गई है। जब मनुष्य अपनी इच्छाओं को इस व्यवस्था से ऊपर रखने का प्रयास करता है, तो वह आसुरी मार्ग पर अग्रसर होता है। महाभारत के युद्ध में दुर्योधन का चरित्र इसी श्लोक का जीवंत चित्रण है। दुर्योधन को लगता था कि उसने आज पांडवों को वन भेज दिया है, कल वह उन्हें पूरी तरह मिटा देगा और हस्तिनापुर का धन उसका होगा। यह 'इदमद्य मया लब्धम्' की भावना ही अंततः उसके विनाश का कारण बनी। शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति यह मान लेता है कि सब कुछ ईश्वर का है, वह इस आसुरी चक्र से मुक्त हो जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि धन का आना-जाना प्रकृति का नियम है, लेकिन उस पर अहंकार करना अज्ञानता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का शमन: इस श्लोक के अर्थ पर चिंतन करने से व्यक्ति के भीतर का 'मैं' धीरे-धीरे कम होने लगता है।
  • मानसिक शांति: भविष्य की चिंता (जो इस श्लोक में वर्णित है) से मुक्ति मिलती है और वर्तमान में जीने की कला आती है।
  • संतोष की प्राप्ति: 'इदमस्ती' के मोह से ऊपर उठकर साधक संतोष का अनुभव करता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): आसुरी विचारों का त्याग करने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में सात्विक चमक आती है।
  • कर्मिक शुद्धि: जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हम केवल निमित्त मात्र हैं, तो हमारे कर्मों का फल हमें नहीं बाँधता।
  • ईश्वरीय शरणागति: यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि सब कुछ प्रभु की इच्छा से हो रहा है।
  • तनाव से मुक्ति: संग्रह करने की होड़ से मुक्ति मिलने पर मानसिक तनाव स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • विवेक की जागृति: यह श्लोक हमें यह पहचानने की शक्ति देता है कि क्या हमारे लिए श्रेयस्कर है और क्या प्रेयस्कर।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के १६वें अध्याय (दैवासुरसंपद्विभागयोग) के प्रामाणिक भाष्यों, विशेषकर आदि शंकराचार्य और स्वामी रामसुखदास जी की व्याख्याओं के आधार पर संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को केवल श्लोक का अर्थ बताना नहीं, बल्कि उसके पीछे के मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य से परिचित कराना है। यह लेख पूर्णतः शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करते हुए तैयार किया गया है ताकि साधक को सही दिशा मिल सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, धन कमाना आसुरी वृत्ति नहीं है। आसुरी वृत्ति तब होती है जब धन को ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य मान लिया जाए और उसके लिए अधर्म का मार्ग अपनाया जाए।

योजना बनाना कर्म का हिस्सा है, लेकिन उस पर अहंकार करना और यह सोचना कि "मैं ही सब कुछ करूँगा," आसुरी वृत्ति है। योजनाएँ ईश्वर के अधीन होनी चाहिए।

यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हम जो भी प्राप्त कर रहे हैं, वह ईश्वर की कृपा है। यह हमें विनम्र रहने और संग्रह की प्रवृत्ति को नियंत्रित करने में मदद करता है।

नियमित स्वाध्याय, सत्संग, और निष्काम कर्म योग का अभ्यास करने से आसुरी प्रवृत्तियों का नाश होता है।

नहीं, यह श्लोक किसी भी प्रकार की भौतिक उपलब्धि, पद, प्रतिष्ठा और अहंकार के प्रति लागू होता है। यह हर उस चीज़ के लिए है जिसे हम अपना मानकर गर्व करते हैं।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आसुरी व्यक्ति सोचता है: "मैंने आज यह प्राप्त कर लिया, अब उस मनोरथ को प्राप्त करूँगा। यह धन मेरे पास है, और यह भी भविष्य में मेरा होगा।"

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह अहंकार और ममता का सूचक है। वास्तविक सुख तो ईश्वर में समर्पण से मिलता है, न कि संग्रह से।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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