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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 8

अध्याय 11 · श्लोक 8

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८॥

na tu māṃ śakyase draṣṭum anenaiva sva-cakṣuṣā | divyaṃ dadāmi te cakṣuḥ paśya me yogam aiśvaram ||8||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; तु: परन्तु; माम्: मुझे; शक्यसे: तू समर्थ है; द्रष्टुम्: देखने में; अनेन: इस; एव: ही; स्वचक्षुषा: अपनी आँखों से; दिव्यम्: दिव्य; ददामि: देता हूँ; ते: तुझे; चक्षुः: नेत्र; पश्य: देख; मे: मेरा; योगम्: योग; ऐश्वरम्: ऐश्वर्यमय।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

परन्तु तू अपनी इन आँखों से मुझे नहीं देख सकता; इसलिए मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ। तू मेरे ऐश्वर्यमय योग को देख।

English Translation

But you cannot see Me with your present eyes; therefore I give you divine eyes. Behold My divine power!

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं क्योंकि साधारण नेत्रों से विराट रूप के दर्शन संभव नहीं हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।