मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदइह
यहाँ
एकस्थम्
एक ही स्थान पर स्थित
जगत्
जगत्
कृत्स्नम्
सम्पूर्ण
पश्य
देख
अद्य
अब
सचराचरम्
चर और अचर सहित
मम
मेरे
देहे
शरीर में
गुडाकेश
हे गुडाकेश
यत्
जो
च
और
अन्यत्
अन्य
द्रष्टुम्
देखना
इच्छसि
तुम चाहते हो।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे गुडाकेश, अब तू मेरे इस शरीर में सम्पूर्ण चर-अचर सहित समस्त जगत् को एक साथ देख तथा और भी जो कुछ तू देखना चाहता है, उसे देख।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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भूमिका एवं ब्रह्मांडीय महत्ता
सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान श्रीमद्भगवद्गीता केवल रणक्षेत्र में दिया गया उपदेश मात्र नहीं है, अपितु यह मानव मात्र के लिए भवसागर से तरने का अचूक मार्गदर्शक है। जब हम गीता के एकादश अध्याय यानी 'विश्वरूपदर्शनयोग' की गहराई में उतरते हैं, तो हमें उस असीम, अनंत और अविनाशी ब्रह्म के दर्शन होते हैं, जो सम्पूर्ण चराचर जगत का आधार है। प्रस्तुत श्लोक—"इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७॥"—उस ऐतिहासिक और अकल्पनीय क्षण का साक्षी है, जब भगवान श्री कृष्ण ने अपने अनन्य भक्त और सखा अर्जुन को अपनी योगमाया का वह रूप दिखाया, जिसे देखने के लिए देवता भी तरसते हैं।
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को 'गुडाकेश' (निद्रा को जीतने वाला यानी अर्जुन) कहकर संबोधित करते हैं। यह संबोधन अत्यंत गहरा अर्थ रखता है; जो मोह, अज्ञान और प्रमाद रूपी निद्रा को जीत चुका है, वही इस दिव्य और रहस्यमयी विराट दर्शन को देखने का वास्तविक अधिकारी है। सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक हमें सिखाता है कि यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड भगवान से अलग नहीं है, बल्कि उन्हीं के भीतर स्थित है। चर (जीवित, चलने-फिरने वाले) और अचर (स्थिर, पर्वत, नदियाँ, जड़ पदार्थ) सब कुछ एक ही चेतना के ताने-बाने से बुने हुए हैं।
जब आधुनिक विज्ञान ब्रह्मांड के विस्तार (Expansion of the Universe), क्वांटम एंटेंगलमेंट और मल्टीवर्स की परिकल्पनाओं पर विचार करता है, तब वेदों और उपनिषदों का यह शाश्वत ज्ञान और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। भगवान का यह शरीर कोई मांस-मज्जा का पुतला नहीं है, बल्कि यह अनंत कोटि ब्रह्मांडों का वह आदिशक्ति केंद्र है जहाँ समय, अंतरिक्ष और समस्त भौतिक नियम विलीन हो जाते हैं। इस लेख के माध्यम से हम इसी परम श्लोक के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक गहराई, पौराणिक पृष्ठभूमि और इसके नियमित स्मरण से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७॥
— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ११ (विश्वरूपदर्शनयोग), श्लोक ७पाठ विधि एवं उच्चारण नियम:
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
महाभारत के महासमर से ठीक पहले और उसके दौरान घटित प्रसंगों में श्रीमद्भगवद्गीता का यह ग्यारहवां अध्याय अत्यंत नाटकीय, रहस्यमयी और आध्यात्मिक रूप से चरमोत्कर्ष (Climax) को छूता है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन ने अपने स्वजनों को विपक्ष में खड़ा देखा, तो उनका गांडीव धनुष हाथ से छूट गया और वे विषाद से घिर गए। तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें कर्म, ज्ञान और भक्तियोग का उपदेश दिया। परंतु अर्जुन के मन में अभी भी यह जिज्ञासा शांत नहीं हुई थी कि वास्तव में भगवान का वह परम स्वरूप कैसा है जिसकी वे बात कर रहे हैं।
दसवें अध्याय में 'विभूतियों' का वर्णन सुनने के पश्चात अर्जुन ने अत्यंत विनम्र भाव से निवेदन किया कि हे भगवान! आप अपने इस ऐश्वर्ययुक्त रूप के प्रत्यक्ष दर्शन मुझे कराएं। अर्जुन की इसी उत्कट इच्छा और अनन्य प्रेम को देखकर भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अचिंत्य योगमाया का विस्तार किया। साधारण नेत्रों से इस विराट स्वरूप को देखना असंभव था, इसलिए भगवान ने अर्जुन को 'दिव्य दृष्टि' (Divine Vision) प्रदान की।
ऋषि व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली गीता में संजय ने धृतराष्ट्र को इस दिव्य संवाद का सजीव वर्णन सुनाया है। संजय कहते हैं कि जब भगवान ने अपना वह अद्भुत, रूप-रहित और सर्वव्यापी रूप दिखाया, जिसमें अनेक मुख, अनेक नेत्र, अनेक आभूषण और अस्त्र-शस्त्र थे, तब वह तेज ऐसा था मानो एक साथ हजारों सूर्य आकाश में उदय हो गए हों। प्रस्तुत श्लोक (अध्याय 11, श्लोक 7) उसी महान दृश्य के खुलने का प्रवेश द्वार है। इसमें भगवान अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि डरो मत, देखो कि कैसे सम्पूर्ण ब्रह्मांड, चर और अचर जीवों सहित, मेरे इस एक ही शरीर में समाहित है।
यह कथा हमें यह सिखाती है कि जब तक अहंकार और साधारण भौतिक दृष्टिकोण ("मैं और मेरा") बना रहता है, तब तक ईश्वर का विराट रूप दिखाई नहीं देता। दिव्य दृष्टि का अर्थ है संकीर्णता से ऊपर उठकर संपूर्ण सृष्टि को एक ही परमात्मा का विस्तार देखना। यही कारण है कि यह श्लोक सनातन ग्रंथों में दार्शनिक और पौराणिक दोनों दृष्टियों से एक मील का पत्थर माना जाता है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के इस विशिष्ट श्लोक और विश्वरूप के चिंतन से साधक को जीवन के विभिन्न आयामों में अगाध लाभ प्राप्त होते हैं:
1. मानसिक शांति एवं स्थिरता
संपूर्ण ब्रह्मांड को एक सर्वोच्च नियंत्रण में देखने से व्यक्ति का मन छोटी-छोटी चिंताओं और तनावों से मुक्त होकर अगाध शांति का अनुभव करता है।
2. अहंकार का शमन (Ego Dissolution)
जब साधक यह देखता है कि वह इस अनंत ब्रह्मांड का एक सूक्ष्म अंश मात्र है, तो उसका 'अहम' और घमंड स्वतः ही गल जाता है, जिससे विनम्रता का विकास होता है।
3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)
इस श्लोक के नियमित पाठ और इसके अर्थ पर मनन करने से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कंपन वाली सकारात्मक ऊर्जा की रक्षात्मक परत बनती है।
4. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)
ईश्वर के सर्वव्यापक स्वरूप का स्मरण करने से व्यक्ति के पापकर्मों की वासनाएं क्षीण होने लगती हैं क्योंकि वह हर जीव में परमात्मा को देखने लगता है।
5. भय और चिंता से मुक्ति
भविष्य की अनिश्चितता को लेकर जो अज्ञात भय (Anxiety) मन में रहता है, वह इस विश्वास से समाप्त हो जाता है कि सब कुछ उसी महाशक्ति के नियंत्रण में है।
6. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि
7. अद्वैत भाव एवं सर्व-भूति हित
यह श्लोक भेद-भाव की दीवारों को गिराकर 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना को पुष्ट करता है, जिससे प्राणीमात्र के प्रति करुणा जगती है।
8. भगवत्कृपा और मोक्ष का मार्ग
विश्वरूप के प्रति समर्पण और भक्ति साधक को भवसागर के बंधनों से मुक्त कर परम गति की प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर करती है।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वैदिक साहित्यों, महर्षि वेद व्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानुज भाष्य के परिप्रेक्ष्य में), तथा महाभारत के मूल संदर्भों के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारी विशेषज्ञ संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन धर्म के ग्रंथों की मूल भावना, संस्कृत व्याकरण, पद-च्छेद और दार्शनिक व्याख्या में पूर्ण प्रामाणिकता बनी रहे। किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति या भ्रामक दावों से बचते हुए, हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, तार्किक और उच्च कोटि का आध्यात्मिक ज्ञान पहुँचाना है।
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अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे गुडाकेश, अब तू मेरे इस शरीर में सम्पूर्ण चर-अचर सहित समस्त जगत् को एक साथ देख तथा और भी जो कुछ तू देखना चाहता है, उसे देख।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् का विराट स्वरूप समस्त सृष्टि का आधार है और उसमें सब कुछ समाया हुआ है।
गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।