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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 54

अध्याय 11 · श्लोक 54

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ ५४॥

bhaktyā tv ananyayā śakya aham evaṃ-vidho 'rjuna | jñātuṃ draṣṭuṃ ca tattvena praveṣṭuṃ ca parantapa ||54||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

भक्त्या: भक्ति से; तु: परन्तु; अनन्यया: अनन्य; शक्य: संभव; अहम्: मैं; एवंविधः: इस प्रकार का; अर्जुन: हे अर्जुन; ज्ञातुम्: जानना; द्रष्टुम्: देखना; च: और; तत्त्वेन: तत्त्व से; प्रवेष्टुम्: प्रवेश करना; च: और; परन्तप: हे परन्तप।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

परन्तु हे अर्जुन, अनन्य भक्ति से ही मैं इस रूप में तत्त्व से जाना, देखा और प्राप्त किया जा सकता हूँ, हे परन्तप।

English Translation

But by single-minded devotion, O Arjuna, I can be known, seen, and entered into in reality, O scorcher of foes.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् भक्ति के महत्व को बताते हैं – अनन्य भक्ति से ही उनका साक्षात्कार संभव है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।