आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:३० PM | सूर्यास्त: ०५:३१ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 55

अध्याय 11 · श्लोक 55

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५॥

mat-karma-kṛn mat-paramo mad-bhaktaḥ saṅga-varjitaḥ | nirvairaḥ sarva-bhūteṣu yaḥ sa mām eti pāṇḍava ||55||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

मत्कर्मकृत्: मेरे लिए कर्म करने वाला; मत्परमः: मुझे परम मानने वाला; मद्भक्तः: मेरा भक्त; सङ्गवर्जितः: संग रहित; निर्वैरः: वैर रहित; सर्वभूतेषु: सभी प्राणियों में; यः: जो; सः: वह; माम्: मुझे; एति: प्राप्त होता है; पाण्डव: हे पाण्डव।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पाण्डव, जो पुरुष मेरे लिए कर्म करने वाला, मुझे परम मानने वाला, मेरा भक्त, आसक्ति रहित और सम्पूर्ण प्राणियों में वैरभाव से रहित है, वह मुझको प्राप्त होता है।

English Translation

He who does all work for Me, who has Me as his supreme goal, who is devoted to Me, who is free from attachment, and who is without enmity towards any being – he attains Me, O Pandava.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक गीता के सार रूप में भक्ति का मार्ग बताता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।