विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 55

श्लोक ५५ में भगवान् भक्ति के लक्षण बताते हैं और कहते हैं कि ऐसा भक्त मुझे प्राप्त होता है। Verse 55: The Lord describes the characteristics of a devotee who attains Him.

संस्कृत श्लोक

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५॥

mat-karma-kṛn mat-paramo mad-bhaktaḥ saṅga-varjitaḥ | nirvairaḥ sarva-bhūteṣu yaḥ sa mām eti pāṇḍava ||55||

पदच्छेद / शब्दार्थ

मत्कर्मकृत्: मेरे लिए कर्म करने वाला; मत्परमः: मुझे परम मानने वाला; मद्भक्तः: मेरा भक्त; सङ्गवर्जितः: संग रहित; निर्वैरः: वैर रहित; सर्वभूतेषु: सभी प्राणियों में; यः: जो; सः: वह; माम्: मुझे; एति: प्राप्त होता है; पाण्डव: हे पाण्डव।

हिंदी अनुवाद

हे पाण्डव, जो पुरुष मेरे लिए कर्म करने वाला, मुझे परम मानने वाला, मेरा भक्त, आसक्ति रहित और सम्पूर्ण प्राणियों में वैरभाव से रहित है, वह मुझको प्राप्त होता है।

English Translation

He who does all work for Me, who has Me as his supreme goal, who is devoted to Me, who is free from attachment, and who is without enmity towards any being – he attains Me, O Pandava.

टीका / Commentary

यह श्लोक गीता के सार रूप में भक्ति का मार्ग बताता है।