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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 53

अध्याय 11 · श्लोक 53

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३॥

nāhaṃ vedair na tapasā na dānena na cejyayā | śakya evaṃ-vidho draṣṭuṃ dṛṣṭavān asi māṃ yathā ||53||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; अहम्: मैं; वेदैः: वेदों से; न: नहीं; तपसा: तप से; न: नहीं; दानेन: दान से; न: नहीं; च: और; इज्यया: पूजा से; शक्य: संभव; एवंविधः: इस प्रकार का; द्रष्टुम्: देखना; दृष्टवान्: देखा; असि: तुमने; माम्: मुझे; यथा: जैसे।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

न तो वेदों से, न तप से, न दान से, और न यज्ञ से ही मैं इस रूप में देखा जा सकता हूँ, जैसे तुमने मुझे देखा।

English Translation

Neither by the Vedas, nor by austerity, nor by charity, nor by sacrifice, can I be seen in this form, as you have seen Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् पुनः इस रूप की दुर्लभता पर बल देते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।