विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 53

श्लोक ५३ में भगवान् कहते हैं कि यह रूप वेद, तप आदि से नहीं देखा जा सकता। Verse 53: The Lord says this form cannot be seen by Vedic means.

संस्कृत श्लोक

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३॥

nāhaṃ vedair na tapasā na dānena na cejyayā | śakya evaṃ-vidho draṣṭuṃ dṛṣṭavān asi māṃ yathā ||53||

पदच्छेद / शब्दार्थ

न: नहीं; अहम्: मैं; वेदैः: वेदों से; न: नहीं; तपसा: तप से; न: नहीं; दानेन: दान से; न: नहीं; च: और; इज्यया: पूजा से; शक्य: संभव; एवंविधः: इस प्रकार का; द्रष्टुम्: देखना; दृष्टवान्: देखा; असि: तुमने; माम्: मुझे; यथा: जैसे।

हिंदी अनुवाद

न तो वेदों से, न तप से, न दान से, और न यज्ञ से ही मैं इस रूप में देखा जा सकता हूँ, जैसे तुमने मुझे देखा।

English Translation

Neither by the Vedas, nor by austerity, nor by charity, nor by sacrifice, can I be seen in this form, as you have seen Me.

टीका / Commentary

भगवान् पुनः इस रूप की दुर्लभता पर बल देते हैं।