विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 52
श्लोक ५२ में भगवान् कहते हैं कि यह रूप देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। Verse 52: The Lord says this form is rare even for gods.
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच । सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२॥
śrī-bhagavān uvāca | su-dur-darśam idaṃ rūpaṃ dṛṣṭavān asi yan mama | devā apy asya rūpasya nityaṃ darśana-kāṅkṣiṇaḥ ||52||
पदच्छेद / शब्दार्थ
श्रीभगवान्: भगवान्; उवाच: बोले; सुदुर्दर्शम्: अत्यंत दुर्लभ; इदम्: यह; रूपम्: रूप; दृष्टवान्: देखा; असि: तुमने; यत्: जो; मम: मेरा; देवा: देवता; अपि: भी; अस्य: इस; रूपस्य: रूप के; नित्यम्: नित्य; दर्शनकाङ्क्षिणः: दर्शन के इच्छुक।
हिंदी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले: मेरा यह रूप जो तुमने देखा है, अत्यंत दुर्लभ है। देवता भी इस रूप के दर्शन के लिए सदा इच्छुक रहते हैं।
English Translation
The Blessed Lord said: This form of Mine which you have seen is very difficult to see. Even the gods are ever longing to behold this form.
टीका / Commentary
भगवान् चतुर्भुज रूप की दुर्लभता बताते हैं।