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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 52

अध्याय 11 · श्लोक 52

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच । सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२॥

śrī-bhagavān uvāca | su-dur-darśam idaṃ rūpaṃ dṛṣṭavān asi yan mama | devā apy asya rūpasya nityaṃ darśana-kāṅkṣiṇaḥ ||52||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान्; उवाच: बोले; सुदुर्दर्शम्: अत्यंत दुर्लभ; इदम्: यह; रूपम्: रूप; दृष्टवान्: देखा; असि: तुमने; यत्: जो; मम: मेरा; देवा: देवता; अपि: भी; अस्य: इस; रूपस्य: रूप के; नित्यम्: नित्य; दर्शनकाङ्क्षिणः: दर्शन के इच्छुक।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: मेरा यह रूप जो तुमने देखा है, अत्यंत दुर्लभ है। देवता भी इस रूप के दर्शन के लिए सदा इच्छुक रहते हैं।

English Translation

The Blessed Lord said: This form of Mine which you have seen is very difficult to see. Even the gods are ever longing to behold this form.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् चतुर्भुज रूप की दुर्लभता बताते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।