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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 51

अध्याय 11 · श्लोक 51

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अर्जुन उवाच । दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१॥

arjuna uvāca | dṛṣṭvedaṃ mānuṣaṃ rūpaṃ tava saumyaṃ janārdana | idānīm asmi saṃvṛttaḥ sacetāḥ prakṛtiṃ gataḥ ||51||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अर्जुन: अर्जुन; उवाच: बोले; दृष्ट्वा: देखकर; इदम्: इस; मानुषम्: मनुष्य; रूपम्: रूप; तव: आपका; सौम्यम्: सौम्य; जनार्दन: हे जनार्दन; इदानीम्: अब; अस्मि: हूँ; संवृत्तः: हुआ; सचेताः: सचेत; प्रकृतिम्: स्वभाव को; गतः: प्राप्त।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अर्जुन बोले: हे जनार्दन, आपके इस सौम्य मानव रूप को देखकर मैं अब सचेत हुआ और अपने स्वाभाविक अवस्था में आ गया हूँ।

English Translation

Arjuna said: O Janardana, seeing this gentle human form of Yours, I have now become composed and am restored to my normal nature.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन चतुर्भुज या मानव रूप देखकर शांत हुए।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।