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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 5

अध्याय 11 · श्लोक 5

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच । पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५॥

śrī-bhagavān uvāca | paśya me pārtha rūpāṇi śataśo 'tha sahasraśaḥ | nānā-vidhāni divyāni nānā-varṇākṛtīni ca ||5||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान्; उवाच: बोले; पश्य: देख; मे: मेरे; पार्थ: हे पार्थ; रूपाणि: रूपों को; शतशः: सैकड़ों; अथ: और; सहस्रशः: हजारों; नानाविधानि: अनेक प्रकार के; दिव्यानि: दिव्य; नानावर्णाकृतीनि: अनेक रंगों और आकृतियों वाले; च: भी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ, मेरे उन रूपों को देख, जो सैकड़ों और हजारों की संख्या में हैं, अनेक प्रकार के दिव्य हैं तथा अनेक रंगों और आकृतियों से युक्त हैं।

English Translation

The Blessed Lord said: Behold, O Partha, My forms by hundreds and thousands, of different kinds divine, and of various colors and shapes.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् अर्जुन की इच्छा पूरी करने के लिए अपने विराट रूप के दर्शन की तैयारी कराते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।