श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 5

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 37 मिनट का पठन 165 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच । पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
श्रीभगवान्
भगवान्
उवाच
बोले
पश्य
देख
मे
मेरे
पार्थ
हे पार्थ
रूपाणि
रूपों को
शतशः
सैकड़ों
अथ
और
सहस्रशः
हजारों
नानाविधानि
अनेक प्रकार के
दिव्यानि
दिव्य
नानावर्णाकृतीनि
अनेक रंगों और आकृतियों वाले
च
भी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ, मेरे उन रूपों को देख, जो सैकड़ों और हजारों की संख्या में हैं, अनेक प्रकार के दिव्य हैं तथा अनेक रंगों और आकृतियों से युक्त हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

1. आध्यात्मिक परिचय, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना का दिव्य स्वरूप

सनातन धर्म के अद्वितीय आध्यात्मिक ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय, जिसे 'विश्वरूपदर्शनयोग' के नाम से जाना जाता है, में महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह पावन श्लोक मानव चेतना को भौतिक बंधनों से मुक्त कर असीम अनंत ब्रह्मांडीय वास्तविकता के दर्शन कराता है। जब अर्जुन ने कुरुक्षेत्र के प्रांगण में भगवान श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य, उनके योगबल और उनकी पराशक्ति को जानने की तीव्र उत्कंठा प्रकट की, तब भक्तों के प्रति वात्सल्य भाव से ओत-प्रोत होकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने साधारण मानवीय रूप को समेटकर उस अलौकिक, अचिंत्य और अनंत विराट रूप को प्रकट किया, जिसकी कोई सीमा नहीं है।

यह श्लोक केवल दो पक्षों के बीच का संवाद नहीं है, अपितु यह जीव और ब्रह्म के बीच के उस आत्यंतिक मिलन का प्रतीक है जहाँ साधक अपनी सीमित बुद्धि को छोड़कर अनंत चैतन्य के महासागर में गोता लगाने का साहस करता है। सांस्कृतिक दृष्टिकोण से, यह श्लोक भारतीय दर्शन के उस मूल आधार को पुष्ट करता है जिसके अनुसार यह संपूर्ण चराचर जगत, समस्त ग्रह-नक्षत्र, देवता, असुर, भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ उसी एक परम पुरुष के भीतर समाहित हैं। 'विश्वरूप' के ये दर्शन साधक के मन में अगाध श्रद्धा, विस्मय और परम समर्पण का भाव जागृत करते हैं।

आधुनिक युग की भागदौड़ भरी जिंदगी और मानसिक अशांति के दौर में, इस श्लोक का स्मरण और इसके गूढ़ार्थ का चिंतन मनुष्य को उसकी क्षुद्र वृत्तियों से ऊपर उठाकर एक विशाल और सार्वभौमिक दृष्टिकोण प्रदान करता है। यह हमें यह अहसास कराता है कि हम जिस संसार में निवास कर रहे हैं, वह किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, महान और दिव्य व्यवस्था का हिस्सा है। इस पावन मार्गदर्शिका के माध्यम से हम इसी महान श्लोक के शाब्दिक, दार्शनिक और व्यावहारिक पक्षों का गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे साधक के हृदय में भक्ति और ज्ञान का प्रकाश एक साथ प्रज्वलित हो सके।

2. संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं सस्वर पाठ विधि

श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का यह पांचवां श्लोक अत्यंत ओजस्वी और दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण है। इसका सस्वर उच्चारण करने से न केवल मानसिक एकाग्रता बढ़ती है, बल्कि वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है।

॥ श्रीमद्भगवद्गीता अथ एकादशोऽध्यायः (विश्वरूपदर्शनयोग) ॥

श्रीभगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥


पदच्छेद: पश्य, मे, पार्थ, रूपाणि, शतशः, अथ, सहस्रशः, नानाविधानि, दिव्यानि, नाना-वर्ण-आकृतीनि, च।

सस्वर पाठ के नियम एवं विधि

  • प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
  • भगवान श्रीकृष्ण के चित्र या विग्रह के समक्ष शुद्ध घृत का दीपक प्रज्वलित करें।
  • श्लोक का उच्चारण स्पष्ट और आरोह-अवरोह के क्रमानुसार करें।
  • उच्चारण के समय प्रत्येक शब्द के दीर्घ और ह्रस्व स्वरों का विशेष ध्यान रखें।

मानसिक भाव

पाठ करते समय यह कल्पना करें कि आप स्वयं अर्जुन के स्थान पर खड़े हैं और भगवान अपने अनंत रूपों के द्वार आपके अंतःकरण के लिए खोल रहे हैं। मन में किसी प्रकार का भय न रखकर पूर्ण शरणागति का भाव रखें।

3. पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द का अपना एक विशेष दार्शनिक और व्याकरणिक महत्व है। नीचे दी गई सारणी में इसके प्रमुख पदों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
श्रीभगवानुवाच भगवान बोले परमपिता परमात्मा श्रीकृष्ण, जो समस्त ऐश्वर्य, यश, ज्ञान, वैराग्य और ऊर्जा के स्रोत हैं, वे स्वयं अपने मुख से सत्य का उद्घोष कर रहे हैं।
पश्य देख अर्जुन को केवल सुनने तक सीमित न रखकर प्रत्यक्ष अनुभव करने का आमंत्रण, जो ज्ञान की पराकाष्ठा है।
मे मेरे उस सर्वोच्च सत्ता का संकेत जो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है और जिससे भिन्न कुछ भी अस्तित्व नहीं रखता।
पार्थ हे पृथा (कुंती) के पुत्र अर्जुन अर्जुन को उनकी माता पृथा के नाम से संबोधित कर उनके वीर और कुलभूषण स्वरूप का स्मरण कराना तथा आत्मीयता दर्शाना।
रूपाणि रूपों को एक ही परम सत्य के अनेक रूपों में प्रकट होने की क्षमता, जो प्रकृति की विविधता को दर्शाती है।
शतशोऽथ सहस्रशः सैकड़ों और सहस्रों (अनंत) सीमित मानव दृष्टि की सीमाओं को तोड़ते हुए असीम और अनंत संख्या का बोध कराना, जिसकी कोई गणना संभव नहीं है।
नानाविधानि भाँति-भाँति के / अनेक प्रकार के सृष्टि की विविधता; जहाँ कोई भी दो वस्तुएँ या जीव एक जैसे नहीं हैं, किंतु सब एक ही मूल तत्व से जुड़े हैं।
दिव्यानि दिव्य / अलौकिक लौकिक या प्राकृत जगत से परे, जो माया के बंधनों से मुक्त और शुद्ध चैतन्य प्रकाश से जगमगाते हैं।
नानावर्णाकृतीनि अनेक रंगों और आकृतियों वाले इस चराचर जगत के समस्त वर्ण, आकार, रूप और सौंदर्य भगवान के ही अंग हैं, जो इस सृष्टि को सुंदर बनाते हैं।
च और इन सभी विशेषताओं को एक सूत्र में पिरोकर समग्रता का बोध कराने वाला समुच्चयबोधक अव्यय।

4. धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले, जब कौरव और पांडव सेनाएँ कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं, तब अर्जुन ने अपने ही सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और मित्रों को देखकर गहन विषाद और मोह का अनुभव किया था। उस कायरता और भ्रम की स्थिति को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाई।

आरंभिक दस अध्यायों में भगवान ने विभिन्न योगों (कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानविज्ञानयोग आदि) के माध्यम से अर्जुन को आत्मज्ञान कराया। परंतु अर्जुन की जिज्ञासा शांत नहीं हुई। उन्होंने भगवान के ऐश्वर्यपूर्ण और वास्तविक स्वरूप को अपनी आँखों से देखने की विनती की। अर्जुन का यह अनुरोध केवल व्यक्तिगत जिज्ञासा नहीं थी, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जिज्ञासा का द्वार खोलना था, ताकि मानव जाति यह जान सके कि भौतिक शरीर के पीछे कौन सी विराट शक्ति काम कर रही है।

महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता की रचना की है। ग्यारहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि (दिव्य चक्षु) प्रदान करते हैं, क्योंकि साधारण और नश्वर आँखों से उस प्रचंड, तेजोमय और अनंत ब्रह्मांडीय रूप को देखना असंभव था। जब अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है, तब वे देखते हैं कि भगवान के उस एक ही शरीर में संपूर्ण ब्रह्मांड, समस्त देवता, ऋषि-मुनि, ग्रह, आकाशगंगाएँ और काल का महाचक्र समाया हुआ है। यह प्रसंग सनातन साहित्य का सबसे अधिक रोमांचक, भव्य और आध्यात्मिक दृष्टि से सबसे गहरा प्रसंग माना जाता है।

इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से हमें यह शिक्षा मिलती है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके प्रत्यक्ष अनुभव की आवश्यकता होती है। जब साधक का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है, तब गुरु या ईश्वर उसे वह दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं जिससे वह कण-कण में परमात्मा के दर्शन करने लगता है।

5. नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पंचम श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके भाव को आत्मसात करने से साधक को अनेकों प्रकार के मानसिक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति और स्थिरता: विराट रूप के चिंतन से मन की छोटी-सी-छोटी चिंताएँ और संकीर्णताएँ समाप्त होने लगती हैं।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: श्लोक के दिव्य शब्दों के कंपन से शरीर और मन का औरा (Aura) शुद्ध होता है और नकारात्मक विचार दूर होते हैं।
  • कर्मिक शुद्धि (Purification): भगवान की अनंतता के स्मरण से अहंकार का नाश होता है, जो सभी पापों और कर्म बंधनों का मूल कारण है।
  • भय और चिंता से मुक्ति: जब व्यक्ति यह जान लेता है कि सब कुछ उस विराट परमात्मा के नियंत्रण में है, तो मृत्यु और भविष्य का भय समाप्त हो जाता है।
  • एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि: संस्कृत के इस श्लोक का प्रतिदिन सस्वर पाठ करने से मस्तिष्क की नसें सक्रिय होती हैं और बौद्धिक क्षमता बढ़ती है।
  • परम शरणागति का विकास: साधक के भीतर ईश्वर के प्रति अगाध विश्वास और संपूर्ण समर्पण का भाव जागृत होता है।
  • ब्रह्मांडीय एकता की अनुभूति: साधक सभी जीवों में उसी एक परमात्मा के दर्शन करने लगता है, जिससे उसके मन में करुणा और प्रेम का भाव उमड़ता है।
  • अध्यात्म साधना में प्रगति: ध्यान और योग साधना करने वालों के लिए यह श्लोक आंतरिक चक्षु खोलने वाला मार्गदर्शक सिद्ध होता है।

6. संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन ग्रंथों के गहन अध्ययन, पारंपरिक संस्कृत व्याकरण और उच्च कोटि के दार्शनिक विश्लेषण पर आधारित है। इस सामग्री को तैयार करते समय महर्षि वेदव्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न टीकाग्रंथों (जैसे श्रीमद शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और आदि गुरुओं की व्याख्याओं) का सूक्ष्म अवलोकन किया गया है।

यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री इस बात को सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक वेदों, पुराणों और स्मृतियों का मूल संदेश बिना किसी मिलावट या भ्रामक प्रसंग के पहुंचे। हमारी संपादकीय टीम यह प्रतिबद्धता दोहराती है कि प्रत्येक श्लोक का अर्थ उसकी मूल सांस्कृतिक और दार्शनिक गरिमा के अनुरूप ही प्रस्तुत किया जाए, ताकि आज की पीढ़ी अपनी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत से जुड़ सके।

7. अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: साधारण नश्वर नेत्रों से भगवान के उस अनंत, तेजोमय और प्रचंड ब्रह्मांडीय रूप को देखना असंभव था। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को 'दिव्य चक्षु' (दिव्य दृष्टि) प्रदान की, जिसके माध्यम से अर्जुन ने उस अलौकिक और अचिंत्य विराट रूप के प्रत्यक्ष दर्शन किए।

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का नाम **'विश्वरूपदर्शनयोग'** है। इस अध्याय का मुख्य विषय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपने अनंत, सर्वव्यापी और महाकाल रूप का प्रदर्शन करना है, जो यह सिद्ध करता है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड उन्हीं के भीतर स्थित है और उन्हीं से संचालित होता है।

उत्तर: इस श्लोक का नियमित पाठ और मनन करने से मन की संकीर्णता दूर होती है, मानसिक तनाव कम होता है, और साधक के भीतर संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रति आदर व करुणा का भाव जागृत होता है। यह अहंकार को समाप्त कर परम शांति का अनुभव कराता है।

उत्तर: यद्यपि कुरुक्षेत्र के मैदान में वह प्रत्यक्ष भौतिक प्रदर्शन विशेष रूप से अर्जुन के लिए था, परंतु आज भी जो साधक अपनी साधना, ध्यान, भक्ति और पूर्ण शरणागति के माध्यम से अपने अंतःकरण को शुद्ध कर लेते हैं, वे कण-कण में उसी विराट परमात्मा के दर्शन का आन्तरिक अनुभव कर सकते हैं।

उत्तर: 'शतशोऽथ सहस्रशः' का तात्पर्य असीम और अनंत संख्या से है, जो यह दर्शाता है कि ईश्वर की अभिव्यक्तियाँ सीमित नहीं हैं। 'नानावर्णाकृतीनि' यह बताता है कि इस सृष्टि के सभी रंग, रूप, आकार और विविधताएँ उसी एक परम ईश्वर की ही विभिन्न कलाएँ और विभूतियाँ हैं।

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हरिः ॐ तत्सत्।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं: हे पार्थ, मेरे उन रूपों को देख, जो सैकड़ों और हजारों की संख्या में हैं, अनेक प्रकार के दिव्य हैं तथा अनेक रंगों और आकृतियों से युक्त हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् की अनंतता और विभिन्नता को दर्शाता यह श्लोक हमें उनकी असीम शक्ति का बोध कराता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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श्लोक 5/55 9% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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