विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 5
श्लोक ५ में भगवान् कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे उनके अनेक दिव्य रूपों को देखें। Verse 5: Krishna tells Arjuna to behold His myriad divine forms.
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच । पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५॥
śrī-bhagavān uvāca | paśya me pārtha rūpāṇi śataśo 'tha sahasraśaḥ | nānā-vidhāni divyāni nānā-varṇākṛtīni ca ||5||
पदच्छेद / शब्दार्थ
श्रीभगवान्: भगवान्; उवाच: बोले; पश्य: देख; मे: मेरे; पार्थ: हे पार्थ; रूपाणि: रूपों को; शतशः: सैकड़ों; अथ: और; सहस्रशः: हजारों; नानाविधानि: अनेक प्रकार के; दिव्यानि: दिव्य; नानावर्णाकृतीनि: अनेक रंगों और आकृतियों वाले; च: भी।
हिंदी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ, मेरे उन रूपों को देख, जो सैकड़ों और हजारों की संख्या में हैं, अनेक प्रकार के दिव्य हैं तथा अनेक रंगों और आकृतियों से युक्त हैं।
English Translation
The Blessed Lord said: Behold, O Partha, My forms by hundreds and thousands, of different kinds divine, and of various colors and shapes.
टीका / Commentary
भगवान् अर्जुन की इच्छा पूरी करने के लिए अपने विराट रूप के दर्शन की तैयारी कराते हैं।