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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 49

अध्याय 11 · श्लोक 49

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९॥

mā te vyathā mā ca vimūḍha-bhāvo dṛṣṭvā rūpaṃ ghoram īdṛṅ mamedam | vyapeta-bhīḥ prīta-manāḥ punas tvaṃ tad eva me rūpam idaṃ prapaśya ||49||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

मा: मत; ते: तुम्हें; व्यथा: पीड़ा; मा: मत; च: और; विमूढभावः: विमूढ भाव; दृष्ट्वा: देखकर; रूपम्: रूप; घोरम्: घोर; ईदृक्: ऐसा; मम: मेरा; इदम्: यह; व्यपेतभीः: भय रहित; प्रीतमनाः: प्रसन्न मन वाला; पुनः: फिर; त्वम्: तुम; तत्: उस; एव: ही; मे: मेरे; रूपम्: रूप; इदम्: इस; प्रपश्य: देखो।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मेरे इस घोर रूप को देखकर तुम्हें पीड़ा या विमूढभाव नहीं होना चाहिए। भय रहित और प्रसन्न मन से तुम मेरे इस पूर्व रूप को फिर से देखो।

English Translation

Be not afraid, nor bewildered, on seeing this terrible form of Mine. With your fear gone and your mind pleased, behold again this former form of Mine.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् अर्जुन को भय मुक्त करके पुनः चतुर्भुज रूप दिखाने का वचन देते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।