विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 48

श्लोक ४८ में भगवान् कहते हैं कि यह रूप साधारण साधनों से नहीं देखा जा सकता। Verse 48: The Lord says this form cannot be seen by ordinary means.

संस्कृत श्लोक

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८॥

na veda-yajñādhyayanair na dānair na ca kriyābhir na tapobhir ugraiḥ | evaṃ-rūpaḥ śakya ahaṃ nṛ-loke draṣṭuṃ tvad-anyena kuru-pravīra ||48||

पदच्छेद / शब्दार्थ

न: नहीं; वेद: वेद; यज्ञ: यज्ञ; अध्ययनैः: अध्ययन से; न: नहीं; दानैः: दान से; न: नहीं; च: और; क्रियाभिः: क्रियाओं से; न: नहीं; तपोभिः: तप से; उग्रैः: उग्र; एवंरूपः: इस प्रकार का रूप; शक्यः: संभव; अहम्: मैं; नृलोके: मनुष्य लोक में; द्रष्टुम्: देखना; त्वदन्येन: तुम्हारे अलावा किसी और से; कुरुप्रवीर: हे कुरुश्रेष्ठ।

हिंदी अनुवाद

हे कुरुश्रेष्ठ, वेद-यज्ञ के अध्ययन से, दान से, क्रियाओं से, या उग्र तप से भी मनुष्य लोक में मैं इस रूप में तुम्हारे अतिरिक्त किसी और के द्वारा देखा जाना संभव नहीं है।

English Translation

Not by the study of the Vedas and sacrifices, nor by gifts, nor by rituals, nor by severe austerities, can I be seen in this form in the human world by anyone other than you, O foremost of the Kurus.

टीका / Commentary

भगवान् इस रूप की दुर्लभता बताते हैं।