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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 48

अध्याय 11 · श्लोक 48

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८॥

na veda-yajñādhyayanair na dānair na ca kriyābhir na tapobhir ugraiḥ | evaṃ-rūpaḥ śakya ahaṃ nṛ-loke draṣṭuṃ tvad-anyena kuru-pravīra ||48||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; वेद: वेद; यज्ञ: यज्ञ; अध्ययनैः: अध्ययन से; न: नहीं; दानैः: दान से; न: नहीं; च: और; क्रियाभिः: क्रियाओं से; न: नहीं; तपोभिः: तप से; उग्रैः: उग्र; एवंरूपः: इस प्रकार का रूप; शक्यः: संभव; अहम्: मैं; नृलोके: मनुष्य लोक में; द्रष्टुम्: देखना; त्वदन्येन: तुम्हारे अलावा किसी और से; कुरुप्रवीर: हे कुरुश्रेष्ठ।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कुरुश्रेष्ठ, वेद-यज्ञ के अध्ययन से, दान से, क्रियाओं से, या उग्र तप से भी मनुष्य लोक में मैं इस रूप में तुम्हारे अतिरिक्त किसी और के द्वारा देखा जाना संभव नहीं है।

English Translation

Not by the study of the Vedas and sacrifices, nor by gifts, nor by rituals, nor by severe austerities, can I be seen in this form in the human world by anyone other than you, O foremost of the Kurus.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् इस रूप की दुर्लभता बताते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।