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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 47

अध्याय 11 · श्लोक 47

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच । मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७॥

śrī-bhagavān uvāca | mayā prasannena tavārjunedaṃ rūpaṃ paraṃ darśitam ātma-yogāt | tejo-mayaṃ viśvam anantam ādyaṃ yan me tvad-anyena na dṛṣṭa-pūrvam ||47||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान्; उवाच: बोले; मया: मेरे द्वारा; प्रसन्नेन: प्रसन्न होकर; तव: तुम्हें; अर्जुन: हे अर्जुन; इदम्: यह; रूपम्: रूप; परम्: परम; दर्शितम्: दिखाया गया; आत्मयोगात्: अपने योग से; तेजोमयम्: तेजोमय; विश्वम्: विश्वरूप; अनन्तम्: अनंत; आद्यम्: आदि; यत्: जो; मे: मेरा; त्वदन्येन: तुम्हारे अलावा किसी और ने; न: नहीं; दृष्टपूर्वम्: पहले देखा।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: हे अर्जुन, मैंने प्रसन्न होकर तुम्हें अपने योग से यह परम तेजोमय, विश्वरूप, अनंत और आदि रूप दिखाया है, जो मेरा है और तुम्हारे अतिरिक्त किसी और ने पहले नहीं देखा।

English Translation

The Blessed Lord said: By My grace, O Arjuna, I have shown you this supreme form, through My own yoga, this resplendent, universal, infinite, and primal form of Mine, which has never been seen before by anyone other than you.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् बताते हैं कि यह रूप उनकी कृपा से ही अर्जुन ने देखा।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।