श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 47

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 21 मिनट का पठन 162 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच । मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

20 पद
श्रीभगवान्
भगवान्
उवाच
बोले
मया
मेरे द्वारा
प्रसन्नेन
प्रसन्न होकर
तव
तुम्हें
अर्जुन
हे अर्जुन
इदम्
यह
रूपम्
रूप
परम्
परम
दर्शितम्
दिखाया गया
आत्मयोगात्
अपने योग से
तेजोमयम्
तेजोमय
विश्वम्
विश्वरूप
अनन्तम्
अनंत
आद्यम्
आदि
यत्
जो
मे
मेरा
त्वदन्येन
तुम्हारे अलावा किसी और ने
न
नहीं
दृष्टपूर्वम्
पहले देखा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: हे अर्जुन, मैंने प्रसन्न होकर तुम्हें अपने योग से यह परम तेजोमय, विश्वरूप, अनंत और आदि रूप दिखाया है, जो मेरा है और तुम्हारे अतिरिक्त किसी और ने पहले नहीं देखा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप: श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 47 - विस्तृत आध्यात्मिक विवेचन

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का ग्यारहवां अध्याय 'विश्व-रूप दर्शन योग' के नाम से विख्यात है। यह अध्याय न केवल अर्जुन के लिए, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए ईश्वर के अनंत और सर्वव्यापी स्वरूप को समझने का एक द्वार है। जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से उनके ऐश्वर्य और विभूतियों को जानने की प्रार्थना की, तब भगवान ने अपनी योगमाया के प्रभाव से उन्हें वह दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे वे काल और देश की सीमाओं से परे उस 'विराट' को देख सके, जिसे देखना साधारण चक्षुओं के लिए असंभव था।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यह दर्शन किसी अर्जित योग्यता का फल नहीं, बल्कि उनकी 'प्रसन्नता' और 'कृपा' का परिणाम है। यह ब्रह्मांडीय सत्य है कि ईश्वर की प्राप्ति या उनके स्वरूप का साक्षात्कार केवल मानवीय प्रयासों से नहीं, बल्कि उनकी अहैतुकी कृपा (Divine Grace) से ही संभव है। 'तेजोमयं' शब्द यहाँ उस प्रकाश का द्योतक है जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी है, जो न आदि है, न अंत। यह श्लोक हमें सिखाता है कि भक्ति का मार्ग ही वह एकमात्र मार्ग है जहाँ भक्त और भगवान का मिलन होता है। यह दर्शन अर्जुन के अहंकार को नष्ट करने और उन्हें उनके कर्तव्य (धर्म) के प्रति पूर्णतः समर्पित करने के लिए आवश्यक था। सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें यह स्मरण कराता है कि हम जिस संसार को देख रहे हैं, वह उस अनंत परमात्मा का ही एक सूक्ष्म अंश है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीभगवानुवाच ।
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें। 'मया' (मुझसे), 'प्रसन्नेन' (प्रसन्न होकर), 'तव' (तुम्हारे लिए), 'अर्जुन' (हे अर्जुन), 'इदं' (यह), 'रूपं' (स्वरूप), 'परं' (दिव्य), 'दर्शितं' (दिखाया गया है), 'आत्मयोगात्' (अपनी योगशक्ति से)। प्रत्येक शब्द का स्पष्ट उच्चारण करें। इसे एकाग्रता के साथ तीन बार दोहराने से मन में दिव्य शांति का अनुभव होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
मयामेरे द्वारापरमात्मा का स्वयं का संकल्प, जो सृष्टि का आधार है।
प्रसन्नेनप्रसन्न होकरईश्वर की कृपा ही ज्ञान और दर्शन का एकमात्र द्वार है।
तवतुम्हारे लिएभक्त की पात्रता और भगवान का वात्सल्य।
आत्मयोगात्अपनी योगशक्ति सेईश्वर की वह माया शक्ति जो असंभव को संभव बनाती है।
तेजोमयंतेज से युक्तज्ञान का प्रकाश जो अज्ञान के अंधकार को मिटाता है।
विश्वम्संपूर्ण ब्रह्मांडईश्वर के भीतर ही समस्त चराचर जगत स्थित है।
अनन्तम्असीमपरमात्मा की कोई सीमा नहीं, वे काल से परे हैं।
आद्यम्आदि (मूल)सृष्टि का उद्गम और अंतिम सत्य।
दृष्टपूर्वम्पहले देखा गयायह दर्शन अद्वितीय और दुर्लभ है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के प्रारंभ में, जब अर्जुन ने अपने सगे-संबंधियों को शत्रु पक्ष में देखा, तो वे मोहग्रस्त हो गए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता का उपदेश दिया। ग्यारहवें अध्याय में, अर्जुन ने भगवान से प्रार्थना की कि वे अपना 'ऐश्वरं रूप' दिखाएं। भगवान ने अर्जुन को 'दिव्य चक्षु' प्रदान किए। यह घटना केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक रूपांतरण है।

पौराणिक संदर्भों में, विराट रूप का वर्णन वेदों के 'पुरुष सूक्त' में भी मिलता है, जहाँ 'सहस्रशीर्षा पुरुषः' कहकर परमात्मा के अनंत स्वरूप का गुणगान किया गया है। यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि जिसे वह 'मित्र' या 'सारथी' समझ रहे थे, वह वास्तव में काल का भी काल है। यह दर्शन अर्जुन के भीतर से भय को दूर करने और उन्हें 'निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन्' (हे अर्जुन! तुम तो केवल निमित्त बनो) का पाठ पढ़ाने के लिए था। यह श्लोक यह भी सिद्ध करता है कि भगवान की कृपा के बिना वेदों का अध्ययन या तपस्या भी उस परम सत्य को देखने में असमर्थ है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन के कठिनतम क्षणों में जब हम दिशाहीन हो जाते हैं, तब ईश्वर की शरण ही हमें विराट सत्य का दर्शन कराती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का विनाश: विराट रूप का चिंतन करने से जीव को अपनी लघुता और ईश्वर की महानता का बोध होता है, जिससे अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • मानसिक शांति: इस श्लोक का नियमित पाठ मन की चंचलता को कम करता है और एकाग्रता में वृद्धि करता है।
  • भय से मुक्ति: जब भक्त यह जान लेता है कि सब कुछ ईश्वर के नियंत्रण में है, तो मृत्यु और भविष्य का भय समाप्त हो जाता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: 'तेजोमयं' स्वरूप का ध्यान करने से साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • कर्म शुद्धि: यह बोध कि ईश्वर सर्वत्र है, मनुष्य को अनैतिक कार्यों से दूर रखता है।
  • दिव्य दृष्टि की प्राप्ति: निरंतर अभ्यास से साधक को जीवन की घटनाओं को देखने का एक नया, आध्यात्मिक दृष्टिकोण मिलता है।
  • ईश्वरीय कृपा का अनुभव: यह श्लोक भक्त को यह विश्वास दिलाता है कि वह ईश्वर की दृष्टि में है।
  • मोक्ष का मार्ग: भगवान के स्वरूप में लीन होना ही मोक्ष का प्रथम सोपान है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के एकादश अध्याय के 47वें श्लोक पर आधारित है। इस सामग्री को तैयार करते समय 'गीता प्रेस, गोरखपुर' के प्रामाणिक संस्करणों और शंकराचार्य कृत गीता भाष्य के दार्शनिक सिद्धांतों का आधार लिया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्रसम्मत और भक्तिपूर्ण जानकारी प्रदान करना है। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, बल्कि वेदान्त के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

विराट रूप ईश्वर का वह स्वरूप है जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड, समस्त देवता, भूत-भविष्य और वर्तमान समाहित हैं। यह ईश्वर की सर्वव्यापकता का प्रतीक है।

विराट रूप का दर्शन केवल 'दिव्य चक्षु' से संभव है। आज के युग में, ईश्वर को अपने भीतर और समस्त प्राणियों में देखना ही विराट रूप का दर्शन है।

निष्काम कर्म, अनन्य भक्ति और निरंतर स्मरण से ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। अर्जुन की तरह पूर्ण समर्पण ही एकमात्र कुंजी है।

इसका पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु ब्रह्ममुहूर्त या संध्या काल में इसका विशेष प्रभाव पड़ता है।

हाँ, यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं, वह ईश्वर की शक्ति से कर रहे हैं। यह हमें विनम्रता और कर्तव्यपरायणता सिखाता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे अर्जुन, मैंने प्रसन्न होकर तुम्हें अपने योग से यह परम तेजोमय, विश्वरूप, अनंत और आदि रूप दिखाया है, जो मेरा है और तुम्हारे अतिरिक्त किसी और ने पहले नहीं देखा।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के दर्शन केवल उनकी कृपा से ही संभव हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 47 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 47/55 85% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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