श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 46

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 23 मिनट का पठन 144 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
किरीटिनम्
मुकुट धारण किए हुए
गदिनम्
गदा धारण किए हुए
चक्रहस्तम्
हाथ में चक्र लिए हुए
इच्छामि
चाहता हूँ
त्वाम्
आपको
द्रष्टुम्
देखना
अहम्
मैं
तथैव
वैसे ही
तेन
उस
एव
ही
रूपेण
रूप से
चतुर्भुजेन
चार भुजाओं वाले
सहस्रबाहो
हे सहस्रबाहो
भव
हों
विश्वमूर्ते
हे विश्वमूर्ते।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं आपको वैसे ही मुकुट धारण किए, गदा और हाथ में चक्र लिए देखना चाहता हूँ। हे सहस्रबाहो, हे विश्वमूर्ते, आप उसी चतुर्भुज रूप में प्रकट हों।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का एकादश अध्याय, जिसे 'विश्वरूप दर्शन योग' के नाम से जाना जाता है, मानव चेतना के इतिहास में सबसे विस्मयकारी क्षण है। जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के अनंत, विराट और सर्वव्यापी स्वरूप को देखा, तो वे विस्मित और भयभीत हो गए। वह विराट रूप, जिसमें करोड़ों सूर्य का तेज था और जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाहित था, अर्जुन की मानवीय दृष्टि के लिए असहनीय हो गया। प्रस्तुत श्लोक (11.46) उस क्षण का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ भक्त अपने आराध्य के उस सौम्य, चतुर्भुज रूप की पुनः याचना करता है, जो प्रेम, वात्सल्य और सामीप्य का प्रतीक है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से, यह श्लोक 'भक्ति' और 'ऐश्वर्य' के बीच के संतुलन को दर्शाता है। यद्यपि ईश्वर का विराट रूप उनकी सर्वशक्तिमानता का प्रमाण है, किंतु भक्त का हृदय सदैव उस चतुर्भुज रूप (शंख, चक्र, गदा, पद्म धारी) में ही शांति पाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि ईश्वर के अनंत विस्तार को जानना ज्ञान है, किंतु उनके उस रूप से प्रेम करना, जो हमारे हृदय के निकट है, वही भक्ति है। यह श्लोक केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक साधक की उस व्याकुलता का प्रकटीकरण है जो ईश्वर के साथ एक व्यक्तिगत संबंध स्थापित करना चाहता है। इस श्लोक का पाठ करने से साधक के भीतर का भय समाप्त होता है और उसे उस दिव्य सुरक्षा का अनुभव होता है जो भगवान के चतुर्भुज स्वरूप के साथ जुड़ी है। यह ब्रह्मांडीय सत्य है कि ईश्वर चाहे कितने भी विराट क्यों न हों, वे अपने भक्तों के लिए सदैव 'सुलभ' और 'सौम्य' बने रहते हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।

तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें। 'किरीटिनं' शब्द में 'ट' का उच्चारण मूर्धन्य होना चाहिए। 'सहस्रबाहो' का उच्चारण करते समय 'स' और 'ह' के मेल पर ध्यान दें। प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के चतुर्भुज विग्रह के समक्ष बैठकर इसका तीन बार पाठ करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। पाठ के अंत में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करना चाहिए।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
किरीटिनंमुकुट धारण करने वालेईश्वर का राजसी वैभव और उनकी सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक।
गदिनंगदा धारण करने वालेधर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश का संकल्प।
चक्रहस्तंहाथ में चक्र लिए हुएकालचक्र के नियंता और दुष्टों के संहारक।
इच्छामिइच्छा करता हूँभक्त की तीव्र लालसा और ईश्वर से मिलन की तड़प।
द्रष्टुमहंमैं देखना चाहता हूँसाधक की दृष्टि का ईश्वर के स्वरूप में विलीन होना।
तथैववैसे हीपूर्व परिचित और प्रिय स्वरूप की पुनः प्राप्ति की कामना।
तेनैवउसी रूप मेंईश्वर की अपरिवर्तनीय कृपा और प्रेम का भाव।
चतुर्भुजेनचार भुजाओं वालेसृष्टि के चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के स्वामी।
सहस्रबाहोहजारों भुजाओं वालेअनंत सामर्थ्य और सर्वव्यापी शक्ति का बोध।
विश्वमूर्तेहे विश्वरूपसंपूर्ण ब्रह्मांड जिनका शरीर है, ऐसे परमात्मा।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के प्रारंभ में, जब अर्जुन ने अपने सगे-संबंधियों को शत्रु पक्ष में देखा, तो वे मोहग्रस्त होकर गांडीव त्याग दिए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें 'श्रीमद्भगवद्गीता' का उपदेश दिया। एकादश अध्याय में, अर्जुन की जिज्ञासा को शांत करने और अपनी सर्वशक्तिमानता को सिद्ध करने के लिए, भगवान ने उन्हें अपना 'विश्वरूप' दिखाया। यह रूप इतना भयानक और विशाल था कि अर्जुन की मानवीय आंखें उसे देख नहीं पा रही थीं।

शास्त्रों के अनुसार, यह रूप काल का रूप था, जिसमें सब कुछ समाहित हो रहा था। अर्जुन ने देखा कि भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे योद्धा भगवान के मुख में प्रवेश कर रहे हैं। इस दृश्य ने अर्जुन को भयभीत कर दिया। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि वे इस विराट रूप को समेट लें और अपने उस सौम्य रूप में आ जाएं जिसे वे सखा के रूप में जानते थे। यह घटना हमें सिखाती है कि ईश्वर का ऐश्वर्य (विराट रूप) हमें विस्मय में डाल सकता है, लेकिन ईश्वर का माधुर्य (चतुर्भुज रूप) हमें प्रेम और भक्ति प्रदान करता है।

पुराणों में भी भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की महिमा गाई गई है। शंख, चक्र, गदा और पद्म—ये चार आयुध केवल अस्त्र नहीं हैं, बल्कि ये सृष्टि के संचालन के चार स्तंभ हैं। शंख 'ॐ' का प्रतीक है, चक्र 'समय' का, गदा 'शक्ति' का और पद्म 'शुद्धता' का। अर्जुन का यह आग्रह कि "मैं आपको उसी रूप में देखना चाहता हूँ," वास्तव में भक्त की उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ वह ईश्वर के ऐश्वर्य से अधिक उनके प्रेम को महत्व देता है। यह प्रसंग महाभारत के सबसे भावुक क्षणों में से एक है, जहाँ एक योद्धा अपने मित्र और ईश्वर से पुनः सामान्य संबंध की याचना करता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • भय का निवारण: इस श्लोक का नियमित पाठ करने से अज्ञात भय और भविष्य की चिंताएं समाप्त होती हैं।
  • मानसिक एकाग्रता: चतुर्भुज रूप का ध्यान करने से मन की चंचलता कम होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • अहंकार का नाश: 'विश्वमूर्ते' का स्मरण करने से साधक को अपनी लघुता और ईश्वर की महानता का बोध होता है, जिससे अहंकार मिटता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: यह श्लोक वातावरण में दिव्य स्पंदन पैदा करता है, जिससे नकारात्मकता दूर होती है।
  • कठिन समय में धैर्य: अर्जुन की तरह, जब जीवन में संकट हो, तो यह श्लोक ईश्वर की शरण लेने का साहस प्रदान करता है।
  • कर्म शुद्धि: भगवान के चतुर्भुज स्वरूप का ध्यान करने से व्यक्ति के कर्मों में सात्विकता आती है।
  • आध्यात्मिक सुरक्षा: चक्रहस्त भगवान का स्मरण साधक को हर प्रकार की अनिष्ट शक्तियों से सुरक्षित रखता है।
  • भक्ति भाव की वृद्धि: यह श्लोक ईश्वर के साथ व्यक्तिगत संबंध (सख्य भाव) को प्रगाढ़ बनाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री श्रीमद्भगवद्गीता के एकादश अध्याय के 46वें श्लोक पर आधारित है। इसे 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत रखा गया है, जिसमें गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों और आचार्य शंकर के भाष्य का सार समाहित है। हमारा उद्देश्य पाठकों को श्लोक के गूढ़ अर्थों से परिचित कराना है ताकि वे अपनी दैनिक साधना में इसका लाभ उठा सकें। यह व्याख्या पूर्णतः शास्त्रीय मर्यादाओं और भक्ति परंपराओं के अनुरूप है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

विराट रूप ईश्वर की अनंत शक्ति का प्रदर्शन था, जो मानवीय सीमाओं से परे है। अर्जुन एक भक्त थे, और भक्त ईश्वर के ऐश्वर्य से अधिक उनके प्रेम और सानिध्य को प्रिय मानते हैं।

चतुर्भुज रूप भगवान विष्णु का वह स्वरूप है जो सृष्टि के पालन और धर्म की रक्षा का प्रतीक है। यह रूप भक्त को सुरक्षा और शांति का अनुभव कराता है।

हाँ, गीता का कोई भी श्लोक श्रद्धापूर्वक कोई भी व्यक्ति पढ़ सकता है। इसके लिए किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं है, केवल शुद्ध हृदय और भक्ति भाव अनिवार्य है।

सहस्रबाहो का अर्थ है 'हजारों भुजाओं वाले'। यह ईश्वर की सर्वव्यापकता को दर्शाता है, जो हर स्थान पर और हर कार्य में उपस्थित हैं।

आप इसे अपनी सुबह की प्रार्थना में शामिल कर सकते हैं। जब भी आप तनाव महसूस करें, भगवान के इस चतुर्भुज स्वरूप का ध्यान करें और इस श्लोक का उच्चारण करें।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं आपको वैसे ही मुकुट धारण किए, गदा और हाथ में चक्र लिए देखना चाहता हूँ। हे सहस्रबाहो, हे विश्वमूर्ते, आप उसी चतुर्भुज रूप में प्रकट हों।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के सगुण रूप की उपासना भक्त के लिए सहज और प्रिय है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 46 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 46/55 84% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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