पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
18 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
पहले न देखे हुए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ, और साथ ही भय से मेरा मन व्याकुल है। हे देव, मुझे वही (पूर्व) रूप दिखाइए। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व
श्रीमद्भगवद्गीता का एकादश अध्याय 'विश्व-रूप दर्शन योग' के नाम से विख्यात है। यह अध्याय मानव चेतना के उस चरम शिखर को दर्शाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त होकर पूर्ण तादात्म्य स्थापित होता है। अर्जुन का यह कथन—"अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा"—केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि एक जीवात्मा की उस विस्मयकारी स्थिति का वर्णन है, जहाँ वह अनंत ब्रह्मांड को एक बिंदु में समाहित देखता है।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि ईश्वर का विराट स्वरूप न केवल भय उत्पन्न करने वाला है, बल्कि वह परम आनंद का स्रोत भी है। जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के उस अनंत रूप को देखा, जिसमें काल, मृत्यु, सृष्टि और प्रलय का तांडव हो रहा था, तो उनका हृदय हर्ष और भय के द्वंद्व में झूल गया। यह द्वंद्व उस भक्त का है जो ईश्वर की विशालता को देखकर अभिभूत है। यह श्लोक हमें यह बोध कराता है कि ईश्वर केवल प्रेम के पात्र नहीं हैं, वे समस्त अस्तित्व के आधार, नियंता और अंत भी हैं। इस विराट दर्शन के माध्यम से अर्जुन ने यह समझा कि जिसे वे अपना सखा मान रहे थे, वे वास्तव में 'जगन्निवास' हैं—अर्थात वह आधार जिसमें संपूर्ण जगत निवास करता है। यह बोध ही मोक्ष का प्रथम सोपान है, जहाँ भक्त अपने अहंकार को त्यागकर प्रभु के शरणागत हो जाता है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५॥
उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें और भगवान के चतुर्भुज रूप का ध्यान करें। श्लोक के प्रत्येक चरण को स्पष्ट और लयबद्ध तरीके से उच्चारित करना चाहिए।
यह श्लोक गीता के 11वें अध्याय का 45वां श्लोक है। इसमें अर्जुन की व्याकुलता और प्रार्थना का अद्भुत संगम है। अर्जुन कहते हैं कि हे देव! मैंने जो पहले कभी नहीं देखा था, उसे देखकर मैं हर्षित भी हूँ और मेरा मन भय से कांप भी रहा है। अतः हे देवेश! हे जगन्निवास! आप मुझ पर प्रसन्न हों और मुझे अपना वही सौम्य चतुर्भुज रूप पुनः दिखाएं। यह प्रार्थना भक्त की उस कोमलता को दर्शाती है जो विराट के प्रचंड ताप को सहन करने में असमर्थ है, परंतु प्रभु के प्रेम में बंधा हुआ है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के प्रारंभ में, जब अर्जुन ने अपने सगे-संबंधियों को शत्रु पक्ष में देखा, तो वे मोहग्रस्त होकर धनुष त्याग देते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें गीता का उपदेश देते हैं। 11वें अध्याय में, अर्जुन की जिज्ञासा को शांत करने और उन्हें अपनी ईश्वरीय सत्ता का बोध कराने के लिए, भगवान श्रीकृष्ण उन्हें 'दिव्य चक्षु' प्रदान करते हैं।
इस दिव्य दृष्टि से अर्जुन ने जो देखा, वह मानव कल्पना से परे था। उन्होंने देखा कि भगवान के मुख में समस्त ब्रह्मांड समाया हुआ है। वे देखते हैं कि भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे योद्धा काल के मुख में समा रहे हैं। यह दृश्य इतना प्रचंड था कि अर्जुन का मानवीय मन उसे सहन नहीं कर सका। पौराणिक ग्रंथों में इसे 'विश्वरूप दर्शन' कहा गया है। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि ईश्वर का स्वरूप केवल शांत और सौम्य नहीं है, बल्कि वे ही संहारक काल भी हैं।
वेद और उपनिषदों में भी 'विश्वरूप' का वर्णन मिलता है, जहाँ ईश्वर को 'सहस्रशीर्षा पुरुष' कहा गया है। अर्जुन का यह भय कोई साधारण डर नहीं है, बल्कि यह उस 'विस्मय' (Awe) का प्रतीक है जो एक तुच्छ जीव को सर्वशक्तिमान के सामने अनुभव होता है। यह प्रसंग हमें यह भी बताता है कि भक्ति मार्ग में 'ऐश्वर्य' और 'माधुर्य' का संतुलन आवश्यक है। अर्जुन का 'जगन्निवास' कहकर पुकारना यह सिद्ध करता है कि वे भगवान को केवल अपना मित्र नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि का आधार मान चुके हैं। यह अध्याय हमें यह भी शिक्षा देता है कि जब तक हम अपने अहंकार का पूर्ण समर्पण नहीं करते, तब तक हम प्रभु के वास्तविक स्वरूप को नहीं देख सकते।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों, विशेषकर शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और स्वामी चिन्मयानंद जी के व्याख्यानों के आधार पर संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों और उपनिषदों के सार से जोड़ना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि भक्ति और ज्ञान के समन्वय पर बल देता है। सभी संदर्भ गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित 'श्रीमद्भगवद्गीता' से लिए गए हैं, जो कि आध्यात्मिक जगत में एक मानक ग्रंथ माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
पहले न देखे हुए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ, और साथ ही भय से मेरा मन व्याकुल है। हे देव, मुझे वही (पूर्व) रूप दिखाइए। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के विराट रूप के दर्शन के बाद भी भक्त उनके सगुण रूप के दर्शन चाहता है।