विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 45

श्लोक ४५ में अर्जुन विराट रूप देखकर हर्षित और भयभीत हैं, अब पूर्व रूप दिखाने की प्रार्थना करते हैं। Verse 45: Arjuna, thrilled and frightened, asks to see the former form.

संस्कृत श्लोक

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५॥

adṛṣṭa-pūrvaṃ hṛṣito 'smi dṛṣṭvā bhayena ca pravyathitaṃ mano me | tad eva me darśaya deva rūpaṃ prasīda deveśa jagannivāsa ||45||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अदृष्टपूर्वम्: पहले न देखा हुआ; हृषितः: हर्षित; अस्मि: हूँ; दृष्ट्वा: देखकर; भयेन: भय से; च: और; प्रव्यथितम्: व्याकुल; मनः: मन; मे: मेरा; तत्: वह; एव: ही; मे: मुझे; दर्शय: दिखाइए; देव: हे देव; रूपम्: रूप; प्रसीद: प्रसन्न हों; देवेश: हे देवेश; जगन्निवास: हे जगन्निवास।

हिंदी अनुवाद

पहले न देखे हुए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ, और साथ ही भय से मेरा मन व्याकुल है। हे देव, मुझे वही (पूर्व) रूप दिखाइए। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।

English Translation

I am thrilled, having seen what was never seen before; and my mind is troubled by fear. Show me that (former) form only, O Lord. Be gracious, O Lord of gods, O abode of the universe.

टीका / Commentary

अर्जुन विराट रूप देखकर हर्षित और भयभीत हैं, अब वे चतुर्भुज रूप देखना चाहते हैं।