श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 45

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 24 मिनट का पठन 132 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
अदृष्टपूर्वम्
पहले न देखा हुआ
हृषितः
हर्षित
अस्मि
हूँ
दृष्ट्वा
देखकर
भयेन
भय से
च
और
प्रव्यथितम्
व्याकुल
मनः
मन
मे
मेरा
तत्
वह
एव
ही
मे
मुझे
दर्शय
दिखाइए
देव
हे देव
रूपम्
रूप
प्रसीद
प्रसन्न हों
देवेश
हे देवेश
जगन्निवास
हे जगन्निवास।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

पहले न देखे हुए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ, और साथ ही भय से मेरा मन व्याकुल है। हे देव, मुझे वही (पूर्व) रूप दिखाइए। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि - श्रीमद्भगवद्गीता का विराट दर्शन

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का एकादश अध्याय 'विश्व-रूप दर्शन योग' के नाम से विख्यात है। यह अध्याय मानव चेतना के उस चरम शिखर को दर्शाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त होकर पूर्ण तादात्म्य स्थापित होता है। अर्जुन का यह कथन—"अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा"—केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि एक जीवात्मा की उस विस्मयकारी स्थिति का वर्णन है, जहाँ वह अनंत ब्रह्मांड को एक बिंदु में समाहित देखता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि ईश्वर का विराट स्वरूप न केवल भय उत्पन्न करने वाला है, बल्कि वह परम आनंद का स्रोत भी है। जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के उस अनंत रूप को देखा, जिसमें काल, मृत्यु, सृष्टि और प्रलय का तांडव हो रहा था, तो उनका हृदय हर्ष और भय के द्वंद्व में झूल गया। यह द्वंद्व उस भक्त का है जो ईश्वर की विशालता को देखकर अभिभूत है। यह श्लोक हमें यह बोध कराता है कि ईश्वर केवल प्रेम के पात्र नहीं हैं, वे समस्त अस्तित्व के आधार, नियंता और अंत भी हैं। इस विराट दर्शन के माध्यम से अर्जुन ने यह समझा कि जिसे वे अपना सखा मान रहे थे, वे वास्तव में 'जगन्निवास' हैं—अर्थात वह आधार जिसमें संपूर्ण जगत निवास करता है। यह बोध ही मोक्ष का प्रथम सोपान है, जहाँ भक्त अपने अहंकार को त्यागकर प्रभु के शरणागत हो जाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें और भगवान के चतुर्भुज रूप का ध्यान करें। श्लोक के प्रत्येक चरण को स्पष्ट और लयबद्ध तरीके से उच्चारित करना चाहिए।

यह श्लोक गीता के 11वें अध्याय का 45वां श्लोक है। इसमें अर्जुन की व्याकुलता और प्रार्थना का अद्भुत संगम है। अर्जुन कहते हैं कि हे देव! मैंने जो पहले कभी नहीं देखा था, उसे देखकर मैं हर्षित भी हूँ और मेरा मन भय से कांप भी रहा है। अतः हे देवेश! हे जगन्निवास! आप मुझ पर प्रसन्न हों और मुझे अपना वही सौम्य चतुर्भुज रूप पुनः दिखाएं। यह प्रार्थना भक्त की उस कोमलता को दर्शाती है जो विराट के प्रचंड ताप को सहन करने में असमर्थ है, परंतु प्रभु के प्रेम में बंधा हुआ है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अदृष्टपूर्वंजो पहले कभी नहीं देखाईश्वर का वह स्वरूप जो सामान्य इंद्रियों की पहुंच से परे है।
हृषितोऽस्मिमैं हर्षित हूँपरम सत्य के दर्शन से उत्पन्न होने वाला आत्मिक आनंद।
भयेनभय के कारणअहंकार का विनाश होने पर होने वाली स्वाभाविक घबराहट।
प्रव्यथितंअत्यंत व्यथित/कांपता हुआसीमित चेतना का असीमित विराट को देखकर विचलित होना।
मनो मेमेरा मनअंतःकरण की वह अवस्था जहाँ द्वैत का बोध समाप्त हो रहा है।
तदेववही (रूप)सौम्य चतुर्भुज रूप, जो प्रेम और विश्वास का प्रतीक है।
दर्शयदिखाइएभक्त की प्रभु से याचना, जो कृपा पर आधारित है।
देवेशदेवों के देवईश्वर की सर्वोच्च सत्ता का संबोधन।
जगन्निवासजगत के निवास स्थानवह आधार जिसमें संपूर्ण चराचर जगत स्थित है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के प्रारंभ में, जब अर्जुन ने अपने सगे-संबंधियों को शत्रु पक्ष में देखा, तो वे मोहग्रस्त होकर धनुष त्याग देते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें गीता का उपदेश देते हैं। 11वें अध्याय में, अर्जुन की जिज्ञासा को शांत करने और उन्हें अपनी ईश्वरीय सत्ता का बोध कराने के लिए, भगवान श्रीकृष्ण उन्हें 'दिव्य चक्षु' प्रदान करते हैं।

इस दिव्य दृष्टि से अर्जुन ने जो देखा, वह मानव कल्पना से परे था। उन्होंने देखा कि भगवान के मुख में समस्त ब्रह्मांड समाया हुआ है। वे देखते हैं कि भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे योद्धा काल के मुख में समा रहे हैं। यह दृश्य इतना प्रचंड था कि अर्जुन का मानवीय मन उसे सहन नहीं कर सका। पौराणिक ग्रंथों में इसे 'विश्वरूप दर्शन' कहा गया है। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि ईश्वर का स्वरूप केवल शांत और सौम्य नहीं है, बल्कि वे ही संहारक काल भी हैं।

वेद और उपनिषदों में भी 'विश्वरूप' का वर्णन मिलता है, जहाँ ईश्वर को 'सहस्रशीर्षा पुरुष' कहा गया है। अर्जुन का यह भय कोई साधारण डर नहीं है, बल्कि यह उस 'विस्मय' (Awe) का प्रतीक है जो एक तुच्छ जीव को सर्वशक्तिमान के सामने अनुभव होता है। यह प्रसंग हमें यह भी बताता है कि भक्ति मार्ग में 'ऐश्वर्य' और 'माधुर्य' का संतुलन आवश्यक है। अर्जुन का 'जगन्निवास' कहकर पुकारना यह सिद्ध करता है कि वे भगवान को केवल अपना मित्र नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि का आधार मान चुके हैं। यह अध्याय हमें यह भी शिक्षा देता है कि जब तक हम अपने अहंकार का पूर्ण समर्पण नहीं करते, तब तक हम प्रभु के वास्तविक स्वरूप को नहीं देख सकते।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति: इस श्लोक का नियमित पाठ मन की चंचलता को कम करता है और एकाग्रता बढ़ाता है।
  • अहंकार का नाश: विराट रूप का ध्यान करने से व्यक्ति को अपनी तुच्छता का बोध होता है, जिससे अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • भय से मुक्ति: जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि सब कुछ ईश्वर के नियंत्रण में है, तो सांसारिक भय समाप्त हो जाते हैं।
  • आध्यात्मिक जागृति: यह श्लोक साधक की अंतर्दृष्टि को खोलता है और उसे सूक्ष्म जगत के दर्शन में सहायक होता है।
  • कर्म शुद्धि: भगवान के विराट स्वरूप के प्रति समर्पण से हमारे कर्मों का फल ईश्वर को समर्पित हो जाता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: इस श्लोक के उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि तरंगें वातावरण में सकारात्मकता का संचार करती हैं।
  • ईश्वरीय कृपा: 'जगन्निवास' के प्रति शरणागति से भक्त पर प्रभु की विशेष कृपा दृष्टि बनी रहती है।
  • आत्म-साक्षात्कार: यह श्लोक साधक को स्वयं के भीतर स्थित परमात्मा को पहचानने की प्रेरणा देता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों, विशेषकर शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और स्वामी चिन्मयानंद जी के व्याख्यानों के आधार पर संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों और उपनिषदों के सार से जोड़ना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि भक्ति और ज्ञान के समन्वय पर बल देता है। सभी संदर्भ गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित 'श्रीमद्भगवद्गीता' से लिए गए हैं, जो कि आध्यात्मिक जगत में एक मानक ग्रंथ माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

अर्जुन का भय कोई कायरता नहीं थी, बल्कि वह असीमित शक्ति को देखकर उत्पन्न हुआ विस्मय था। जब एक सीमित मानव चेतना असीमित ब्रह्मांडीय सत्य को देखती है, तो वह उसे सहन करने में असमर्थ होती है।

जगन्निवास का अर्थ है वह स्थान जहाँ संपूर्ण जगत निवास करता है। यह भगवान के सर्वव्यापी होने का प्रमाण है।

हाँ, आज के तनावपूर्ण जीवन में यह श्लोक हमें यह याद दिलाता है कि हम एक बड़ी योजना का हिस्सा हैं, जिससे मानसिक शांति मिलती है।

चतुर्भुज रूप भगवान के ऐश्वर्य और माधुर्य का संतुलन है, जिसे भक्त प्रेमपूर्वक देख और पूज सकता है।

प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के बाद शांत चित्त होकर इस श्लोक का 11 बार पाठ करें और भगवान के सौम्य रूप का ध्यान करें।

© 2023 Bhaktilok.in - आध्यात्मिक ज्ञान का केंद्र

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

पहले न देखे हुए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ, और साथ ही भय से मेरा मन व्याकुल है। हे देव, मुझे वही (पूर्व) रूप दिखाइए। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के विराट रूप के दर्शन के बाद भी भक्त उनके सगुण रूप के दर्शन चाहता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 45 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 45/55 82% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!