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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 44

अध्याय 11 · श्लोक 44

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४॥

tasmāt praṇamya praṇidhāya kāyaṃ prasādaye tvām aham īśam īḍyam | piteva putrasya sakheva sakhyuḥ priyaḥ priyāyārhasi deva soḍhum ||44||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तस्मात्: इसलिए; प्रणम्य: प्रणाम करके; प्रणिधाय: झुकाकर; कायम्: शरीर को; प्रसादये: प्रसन्न करना चाहता हूँ; त्वाम्: आपको; अहम्: मैं; ईशम्: ईश; ईड्यम्: स्तुत्य; पिता: पिता; इव: जैसे; पुत्रस्य: पुत्र के; सखा: मित्र; इव: जैसे; सख्युः: मित्र के; प्रियः: प्रिय; प्रियाया: प्रिया के; अर्हसि: आप योग्य हैं; देव: हे देव; सोढुम्: सहने के लिए।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इसलिए शरीर झुकाकर प्रणाम करके मैं आपको, हे ईश, हे स्तुत्य, प्रसन्न करना चाहता हूँ। जैसे पिता पुत्र के अपराध सह लेता है, मित्र मित्र के, और प्रिय प्रिया के, वैसे ही आप मेरे अपराध सहने के योग्य हैं, हे देव।

English Translation

Therefore, bowing down and prostrating my body before You, O adorable Lord, I seek Your grace. As a father forgives his son, a friend forgives a friend, or a lover forgives his beloved, so should You forgive me, O Lord.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन पिता-पुत्र आदि के उदाहरण देकर क्षमा की याचना करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।