विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 44

श्लोक ४४ में अर्जुन पिता-पुत्र के समान क्षमा की याचना करते हैं। Verse 44: Arjuna seeks forgiveness as a son from a father.

संस्कृत श्लोक

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४॥

tasmāt praṇamya praṇidhāya kāyaṃ prasādaye tvām aham īśam īḍyam | piteva putrasya sakheva sakhyuḥ priyaḥ priyāyārhasi deva soḍhum ||44||

पदच्छेद / शब्दार्थ

तस्मात्: इसलिए; प्रणम्य: प्रणाम करके; प्रणिधाय: झुकाकर; कायम्: शरीर को; प्रसादये: प्रसन्न करना चाहता हूँ; त्वाम्: आपको; अहम्: मैं; ईशम्: ईश; ईड्यम्: स्तुत्य; पिता: पिता; इव: जैसे; पुत्रस्य: पुत्र के; सखा: मित्र; इव: जैसे; सख्युः: मित्र के; प्रियः: प्रिय; प्रियाया: प्रिया के; अर्हसि: आप योग्य हैं; देव: हे देव; सोढुम्: सहने के लिए।

हिंदी अनुवाद

इसलिए शरीर झुकाकर प्रणाम करके मैं आपको, हे ईश, हे स्तुत्य, प्रसन्न करना चाहता हूँ। जैसे पिता पुत्र के अपराध सह लेता है, मित्र मित्र के, और प्रिय प्रिया के, वैसे ही आप मेरे अपराध सहने के योग्य हैं, हे देव।

English Translation

Therefore, bowing down and prostrating my body before You, O adorable Lord, I seek Your grace. As a father forgives his son, a friend forgives a friend, or a lover forgives his beloved, so should You forgive me, O Lord.

टीका / Commentary

अर्जुन पिता-पुत्र आदि के उदाहरण देकर क्षमा की याचना करते हैं।