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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 43

अध्याय 11 · श्लोक 43

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३॥

pitāsi lokasya carācarasya tvam asya pūjyaś ca gurur garīyān | na tvat-samo 'sty abhyadhikaḥ kuto 'nyo loka-traye 'py apratima-prabhāva ||43||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

पिता: पिता; असि: हैं; लोकस्य: लोकों के; चराचरस्य: चर और अचर सहित; त्वम्: आप; अस्य: इसके; पूज्यः: पूज्य; च: और; गुरुः: गुरु; गरीयान्: महान्; न: नहीं; त्वत्समः: आपके समान; अस्ति: है; अभ्यधिकः: श्रेष्ठ; कुतः: कहाँ; अन्यः: अन्य; लोकत्रये: तीनों लोकों में; अपि: भी; अप्रतिमप्रभाव: हे अप्रतिम प्रभाव वाले।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

आप इस चराचर जगत् के पिता हैं, आप इसके पूज्य और महान् गुरु हैं। आपके समान कोई नहीं है; तीनों लोकों में आपसे श्रेष्ठ और कौन हो सकता है, हे अप्रतिम प्रभाव वाले?

English Translation

You are the father of this world, of all that moves and does not move; You are its worshipful teacher and greatest guru. No one is equal to You; how could there be anyone greater in the three worlds, O Being of incomparable power?

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन भगवान् की अतुलनीयता का वर्णन करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।