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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 42

अध्याय 11 · श्लोक 42

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२॥

yac cāvahāsārtham asatkṛto 'si vihāra-śayyāsana-bhojaneṣu | eko 'thavāpy acyuta tat samakṣaṃ tat kṣāmaye tvām aham aprameyam ||42||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यत्: जो; च: और; अवहासार्थम्: हँसी के लिए; असत्कृतः: अपमानित; असि: हुए; विहार: विहार में; शय्या: शय्या पर; आसन: आसन पर; भोजनेषु: भोजन में; एकः: अकेले; अथवा: अथवा; अपि: भी; अच्युत: हे अच्युत; तत्: उस; समक्षम्: उन सबके सामने; तत्: उसके लिए; क्षामये: क्षमा माँगता हूँ; त्वाम्: आपसे; अहम्: मैं; अप्रमेयम्: हे अप्रमेय।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

और विहार, शय्या, आसन और भोजन में हँसी-मजाक के लिए जो आपका अपमान किया गया हो, चाहे अकेले में या दूसरों के सामने, हे अच्युत, उस सबके लिए मैं आपसे, हे अप्रमेय, क्षमा माँगता हूँ।

English Translation

And whatever disrespect I have shown You in jest, while playing, resting, sitting, or eating, whether alone or in the presence of others, O Achyuta, for all that I beg Your forgiveness, O immeasurable One.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन सभी परिस्थितियों में अनजाने में किए गए अपमान की क्षमा माँगते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।