विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 42
श्लोक ४२ में अर्जुन सभी प्रकार के अनादर के लिए क्षमा माँगते हैं। Verse 42: Arjuna seeks forgiveness for all forms of disrespect.
संस्कृत श्लोक
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२॥
yac cāvahāsārtham asatkṛto 'si vihāra-śayyāsana-bhojaneṣu | eko 'thavāpy acyuta tat samakṣaṃ tat kṣāmaye tvām aham aprameyam ||42||
पदच्छेद / शब्दार्थ
यत्: जो; च: और; अवहासार्थम्: हँसी के लिए; असत्कृतः: अपमानित; असि: हुए; विहार: विहार में; शय्या: शय्या पर; आसन: आसन पर; भोजनेषु: भोजन में; एकः: अकेले; अथवा: अथवा; अपि: भी; अच्युत: हे अच्युत; तत्: उस; समक्षम्: उन सबके सामने; तत्: उसके लिए; क्षामये: क्षमा माँगता हूँ; त्वाम्: आपसे; अहम्: मैं; अप्रमेयम्: हे अप्रमेय।
हिंदी अनुवाद
और विहार, शय्या, आसन और भोजन में हँसी-मजाक के लिए जो आपका अपमान किया गया हो, चाहे अकेले में या दूसरों के सामने, हे अच्युत, उस सबके लिए मैं आपसे, हे अप्रमेय, क्षमा माँगता हूँ।
English Translation
And whatever disrespect I have shown You in jest, while playing, resting, sitting, or eating, whether alone or in the presence of others, O Achyuta, for all that I beg Your forgiveness, O immeasurable One.
टीका / Commentary
अर्जुन सभी परिस्थितियों में अनजाने में किए गए अपमान की क्षमा माँगते हैं।