पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
20 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
और विहार, शय्या, आसन और भोजन में हँसी-मजाक के लिए जो आपका अपमान किया गया हो, चाहे अकेले में या दूसरों के सामने, हे अच्युत, उस सबके लिए मैं आपसे, हे अप्रमेय, क्षमा माँगता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय, जिसे 'विश्वरूपदर्शनयोग' कहा जाता है, का यह 42वाँ श्लोक केवल एक क्षमा याचना नहीं है, बल्कि यह भक्त और भगवान के बीच के उस अलौकिक संबंध का प्रतिबिंब है जहाँ प्रेम, मर्यादा और दिव्यता का मिलन होता है। जब अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के उस विराट और अनंत रूप का दर्शन करते हैं, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड, काल, और देवता समाहित हैं, तब उनके भीतर एक गहरा आत्म-बोध जागृत होता है। अब तक अर्जुन श्रीकृष्ण को अपना एक प्रिय मित्र, सखा और संबंधी मानते आए थे। उन्होंने उनके साथ परिहास किया, साथ भोजन किया और सामान्य मानवीय व्यवहार किया। किंतु, ईश्वर के ऐश्वर्यमय रूप को देखकर अर्जुन को अपनी उन 'भूलों' का आभास होता है जो उन्होंने अनजाने में की थीं।
यह श्लोक आध्यात्मिक यात्रा के उस पड़ाव को दर्शाता है जहाँ साधक अपने अहंकार को त्यागकर पूर्णतः शरणागत हो जाता है। यहाँ 'सख्य भाव' (मित्रता का भाव) 'दास्य भाव' और 'विस्मय' में परिवर्तित हो रहा है। सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि ईश्वर हमारे कितने भी निकट क्यों न हों, उनकी महिमा और गरिमा के प्रति सदैव सम्मान का भाव बना रहना चाहिए। यह मानवीय संबंधों में भी मर्यादा की महत्ता को प्रतिपादित करता है। आध्यात्मिक रूप से, यह श्लोक 'अपराध बोध' से मुक्ति का मार्ग है। जब हम अपनी सीमाओं को स्वीकार कर लेते हैं और उस 'अप्रमेय' (अपरिमित) सत्ता के सामने नतमस्तक होते हैं, तभी वास्तविक ज्ञान का उदय होता है। यह श्लोक ब्रह्मांडीय चेतना के प्रति हमारी लघुता और उस लघुता में छिपे महान सत्य का उद्घाटन करता है।
आज के आधुनिक युग में, जहाँ मनुष्य अपने ज्ञान और उपलब्धियों के अहंकार में डूबा रहता है, यह श्लोक एक दर्पण की तरह है। यह हमें याद दिलाता है कि हम चाहे कितने भी समर्थ क्यों न हो जाएं, उस परम सत्ता के समक्ष हम सदैव एक जिज्ञासु और क्षमाप्रार्थी ही रहेंगे। अर्जुन की यह प्रार्थना वास्तव में हर उस जीवात्मा की पुकार है जो माया के आवरण को हटाकर सत्य के साक्षात दर्शन करना चाहती है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२॥
पदच्छेद (Transliteration):
yat ca avahāsārtham asatkṛtaḥ asi vihāra-śayyā-āsana-bhojaneṣu |
ekaḥ athavā api acyuta tat-samakṣam tat kṣāmaye tvām aham aprameyam || 42 ||
सरल हिंदी अनुवाद:
"हे अच्युत! विहार (खेल-कूद), शय्या (विश्राम), आसन और भोजन के समय, अकेले में अथवा उन मित्रों के सामने, परिहास (मजाक) के लिए जो आपका अपमान हुआ है, उस सबके लिए मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ, क्योंकि आप अप्रमेय (अचिन्त्य प्रभाव वाले) हैं।"
पाठ की विधि:
इस श्लोक का पाठ विशेष रूप से तब करना चाहिए जब मन में अनजाने में किए गए अपराधों के प्रति ग्लानि हो। प्रातः काल स्नान के पश्चात, भगवान कृष्ण के चित्र या विग्रह के सम्मुख बैठकर, हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र भाव से इस श्लोक का 11 या 21 बार जाप करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है और अहंकार का शमन होता है। इसे 'क्षमा प्रार्थना' के रूप में दैनिक पूजा के अंत में भी पढ़ा जा सकता है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
महाभारत के युद्ध क्षेत्र कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन विषादग्रस्त हुए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें उपदेश देना प्रारंभ किया। अध्याय 1 से 10 तक, कृष्ण ने ज्ञान, कर्म और भक्ति के विभिन्न आयामों को समझाया। लेकिन अध्याय 11 में, अर्जुन की जिज्ञासा और अधिक बढ़ गई। उन्होंने भगवान से उनके उस रूप को दिखाने की प्रार्थना की जिससे इस संपूर्ण जगत की उत्पत्ति और प्रलय होता है। जब भगवान ने अपना 'विश्वरूप' प्रकट किया, तो अर्जुन ने देखा कि हज़ारों सूर्य एक साथ चमक रहे हैं, सभी दिशाएं भगवान के शरीर से व्याप्त हैं, और काल (समय) स्वयं उनके मुख में समा रहा है।
इस दृश्य को देखकर अर्जुन का सारा मोह और अहंकार नष्ट हो गया। उन्हें याद आया कि वे जिस कृष्ण को 'हे कृष्ण', 'हे यादव', 'हे सखा' कहकर पुकारते थे, वे साक्षात परब्रह्म हैं। पौराणिक संदर्भों के अनुसार, अर्जुन और कृष्ण 'नर' और 'नारायण' के अवतार माने जाते हैं। उनके बीच का प्रेम इतना प्रगाढ़ था कि वे अक्सर एक-दूसरे से हंसी-मजाक करते थे। महाभारत के 'उद्योग पर्व' और 'सभा पर्व' में ऐसे कई प्रसंग आते हैं जहाँ अर्जुन और कृष्ण एक ही आसन पर बैठकर भोजन करते हैं या वन विहार के समय विनोद करते हैं।
ऋषि वेदव्यास ने इस श्लोक के माध्यम से यह संदेश दिया है कि जब तक जीव को ईश्वर की महिमा का ज्ञान नहीं होता, वह उन्हें अपनी तरह ही एक साधारण प्राणी समझता है। यह 'माया' का प्रभाव है। लेकिन जैसे ही ज्ञान का चक्षु खुलता है, जीव को अपनी लघुता का आभास होता है। अर्जुन का यह विलाप और क्षमा याचना वास्तव में एक भक्त की परिपक्वता को दर्शाती है। यह श्लोक हमें यह भी बताता है कि भगवान 'भक्त-वत्सल' हैं; वे अपने भक्त के द्वारा अनजाने में किए गए अपराधों को बुरा नहीं मानते, फिर भी भक्त का कर्तव्य है कि वह अपनी भूलों को स्वीकार करे।
शास्त्रीय दृष्टि से, यहाँ 'अप्रमेय' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। उपनिषदों में ब्रह्म को 'अवाङ्मनसगोचरम्' कहा गया है, अर्थात जो वाणी और मन की पहुँच से बाहर है। अर्जुन इसी सत्य को स्वीकार कर रहे हैं कि जिस ईश्वर को वे अपनी बुद्धि से मापना चाहते थे, वे वास्तव में अपरिमेय हैं।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
यह लेख 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत आता है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत सिद्धांतों और महान आचार्यों की टीकाओं (जैसे आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और श्रील प्रभुपाद) के आधार पर संकलित किया गया है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्या का उद्देश्य पाठक को केवल शाब्दिक अर्थ बताना नहीं, बल्कि श्लोक के पीछे छिपे उस मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक परिवर्तन को समझाना है जिससे अर्जुन गुजरे थे। यह श्लोक भक्ति मार्ग के 'दैन्य' (Humility) भाव का सर्वोत्तम उदाहरण है। हमारी शोध टीम ने यह सुनिश्चित किया है कि सामग्री की गरिमा और शुद्धता बनी रहे, ताकि जिज्ञासु पाठक इसे अपने जीवन में आत्मसात कर सकें। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, बल्कि आत्म-निरीक्षण और आध्यात्मिक अनुशासन पर बल देती है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
और विहार, शय्या, आसन और भोजन में हँसी-मजाक के लिए जो आपका अपमान किया गया हो, चाहे अकेले में या दूसरों के सामने, हे अच्युत, उस सबके लिए मैं आपसे, हे अप्रमेय, क्षमा माँगता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के प्रति हर प्रकार की असावधानी के लिए क्षमा माँगनी चाहिए।