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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 41

अध्याय 11 · श्लोक 41

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१॥

sakheti matvā prasabhaṃ yad uktaṃ he kṛṣṇa he yādava he sakheti | ajānatā mahimānaṃ tavedaṃ mayā pramādāt praṇayena vāpi ||41||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सखा: मित्र; इति: इस प्रकार; मत्वा: मानकर; प्रसभम्: प्रगल्भता से; यत्: जो; उक्तम्: कहा गया; हे कृष्ण: हे कृष्ण; हे यादव: हे यादव; हे सख: हे मित्र; इति: इस प्रकार; अजानता: न जानते हुए; महिमानम्: महिमा को; तव: आपकी; इदम्: यह; मया: मेरे द्वारा; प्रमादात्: प्रमाद से; प्रणयेन: स्नेह से; वा: या; अपि: भी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

आपको मित्र मानकर प्रगल्भता से जो कुछ भी मैंने कहा – "हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे" – वह सब आपकी इस महिमा को न जानते हुए, प्रमाद या स्नेहवश कहा गया।

English Translation

Whatever I have said rashly, addressing You as "O Krishna," "O Yadava," "O friend," not knowing Your greatness, out of negligence or affection.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन अपनी पूर्व की अनौपचारिक बातों के लिए क्षमा माँगते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।