विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 41

श्लोक ४१ में अर्जुन भगवान् से अपनी अनजाने में की गई बातों के लिए क्षमा माँगते हैं। Verse 41: Arjuna apologizes for his informal addresses, not knowing the Lord's greatness.

संस्कृत श्लोक

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१॥

sakheti matvā prasabhaṃ yad uktaṃ he kṛṣṇa he yādava he sakheti | ajānatā mahimānaṃ tavedaṃ mayā pramādāt praṇayena vāpi ||41||

पदच्छेद / शब्दार्थ

सखा: मित्र; इति: इस प्रकार; मत्वा: मानकर; प्रसभम्: प्रगल्भता से; यत्: जो; उक्तम्: कहा गया; हे कृष्ण: हे कृष्ण; हे यादव: हे यादव; हे सख: हे मित्र; इति: इस प्रकार; अजानता: न जानते हुए; महिमानम्: महिमा को; तव: आपकी; इदम्: यह; मया: मेरे द्वारा; प्रमादात्: प्रमाद से; प्रणयेन: स्नेह से; वा: या; अपि: भी।

हिंदी अनुवाद

आपको मित्र मानकर प्रगल्भता से जो कुछ भी मैंने कहा – "हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे" – वह सब आपकी इस महिमा को न जानते हुए, प्रमाद या स्नेहवश कहा गया।

English Translation

Whatever I have said rashly, addressing You as "O Krishna," "O Yadava," "O friend," not knowing Your greatness, out of negligence or affection.

टीका / Commentary

अर्जुन अपनी पूर्व की अनौपचारिक बातों के लिए क्षमा माँगते हैं।