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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 40

अध्याय 11 · श्लोक 40

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४०॥

namaḥ purastād atha pṛṣṭhatas te namo 'stu te sarvata eva sarva | ananta-vīryāmita-vikramas tvaṃ sarvaṃ samāpnoṣi tato 'si sarvaḥ ||40||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

नमः: नमस्कार; पुरस्तात्: सामने से; अथ: और; पृष्ठतः: पीछे से; ते: आपको; नमः: नमस्कार; अस्तु: हो; ते: आपको; सर्वतः: सब ओर से; एव: ही; सर्व: हे सर्व (सब कुछ); अनन्तवीर्य: अनंत पराक्रम वाले; अमितविक्रम: अपरिमित पराक्रम वाले; त्वम्: आप; सर्वम्: सब कुछ; समाप्नोषि: व्याप्त करते हैं; ततः: इसलिए; असि: हैं; सर्वः: सर्व (सब कुछ)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

आपको सामने से नमस्कार, पीछे से नमस्कार, हे सर्व, आपको सब ओर से नमस्कार है। हे अनन्तवीर्य, हे अमितविक्रम, आप सब कुछ व्याप्त करते हैं, इसलिए आप ही सर्व कुछ हैं।

English Translation

Salutations to You from the front and from behind; salutations to You from all sides, O All! O You of infinite power and immeasurable prowess, You pervade everything, and hence You are everything.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन भगवान् को सर्वव्यापी मानते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।