आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:३० PM | सूर्यास्त: ०५:३१ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 37

अध्याय 11 · श्लोक 37

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७॥

kasmāc ca te na nameran mahātman garīyase brahmaṇo 'py ādi-kartre | ananta deveśa jagannivāsa tvam akṣaraṃ sad-asat tat-paraṃ yat ||37||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कस्मात्: क्यों; च: और; ते: आपको; न: नहीं; नमेरन्: नमस्कार करेंगे; महात्मन्: हे महात्मन्; गरीयसे: महान; ब्रह्मणः: ब्रह्मा से भी; अपि: भी; आदिकर्त्रे: आदि के कर्ता; अनन्त: हे अनन्त; देवेश: हे देवेश; जगन्निवास: हे जगन्निवास; त्वम्: आप; अक्षरम्: अविनाशी; सत्: सत्; असत्: असत्; तत्परम्: उससे परे; यत्: जो।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे महात्मन्, आप सबसे श्रेष्ठ हैं, ब्रह्मा जी के भी आदिकर्ता हैं; फिर आपको सब लोग नमस्कार क्यों न करें? हे अनन्त, हे देवेश, हे जगन्निवास, आप वह अक्षर (अविनाशी) हैं, जो सत् और असत् से परे है।

English Translation

Why should they not bow to You, O great soul, greater than all, the original creator even of Brahma? O infinite one, O Lord of gods, O abode of the universe, You are the imperishable, the cause of all manifestation, and beyond the manifested and the unmanifested.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन भगवान् की सर्वोच्चता का वर्णन करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।