विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 37

श्लोक ३७ में अर्जुन भगवान् को ब्रह्मा का भी कर्ता और सत्-असत् से परे बताते हैं। Verse 37: Arjuna describes the Lord as supreme, beyond even Brahma.

संस्कृत श्लोक

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७॥

kasmāc ca te na nameran mahātman garīyase brahmaṇo 'py ādi-kartre | ananta deveśa jagannivāsa tvam akṣaraṃ sad-asat tat-paraṃ yat ||37||

पदच्छेद / शब्दार्थ

कस्मात्: क्यों; च: और; ते: आपको; न: नहीं; नमेरन्: नमस्कार करेंगे; महात्मन्: हे महात्मन्; गरीयसे: महान; ब्रह्मणः: ब्रह्मा से भी; अपि: भी; आदिकर्त्रे: आदि के कर्ता; अनन्त: हे अनन्त; देवेश: हे देवेश; जगन्निवास: हे जगन्निवास; त्वम्: आप; अक्षरम्: अविनाशी; सत्: सत्; असत्: असत्; तत्परम्: उससे परे; यत्: जो।

हिंदी अनुवाद

हे महात्मन्, आप सबसे श्रेष्ठ हैं, ब्रह्मा जी के भी आदिकर्ता हैं; फिर आपको सब लोग नमस्कार क्यों न करें? हे अनन्त, हे देवेश, हे जगन्निवास, आप वह अक्षर (अविनाशी) हैं, जो सत् और असत् से परे है।

English Translation

Why should they not bow to You, O great soul, greater than all, the original creator even of Brahma? O infinite one, O Lord of gods, O abode of the universe, You are the imperishable, the cause of all manifestation, and beyond the manifested and the unmanifested.

टीका / Commentary

अर्जुन भगवान् की सर्वोच्चता का वर्णन करते हैं।