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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 36

अध्याय 11 · श्लोक 36

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अर्जुन उवाच । स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ३६॥

arjuna uvāca | sthāne hṛṣīkeśa tava prakīrtyā jagat prahṛṣyaty anurajyate ca | rakṣāṃsi bhītāni diśo dravanti sarve namasyanti ca siddha-saṅghāḥ ||36||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अर्जुन: अर्जुन; उवाच: बोले; स्थाने: उचित ही; हृषीकेश: हे हृषीकेश; तव: आपकी; प्रकीर्त्या: कीर्ति से; जगत्: जगत्; प्रहृष्यति: हर्षित होता है; अनुरज्यते: अनुरक्त होता है; च: और; रक्षांसि: राक्षस; भीतानि: भयभीत; दिशः: दिशाओं में; द्रवन्ति: भागते हैं; सर्वे: सभी; नमस्यन्ति: नमस्कार करते हैं; च: और; सिद्धसङ्घाः: सिद्धों के समूह।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अर्जुन बोले: हे हृषीकेश, आपकी कीर्ति से जगत् का हर्षित और अनुरक्त होना उचित ही है; राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी सिद्धों के समूह आपको नमस्कार कर रहे हैं।

English Translation

Arjuna said: It is proper, O Hrishikesha, that the world rejoices and is attracted by Your praise; the terrified demons flee in all directions, and all the hosts of perfected ones bow to You.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन भगवान् की स्तुति करते हुए कहते हैं कि सब उनकी महिमा से प्रभावित हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।