श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 36

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 43 मिनट का पठन 144 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच । स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ३६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
अर्जुन
अर्जुन
उवाच
बोले
स्थाने
उचित ही
हृषीकेश
हे हृषीकेश
तव
आपकी
प्रकीर्त्या
कीर्ति से
जगत्
जगत्
प्रहृष्यति
हर्षित होता है
अनुरज्यते
अनुरक्त होता है
च
और
रक्षांसि
राक्षस
भीतानि
भयभीत
दिशः
दिशाओं में
द्रवन्ति
भागते हैं
सर्वे
सभी
नमस्यन्ति
नमस्कार करते हैं
च
और
सिद्धसङ्घाः
सिद्धों के समूह।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अर्जुन बोले: हे हृषीकेश, आपकी कीर्ति से जगत् का हर्षित और अनुरक्त होना उचित ही है; राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी सिद्धों के समूह आपको नमस्कार कर रहे हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रस्तावना: भगवद्गीता के एकादश अध्याय का विराट सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भागवतगीता को उपनिषदों का सार माना गया है। गीता का प्रत्येक श्लोक मानव जीवन की उलझनों को सुलझाने और आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का एक दिव्य मार्ग है। विशेष रूप से, ग्यारहवां अध्याय—जिसे 'विश्वस्वरूपदर्शन योग' कहा जाता है—भारतीय अध्यात्म का वह सर्वोच्च शिखर है जहाँ अर्जुन अपनी भौतिक चेतना से ऊपर उठकर सम्पूर्ण ब्रह्मांड को भगवान श्री कृष्ण के विराट स्वरूप में समाहित देखते हैं। इस अध्याय में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपनी योगशक्ति का वह स्वरूप दिखाया, जो न तो इससे पहले किसी ने देखा था और न ही कोई सहजता से देख सकता है।

जब अर्जुन ने उस अनंत कोटि ब्रह्मांड नायक, तेजोमय, अस्त्र-शस्त्र सुसज्जित, और प्रलयंकारी अग्नि जैसे मुख वाले रूप का दर्शन किया, तो उनका मन विस्मय, भय, और अगाध प्रेम से भर गया। प्रस्तुत श्लोक (संख्या 36) उसी परम विस्मय की अभिव्यक्ति है। इसमें अर्जुन स्वीकार करते हैं कि संसार का भगवान की कीर्ति से प्रफुल्लित होना, असुरों का भयभीत होकर दिशाओं में भागना और सिद्धों द्वारा नमन किया जाना—यह सब पूरी तरह से उचित, स्वाभाविक और न्यायसंगत है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि किस प्रकार एक भक्त को ईश्वर की सर्वव्यापकता, उनकी न्यायकारिणी शक्ति और उनके पालक स्वरूप के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करनी चाहिए। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और मानसिक अशांति के बीच, यह श्लोक साधक को यह स्मरण कराता है कि इस ब्रह्मांड का संचालन किसी यादृच्छिक (random) घटना के अधीन नहीं है, बल्कि यह एक सुव्यवस्थित दिव्य विधान है जिसके केंद्र में परमेश्वर की महिमा विराजमान है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं सस्वर उच्चारण विधि

गीता महात्म्य - श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 11, श्लोक 36)
अर्जुन उवाच ।
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ३६॥

सस्वर पाठ विधि: इस श्लोक का उच्चारण करते समय 'स्थाने' शब्द पर विशेष बल दें। 'हृषीकेश' संबोधन में इंद्रियों के स्वामी भगवान कृष्ण के प्रति आदर भाव झलकना चाहिए। श्लोक के पूर्वार्ध में आनंद और अनुराग का भाव होना चाहिए, जबकि उत्तरार्ध ('रक्षांसि भीतानि...') में ब्रह्मांडीय अनुशासन और शक्ति का गंभीर प्रभाव प्रकट होना चाहिए। प्रातःकाल स्नान के पश्चात शुद्ध मन से इस श्लोक का तीन, सात या ग्यारह बार पाठ करने से चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

वैदिक संस्कृत व्याकरण और आचार्यों के भाष्यों के आधार पर इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का सूक्ष्म विश्लेषण नीचे सारणीबद्ध किया गया है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual & Philosophical Sense)
अर्जुन उवाच अर्जुन बोले जीव (नरात्मन) का परमात्मा के समक्ष पूर्ण आत्मसमर्पण और संवाद की शुरुआत।
स्थाने यह उचित ही है / स्थान पर है भगवान की महिमा और उसके परिणामस्वरूप होने वाली प्रतिक्रियाओं की पूर्ण तार्किकता और न्यायसंगतता।
हृषीकेश इंद्रियों के स्वामी (हे कृष्ण!) वह शक्ति जो हमारी समस्त ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों को नियंत्रित और संचालित करती है।
तव प्रकीर्त्या आपकी महिमा, यश या कीर्ति से परमात्मा के गुणों और उनके नाम के स्मरण का अनंत और पावन प्रभाव।
जगत् प्रहृष्यति यह संसार प्रफुल्लित होता है / हर्षित होता है सात्विक प्रकृतियों और संतों के हृदय में ईश्वर के यश से उत्पन्न होने वाला आनंद और संतोष।
अनुरज्यते च और प्रेम करता है / अनुरक्त होता है संसार का भगवान के प्रति सहज आकर्षण और अनन्य भक्ति भाव का जागृत होना।
रक्षांसि भीतानि राक्षस भयभीत होकर असुरी प्रवृत्तियों, अहंकार, अधर्म और नकारात्मक ताकतों का दिव्य प्रकाश से कांप उठना।
दिशो द्रवन्ति दिशाओं में भाग जाते हैं अधर्म और बुराई का कोई स्थायी अस्तित्व न होना; सत्य के आगे असत्य का तितर-बितर हो जाना।
सर्वे समस्त बिना किसी अपवाद के संपूर्ण ब्रह्मांडीय शक्तियां और जीव-समुदाय।
नमस्यन्ति च और प्रणाम करते हैं / नमस्कार करते हैं सर्वोच्च सत्ता के समक्ष पूर्ण श्रद्धा, विनीत भाव और समर्पण की मुद्रा।
सिद्धसङ्घाः सिद्धों के समुदाय (उच्च लोकवासी ऋषि-मुनि) वे महान आत्माएं जिन्होंने साधना से सिद्धि प्राप्त की है, वे भी इस विराट रूप को नमन करती हैं।

व्याख्यात्मक निष्कर्ष: इस श्लोक में अर्जुन स्पष्ट करते हैं कि हे हृषीकेश! आपकी महिमा का गान सुनकर जहाँ एक ओर सात्विक जगत आनंदित और अनुरक्त होता है, वहीं तामसी और असुरी शक्तियाँ भयभीत होकर भाग खड़ी होती हैं। सिद्ध पुरुष भी इस महान व्यवस्था के आगे नतमस्तक हैं। यह संतुलन इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर का स्वरूप केवल करुणा का ही नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का भी है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के महासमर के ठीक पहले, जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन का गांडीव हाथ से छूटने लगा और उनके मन में अपने ही स्वजनों के वध का मोह उत्पन्न हुआ, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वही 'श्रीमद्भगवद्गीता' के रूप में अमर हो गया। आरंभिक अध्यायों में भगवान ने ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग का मार्ग दिखाया। किंतु अर्जुन के मन में अभी भी यह जिज्ञासा थी कि भगवान का वास्तविक, सर्वव्यापक और अलौकिक स्वरूप कैसा है।

अध्याय 11 के आरंभ में अर्जुन प्रार्थना करते हैं— 'यदि मन्यसे मया दृष्टं इति मे प्रभु योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्' (हे प्रभु! यदि आप समझते हैं कि मैं आपके उस रूप को देखने में समर्थ हूँ, तो हे योगेश्वर! मुझे अपने अविनाशी स्वरूप के दर्शन कराइए)। अर्जुन की इस आर्त पुकार और अनन्य भाव को देखकर भगवान कृष्ण ने उन्हें दिव्य चक्षु (दिव्य दृष्टि) प्रदान की। इस दिव्य दृष्टि के मिलते ही अर्जुन के सामने ब्रह्मांड का पर्दा उठ गया। उन्होंने देखा कि एक ही शरीर में संपूर्ण देवता, विविध भूत-प्रांत, ब्रह्मा, शिव, ऋषिगण और दिव्य सर्प विराजमान हैं। अनंत भुजाएँ, पेट, मुख और नेत्रों वाले उस विराट रूप की प्रभा हजारों सूर्यों के एक साथ उदय होने जैसी थी।

इस अद्भुत और भयानक रूप को देखकर अर्जुन कांप उठे। उन्होंने देखा कि कौरव पक्ष के तमाम योद्धा—भीष्म, द्रोण, कर्ण और उनके अपने ही सैनिक—भगवान के प्रलयंकारी मुखों में तेजी से प्रवेश कर रहे हैं और उनके भयानक दाँतों के बीच पीस रहे हैं। यह दृश्य देखकर अर्जुन भयभीत हो गए और उन्होंने भगवान से उनके शांत, चतुर्भुज रूप में लौटने की प्रार्थना की। प्रस्तुत श्लोक (36वां) उसी दिव्य दर्शन के मध्य अर्जुन की मानसिक स्थिति और ब्रह्मांडीय यथार्थ की स्वीकृति को दर्शाता है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि मनुष्य जब अपनी सीमित बुद्धि के अहंकार को त्यागकर विराट सत्य का दर्शन करता है, तो उसे समझ में आता है कि इस संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है—चाहे वह संतों का आनंद हो या अधर्मियों का पतन—वह सब उस परमेश्वर की महान व्यवस्था का हिस्सा है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

शास्त्रों और आचार्यों के अनुसार, श्रीमद्भागवतगीता के इन गूढ़ श्लोकों का मनन और पाठ करने से मनुष्य को अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं। इस विशेष श्लोक के जप व स्मरण से निम्नलिखित आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक लाभ सिद्ध होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ करने से मन की उथल-पुथल शांत होती है। 'हृषीकेश' स्मरण से इंद्रियों पर नियंत्रण पाने की शक्ति मिलती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)

श्लोक के पावन शब्दों का उच्चारण करने से शरीर के चारों ओर एक उच्च आध्यात्मिक आवृत्ति (Vibration) और सुरक्षा कवच का निर्माण होता है।

3. भय और असुरक्षा की भावना का नाश

जैसे भगवान की कीर्ति से राक्षस भयभीत होकर भागते हैं, वैसे ही इस श्लोक के प्रभाव से साधक के मन के अज्ञात भय, फोबिया और नकारात्मक विचार दूर होते हैं।

4. कर्म शुद्धि और कर्तव्यपरायणता

यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि संसार में हर क्रिया की एक न्यायसंगत व्यवस्था है, जिससे व्यक्ति निष्काम कर्म (बिना फल की चिंता किए कर्म) करने की प्रेरणा पाता है।

5. भक्ति और समर्पण भाव में वृद्धि

अर्जुन की तरह ईश्वर के विराट स्वरूप के प्रति विस्मय और श्रद्धा जगाने से साधक का अहंकार गलता है और वह अनन्य भक्त बनता है।

6. उच्च लोक की प्राप्ति एवं साधना सिद्धि

सिद्ध संघों द्वारा नमन किए जाने वाले प्रभु का स्मरण करने से साधक की आध्यात्मिक साधना में आने वाली बाधाएं स्वतः समाप्त होने लगती हैं।

7. निर्णय लेने की क्षमता का विकास

संकट के समय अर्जुन की भाँति भ्रमित होने पर जब कोई इस श्लोक का स्मरण करता है, तो उसे जीवन के सही और गलत मार्ग का बोध होने लगता है।

8. दिव्य कृपा और संरक्षण की अनुभूति

यह विश्वास दृढ़ होता है कि जो व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलता है, हृषीकेश स्वयं उसकी रक्षा करते हैं और असुरी शक्तियां उसका अहित नहीं कर सकतीं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री (Editorially Curated Content): Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन ग्रंथों, विशेषकर महर्षि वेद व्यास विरचित महाभारत के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक संस्कृत पाठ और पारंपरिक आचार्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और स्वामी गीतानंद) के भाष्यों के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारी टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी आध्यात्मिक और दार्शनिक सामग्री पहुंचे, वह शास्त्रीय मर्यादाओं के अनुकूल हो और आधुनिक जीवन की कसौटी पर भी प्रासंगिक प्रतीत हो।

इस श्लोक के अर्थ, व्याकरण, और ऐतिहासिक संदर्भों को प्रस्तुत करते समय हमने किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति या भ्रामक दावों से परहेज किया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों, उपनिषदों और गीता के शाश्वत ज्ञान से सीधे और सरल हिंदी माध्यम से जोड़ना है, ताकि हर साधक अपने भीतर छिपी हुई आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत कर सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय, जिसका नाम 'विश्वस्वरूपदर्शन योग' है, से लिया गया है। इस प्रसंग में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को अपने अनंत, तेजोमय और ब्रह्मांडीय विराट रूप के दर्शन करा रहे हैं, जिसे देखकर अर्जुन विस्मय और भय से भर जाते हैं और भगवान की स्तुति करते हैं।

'हृषीकेश' दो शब्दों से मिलकर बना है—'हृषीक' (यानी इंद्रियां) और 'ईश' (यानी स्वामी)। इसका अर्थ है 'इंद्रियों के स्वामी'। भगवान श्री कृष्ण को यह संबोधन इसलिए दिया जाता है क्योंकि वे समस्त जीवों की ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों के संचालक और नियंत्रक हैं। अर्जुन इस संबोधन के माध्यम से यह स्वीकार करते हैं कि उनकी अपनी इंद्रियाँ भी भगवान की ही कृपा से नियंत्रित हैं।

इसका शाब्दिक अर्थ है कि 'राक्षस (असुरी शक्तियां) भयभीत होकर दिशाओं में भाग जाते हैं।' दार्शनिक दृष्टि से इसका अर्थ यह है कि जब भी सत्य, प्रकाश और दिव्य चेतना (भगवान का विराट रूप) प्रकट होती है, तो अहंकार, अधर्म, छल और नकारात्मक प्रवृत्तियाँ (राक्षसी भाव) टिक नहीं पातीं और स्वतः नष्ट या छिन्न-भिन्न हो जाती हैं।

निश्चित रूप से। श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक संपूर्ण मानवजाति के लिए है, न कि केवल संन्यासियों के लिए। गृहस्थ जीवन की चिंताओं, मानसिक तनाव और संघर्षों के बीच यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन इस श्लोक का पाठ और मनन करता है, तो उसे आंतरिक शांति, साहस और अपने कर्तव्यों को निष्ठा से निभाने की प्रेरणा मिलती है।

इस श्लोक का पाठ करने का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल ब्रह्म बेला (सूर्योदय से पूर्व या सूर्योदय के समय) का माना गया है जब चित्त शांत और शुद्ध होता है। इसके अतिरिक्त, संध्याकाल में या पूजा के समय भी इसका सस्वर पाठ किया जा सकता है। नियमितता और सच्ची श्रद्धा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

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संकलनकर्ता: मुख्य आध्यात्मिक विद्वान एवं संस्कृत भाषाविद्, Bhaktilok

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे हृषीकेश, आपकी कीर्ति से जगत् का हर्षित और अनुरक्त होना उचित ही है; राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी सिद्धों के समूह आपको नमस्कार कर रहे हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् की महिमा सबको आकर्षित करती है और असुरों में भय उत्पन्न करती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 36 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 36/55 65% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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