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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 35

अध्याय 11 · श्लोक 35

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सञ्जय उवाच । एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५॥

sañjaya uvāca | etac chrutvā vacanaṃ keśavasya kṛtāñjalir vepamānaḥ kirīṭī | namaskṛtvā bhūya evāha kṛṣṇaṃ sa-gadgadaṃ bhīta-bhītaḥ praṇamya ||35||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सञ्जय: संजय; उवाच: बोले; एतत्: यह; श्रुत्वा: सुनकर; वचनम्: वचन; केशवस्य: केशव (कृष्ण) का; कृताञ्जलि: हाथ जोड़े हुए; वेपमानः: कांपता हुआ; किरीटी: मुकुटधारी (अर्जुन); नमस्कृत्वा: नमस्कार करके; भूयः: फिर; एव: ही; आह: बोला; कृष्णम्: कृष्ण से; सगद्गदम्: गद्गद स्वर में; भीतभीतः: बहुत भयभीत होकर; प्रणम्य: प्रणाम करके।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

संजय बोले: हे राजन्, केशव के इन वचनों को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन ने हाथ जोड़कर, कांपते हुए, नमस्कार किया और बहुत भयभीत होकर प्रणाम करके फिर कृष्ण से गद्गद स्वर में कहा।

English Translation

Sanjaya said: Hearing these words of Kesava, Arjuna, with folded hands, trembling, prostrated himself and, overwhelmed with fear, again spoke to Krishna in a choked voice.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन की भयभीत अवस्था का वर्णन।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।