श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 35

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 37 मिनट का पठन 138 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सञ्जय उवाच । एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
सञ्जय
संजय
उवाच
बोले
एतत्
यह
श्रुत्वा
सुनकर
वचनम्
वचन
केशवस्य
केशव (कृष्ण) का
कृताञ्जलि
हाथ जोड़े हुए
वेपमानः
कांपता हुआ
किरीटी
मुकुटधारी (अर्जुन)
नमस्कृत्वा
नमस्कार करके
भूयः
फिर
एव
ही
आह
बोला
कृष्णम्
कृष्ण से
सगद्गदम्
गद्गद स्वर में
भीतभीतः
बहुत भयभीत होकर
प्रणम्य
प्रणाम करके।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

संजय बोले: हे राजन्, केशव के इन वचनों को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन ने हाथ जोड़कर, कांपते हुए, नमस्कार किया और बहुत भयभीत होकर प्रणाम करके फिर कृष्ण से गद्गद स्वर में कहा।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन के सर्वोच्च ग्रंथ श्रीमद्भागवतगीता के ग्यारहवें अध्याय, जिसे 'विश्वरूपदर्शनयोग' के नाम से जाना जाता है, में महर्षि वेदव्यास ने एक ऐसे महात्म्य का वर्णन किया है जो मानव चेतना को झकझोर कर रख देता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम सखा अर्जुन को अपना असीम, अनंत, चतुर्बाहु एवं कोटि सूर्य-प्रकाशमय विराट रूप दिखाया, तो इस ब्रह्मांडीय सत्य के दर्शन से अर्जुन की मानवीय सीमाएं और उनका सखा-भाव एक क्षण के लिए विस्मित और भयभीत हो उठा।

प्रस्तुत श्लोक—“सञ्जय उवाच । एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५॥”—महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान की उस अत्यंत नाटकीय और दिव्य बेला का जीवंत चित्रण प्रस्तुत करता है, जहां सांसारिक और पारमार्थिक सत्यों के बीच का पर्दा हट जाता है। संजय, जो धृतराष्ट्र को दिव्य दृष्टि से युद्धक्षेत्र का आंखों देखा हाल सुना रहे हैं, वे अर्जुन की अंतःस्थिति का बहुत ही सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विश्लेषण करते हैं।

इस श्लोक में अर्जुन की मनोदशा का वर्णन केवल एक भयभीत योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि उस जीव (आत्मा) के प्रतीक के रूप में है जो पहली बार अपने वास्तविक और विराट स्त्रोत (परमात्मा) के प्रत्यक्ष दर्शन करता है। 'किरीटी' (मुकुटधारी) अर्जुन, जो अपने पराक्रम और शौर्य के लिए जाने जाते थे, वे अब ब्रह्मांड के रचयिता के समक्ष एक दीन-हीन, शरणागत और अतीव विनीत भाव से खड़े हैं। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, जब उसे ब्रह्मांडीय चेतना का बोध होता है, तो वह स्वतः ही श्रद्धा और समर्पण में परिवर्तित हो जाता है। Bhaktilok.in के इस विशेष आध्यात्मिक अंक में हम इसी गूढ़ श्लोक के माध्यम से अर्जुन के भीतर उत्पन्न हुए भक्ति, विस्मय और कांपते हुए शरीर की दिव्यता का संपूर्ण विश्लेषण करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भागवतगीता — अध्याय ११, श्लोक ३५

सञ्जय उवाच ।
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५॥

श्लोकानुकूल पाठ विधि: इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व मन को शांत करें, दोनों हाथों को जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप का स्मरण करें। इसका उच्चारण करते समय स्वर में विनय और समर्पण का भाव होना चाहिए। नित्य प्रति इस श्लोक के जप से साधक के भीतर का अहंकार नष्ट होता है और भगवद्-शरणागति का मार्ग प्रशस्त होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में एक गहरा दार्शनिक अर्थ छिपा है जो अर्जुन की उस समय की मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति को स्पष्ट करता है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सञ्जय उवाच संजय बोले धृतराष्ट्र को दिव्य दृष्टि से युद्ध की सत्यता और श्रीकृष्ण के प्रभाव का निष्पक्ष विवरण देने वाले संजय का कथन, जो सत्य के दृष्टा हैं।
एतच्छ्रुत्वा यह सुनकर भगवान श्रीकृष्ण के उस विकराल और महान उपदेश को सुनकर, जिसमें उन्होंने काल रूप में संसार को समेटने की बात कही थी।
वचनं केशवस्य केशव के वचन को समस्त ब्रह्मांड के स्वामी, केशों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) के नियंता केशव के अत्यंत प्रभावोत्पादक और सत्य वचनों को।
कृताञ्जलिः हाथ जोड़कर पूर्ण समर्पण, विनय और नम्रता का प्रतीक, जहां पराक्रमी योद्धा ने अपनी स्वतंत्रता और अहम को ईश्वर के चरणों में सौंप दिया।
वेपमानः कांपते हुए अत्यधिक विस्मय, आश्चर्य और दिव्य भय (Awe) के कारण अर्जुन के भौतिक शरीर में कंपन उत्पन्न होना।
किरीटी मुकुटधारी अर्जुन इंद्र द्वारा प्रदत्त मुकुट को धारण करने वाले, जिनका यश तीनों लोकों में था, वे अब अत्यंत दीन हो चुके हैं।
नमस्कृत्वा नमस्कार करके अपने मस्तक को उस असीम शक्ति के आगे झुकाना, जो संपूर्ण चराचर जगत की उत्पत्ति और संहार का केंद्र है।
भूयः पुनः, बार-बार अत्यंत श्रद्धा और विह्वलता के कारण एक बार नहीं, बल्कि बार-बार प्रणाम करने की आंतरिक विवशता व प्रेम।
सगद्गदम् गदगद स्वर में (रुंधे गले से) भक्ति और भय के मिले-जुले आवेग से गला रुंध जाना, जिससे स्पष्ट शब्द न निकल पाना।
भीतभीतः अत्यंत भयभीत होकर यह साधारण सांसारिक भय नहीं, बल्कि उस परम शक्ति के प्रति अगाध आदर और संभ्रम (Holy Fear) है जो साधक को पवित्र करता है।
प्रणम्य भली-भांति प्रणाम कर साष्टांग या पूर्ण रूप से अपने आपको ईश्वर की शरण में समर्पित कर देना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता का ग्यारहवां अध्याय सनातन साहित्य का वह स्वर्णिम पृष्ठ है जहां अर्जुन की जिज्ञासा अपनी पराकाष्ठा को पार कर जाती है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देना शुरू किया, तो अर्जुन के मन में भगवान के उस ऐश्वर्य को देखने की तीव्र इच्छा जागी जो वे संपूर्ण ब्रह्मांड में धारण किए हुए हैं। अर्जुन के इस अनुरोध पर, भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी 'दिव्य दृष्टि' प्रदान की। इस दिव्य दृष्टि के मिलते ही अर्जुन की आंखें उस पारलौकिक संसार के लिए खुल गईं जो साधारण मानव चक्षुओं से ओझल रहता है।

जैसे ही दृष्टि खुली, अर्जुन के सामने एक ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जिसके सामने समस्त ब्रह्मांड की भव्यता भी छोटी पड़ गई। उन्होंने देखा कि भगवान के मुख में अनगिनत लोक समाए हुए हैं, बड़े-बड़े योद्धा उस विकराल मुख में प्रवेश कर रहे हैं और काल के रूप में भगवान सबका भक्षण कर रहे हैं। इस भयंकर और विराट रूप को देखकर, जो कि सृजन और प्रलय दोनों का एक साथ प्रतीक था, अर्जुन का वीर हृदय कांप उठा।

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली इस गाथा में यह प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर आता है। अर्जुन, जो अब तक श्रीकृष्ण को अपना प्रिय सखा, ममेरा भाई और मार्गदर्शक मानकर उनके साथ सहज व्यवहार करते थे, अचानक यह समझ गए कि वे जिसके साथ हंसी-मजाक करते रहे हैं, वे वस्तुतः इस संपूर्ण ब्रह्मांड के आदि, मध्य और अंत के स्वामी महाविष्णु हैं। इसी महान बोध ने अर्जुन को हिलाकर रख दिया। उनके हाथ से गांडीव धनुष फिसलने लगा, उनके अंग-प्रत्यंग कांपने लगे और वे पूरी तरह से शरणार्थी की मुद्रा में आ गए। यही कारण है कि संजय ने धृतराष्ट्र को यह वर्णन सुनाते हुए अर्जुन की इस कांपती हुई, गदगद और भय-विनम्र अवस्था को बहुत ही मार्मिक ढंग से चित्रित किया है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवतगीता के इन अध्यायों और विशेषकर ऐसे गहन श्लोकों का नियमित मनन, पठन और पाठ करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक एवं मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. अहंकार का शमन (Ego Dissolution)

इस श्लोक के पाठ से व्यक्ति को अपनी छोटी सी लघुता और ब्रह्मांड की विशालता का बोध होता है, जिससे मन का अकारण अहंकार और दंभ स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

2. मानसिक शांति और स्थिरता

भय और विस्मय के इस मार्मिक वर्णन का स्मरण करने से जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों के सामने खड़े होने की मानसिक शक्ति प्राप्त होती है और मन शांत होता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Positive Aura)

भगवान के विराट स्वरूप के प्रति श्रद्धा रखने से साधक के चारों ओर एक उच्च कोटि के आध्यात्मिक सुरक्षा कवच और सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है।

4. कर्म शुद्धि (Karmic Purification)

ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति (Surrender) अपनाने से पिछले जन्मों और वर्तमान जीवन के नकारात्मक कर्मों के बंधनों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

5. भगवद्-कृपा की प्राप्ति (Divine Grace)

सगद्गद और भय-विनम्र भाव से किए गए स्मरण से भगवान अतिप्रसन्न होते हैं और अपने भक्त को हर प्रकार के संकट से सुरक्षित रखते हैं।

6. कर्तव्यनिष्ठा और साहस

यह श्लोक सिखाता है कि डर के क्षणों में भी ईश्वर का आश्रय कैसे लिया जाए, जिससे व्यक्ति अपने जीवन के धर्मयुद्ध में कभी विचलित नहीं होता।

7. मोक्ष और उच्च लोकों की प्राप्ति

गीता के ग्यारहवें अध्याय का नियमित पठन करने वाले साधक की मति अंत समय में भी भगवान के चरणों में ही स्थिर रहती है।

8. दिव्य दृष्टि का विकास

आंतरिक रूप से अंतःकरण को शुद्ध करते हुए यह श्लोक साधक में जीवन के हर पहलू को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने की क्षमता विकसित करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख श्रीमद्भागवतगीता के पारंपरिक टीका-ग्रंथों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज, और स्वामी गीतानंद जी के भाष्यों) के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का मर्म, उसकी प्रामाणिकता और उसकी दार्शनिक गहराई आधुनिक पाठकों तक अत्यंत सरल, सुबोध और सांस्कृतिक गरिमा के साथ पहुंचे। महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भागवतगीता के इस श्लोक की व्याख्या करते समय भाषा की शुद्धता और शास्त्रीय मर्यादा का पूर्ण ध्यान रखा गया है, ताकि हमारे पाठकों को एक उच्च कोटि की आध्यात्मिक और शैक्षिक सामग्री प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: अर्जुन के कांपने का कारण साधारण भय नहीं था, बल्कि यह अलौकिक विस्मय (Awe) और ब्रह्मांडीय सत्य का प्रत्यक्ष साक्षात्कार था। जब उन्होंने देखा कि उनके सखा श्रीकृष्ण ही संपूर्ण ब्रह्मांड के रचयिता, पालक और संहारक महाकाल हैं, तो उस असीम शक्ति के प्रभाव से उनका भौतिक शरीर कांप उठा।

उत्तर: 'किरीटी' शब्द का अर्थ है 'मुकुट धारण करने वाला'। अर्जुन को देवराज इंद्र ने मुकुट प्रदान किया था जो उनके महान पराक्रम और शौर्य का प्रतीक था। इस श्लोक में इस विशेष शब्द का उपयोग यह दर्शाने के लिए किया गया है कि बड़े से बड़ा पराक्रमी योद्धा भी जब परमात्मा के विराट स्वरूप के सामने आता है, तो उसका सारा अहंकार गल जाता है और वह एक दीन साधक की भांति झुक जाता है।

उत्तर: महर्षि वेदव्यास द्वारा प्रदत्त दिव्य दृष्टि के माध्यम से संजय कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान की हर घटना को हस्तिनापुर में बैठे हुए धृतराष्ट्र को लाइव सुना रहे थे। संजय धृतराष्ट्र को यह दिखाना चाहते थे कि भगवान श्रीकृष्ण साधारण मनुष्य नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं परमेश्वर हैं, और पांडवों के पक्ष में स्वयं भगवान खड़े हैं, अतः कौरवों की हार निश्चित है।

उत्तर: 'सगद्गदम्' का अर्थ है प्रेम और भक्ति के आवेग से गले का रुंध जाना, और 'भीतभीतः' का अर्थ है बार-बार भयभीत होना। यह स्थिति उस सर्वोच्च भक्ति अवस्था को दर्शाती है जहां साधक भगवान के ऐश्वर्य को देखकर उनके प्रति अगाध श्रद्धा और पवित्र संभ्रम से भर जाता है।

उत्तर: हां, इस श्लोक का नियमित पाठ और इसके अर्थ का चिंतन करने से मन में ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास पैदा होता है। जब साधक यह समझ जाता है कि इस संसार की हर गतिविधि भगवान के नियंत्रण में है, तो उसकी सांसारिक चिंताएं, असुरक्षा की भावनाएं और मानसिक भय स्वतः ही शांत होने लगते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे राजन्, केशव के इन वचनों को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन ने हाथ जोड़कर, कांपते हुए, नमस्कार किया और बहुत भयभीत होकर प्रणाम करके फिर कृष्ण से गद्गद स्वर में कहा।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के वचन सुनकर भक्त का हृदय द्रवित हो जाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 35 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 35/55 64% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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