श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 33

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 39 मिनट का पठन 141 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

19 पद
तस्मात्
इसलिए
त्वम्
तुम
उत्तिष्ठ
उठो
यशः
यश
लभस्व
प्राप्त करो
जित्वा
जीतकर
शत्रून्
शत्रुओं को
भुङ्क्ष्व
भोगो
राज्यम्
राज्य
समृद्धम्
समृद्ध
मया
मेरे द्वारा
एव
ही
एते
ये
निहताः
मारे गए
पूर्वम्
पहले
एव
ही
निमित्तमात्रम्
निमित्त मात्र
भव
हो
सव्यसाचिन्
हे सव्यसाची।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इसलिए तू उठ, यश प्राप्त कर, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग कर। ये सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाची, तू निमित्त मात्र बन।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय दृष्टि

सनातन संस्कृति और श्रीमद्भगवद्गीता के फलक पर जब हम दृष्टि डालते हैं, तो हमें जीवन के प्रत्येक आयाम का एक वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक समाधान प्राप्त होता है। श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना को जागृत करने वाला वह दिव्य संगीत है जो अज्ञान के गांधार को चीरकर ज्ञान के सूर्य का उदय करता है। महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान में, जहाँ कौरवों और पांडवों की सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं, अर्जुन घोर विषाद और कर्तव्यच्युति से घिर गए थे। उनके हाथ से गांडीव खिसक रहा था, उनका हृदय कायरता से भर गया था और उनके भीतर अपनों के वध का भय समा गया था। ऐसे महासंकट के क्षण में, भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए, वे मानवता के लिए शाश्वत प्रकाशस्तंभ बन गए।

विशेष रूप से, ग्यारहवें अध्याय में जब भगवान ने अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाया, जिसे देखकर अर्जुन भयभीत और विस्मित हो गए, तब भगवान ने उन्हें कर्म के सनातन सिद्धांत का बोध कराया। प्रस्तुत श्लोक—"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व..."—गीता के दर्शन का वह शिखर है जहाँ मनुष्य को उसके पुरुषार्थ और परमात्मा की सर्वोच्च इच्छा के बीच का संबंध समझ में आता है। यह श्लोक मनुष्य को यह सिखाता है कि जीवन में संघर्ष अनिवार्य है, और उस संघर्ष से मुँह मोड़ना कायरता है। भगवान अर्जुन से कहते हैं कि विजय तुम्हारी ही है, यश तुम्हारा ही है, किंतु इसके पीछे का ब्रह्मांडीय सत्य यह है कि कर्ता तुम नहीं, बल्कि स्वयं परमब्रह्म हो। तुम केवल एक निमित्त मात्र हो। यह दृष्टिकोण मनुष्य के अहंकार को समूल नष्ट कर देता है और उसे निष्काम कर्म की ओर अग्रसर करता है। Bhaktilok.in के माध्यम से हम इस श्लोक के माध्यम से आपके जीवन में कर्मठता, दिव्यता और आत्मिक शांति का संचार करने का विनम्र प्रयास कर रहे हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३॥


(श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ११, श्लोक ३३)

उच्चारण विधि एवं ध्यान:

इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। श्लोक का उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द के स्पष्ट उच्चारण पर ध्यान दें। 'तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ' में संधि और विच्छेद का उचित ध्यान रखते हुए इसका सस्वर पाठ मानसिक एकाग्रता को बढ़ाता है और साधक के भीतर अदम्य साहस का संचार करता है। प्रतिदिन कम से कम 11 बार इस श्लोक का मानसिक या वाचिक जप करने से जीवन की बाधाएँ स्वतः समाप्त होने लगती हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों और उपनिषदों का सार छिपा हुआ है। आइए, इसका शब्दशः और दार्शनिक विश्लेषण करते हैं:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तस्मात् (Tasmāt) इसलिए / उस कारण से पूर्व में कहे गए विराट रूप के दर्शन और काल के प्रभाव को जानने के बाद अब यह निष्कर्ष निकलता है कि शोक छोड़ना चाहिए।
त्वम् (Tvam) तुम हे अर्जुन! जीव रूप में स्थित तुम, जो इस युद्ध के प्रत्यक्ष नायक प्रतीत होते हो।
उत्तिष्ठ (Uttishtha) उठो / खड़े हो जाओ अपने मानसिक विषाद, प्रमाद, कायरता और अज्ञान की निद्रा से बाहर निकलो और अपने कर्तव्य का पालन करो।
यशो लभस्व (Yasho Labhasva) यश प्राप्त करो संसार में कीर्ति, मान-सम्मान और धर्म की विजय का गौरव प्राप्त करो, जो तुम्हारे पुरुषार्थ का स्वाभाविक परिणाम है।
जित्वा शत्रून् (Jitvā Shatrūn) शत्रुओं को जीतकर केवल बाहरी शत्रुओं (कौरवों आदि) को ही नहीं, बल्कि अपने भीतर के काम, क्रोध, मोह और भय रूपी आंतरिक शत्रुओं पर भी विजय प्राप्त करो।
भुङ्क्ष्व (Bhunkshva) भोग करो / उपभोग करो अनासक्त भाव से, धर्मसम्मत तरीके से इस विस्तृत और समृद्ध राज्य का संचालन और सुख प्राप्त करो।
राज्यं समृद्धम् (Rājyam Samriddham) समृद्ध राज्य का ऐसा राज्य जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से संपन्न, शांत और न्यायपूर्ण हो।
मयैव एते (Mayāiva Ete) मेरे द्वारा ही ये सब यह परम सत्य है कि काल रूप भगवान ने पहले ही इन सबका विनाश तय कर दिया है, मनुष्य केवल माध्यम है।
निहताः पूर्वमेव (Nihatāḥ Pūrvam Eva) पहले से ही मारे जा चुके हैं भौतिक जगत में घटने से पहले ही यह घटना ब्रह्मांडीय चेतना में घट चुकी है। काल सर्वशक्तिमान है।
निमित्तमात्रम् भव (Nimittamātram Bhava) केवल निमित्त (माध्यम) बनो अहंकार का त्याग करो और यह समझो कि कराने वाला ईश्वर है, तुम केवल उसके हाथों का यंत्र हो।
सव्यसाचिन् (Savyasāchin) हे बाएं हाथ से भी तीर चलाने वाले अर्जुन अर्जुन की उस अद्भुत क्षमता का स्मरण कराना जो बिना चूके दोनों हाथों से युद्ध कर सकते थे।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के आरंभिक क्षणों और विशेषकर ग्यारहवें अध्याय के घटनाक्रम से जुड़ी हुई है। जब अर्जुन ने कुरुक्षेत्र के प्रांगण में अपने गुरुओं (भीष्म, द्रोण), आचार्यों, भाइयों और संबंधियों को देखा, तो उनका गांडीव धनुष उनके हाथ से छूट गया। वे अवसाद में डूब गए और भगवान कृष्ण से कहा कि वे युद्ध नहीं करना चाहते, क्योंकि अपनों को मारकर मिलने वाले राज्य का सुख रक्त रंजित होगा। अर्जुन का यह मोह मानवीय करुणा जैसा प्रतीत होता था, किंतु वास्तव में यह कर्तव्य से पलायन और मोह जनित भ्रम था।

भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के इस भ्रम को दूर करने के लिए पहले सांख्य योग और कर्म योग का उपदेश दिया। परंतु जब अर्जुन की जिज्ञासा और शांति पूरी तरह स्थापित नहीं हुई, तब भगवान ने उन्हें अपना अद्भुत, अनंत और तेजोमय **विराट रूप** दिखाया। उस विराट रूप में अर्जुन ने देखा कि ब्रह्मांड के सभी बड़े योद्धा—भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन आदि—भगवान के प्रज्ज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं और पिस रहे हैं। इस भयानक और भव्य दृश्य को देखकर अर्जुन कांप उठे। उन्हें समझ आ गया कि जो निर्णय वे अपने बल पर ले रहे हैं, वह तो ब्रह्मांड की सर्वोच्च योजना का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है।

इसी दिव्य दृष्टि और अनुभव के पश्चात, भगवान कृष्ण ने अर्जुन को यह ऐतिहासिक उपदेश दिया: "तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व..."। यहाँ 'सव्यसाचिन्' संबोधन का विशेष महत्व है। सव्यसाची का अर्थ है वह योद्धा जो अपने बाएं हाथ से भी उतनी ही निपुणता से बाण चला सकता है जितनी दाहिने से। भगवान अर्जुन को उनकी भूली हुई वीरता, उनकी असीम क्षमताओं और उनके क्षत्रिय धर्म का स्मरण कराते हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब मनुष्य जीवन के किसी भी रणक्षेत्र में हताश हो जाता है, तब उसे परमात्मा के विधान को समझकर अपने कर्तव्य पथ पर पुनः डट जाना चाहिए।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस विशिष्ट श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को अनेक प्रकार के मानसिक, आत्मिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. आत्म-विश्वास और साहस की वृद्धि

इस श्लोक का स्मरण करने से मन से हीनभावना और भय का नाश होता है। यह कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति को 'उत्तिष्ठ' (उठने) की प्रेरणा देता है।

2. अहंकार का शमन (निमित्त भाव)

'निमित्तमात्रं भव' का भाव जीवन में अहंकार को समाप्त करता है। व्यक्ति यह समझ जाता है कि वह केवल एक माध्यम है, जिससे कर्तापन का तनाव समाप्त हो जाता है।

3. मानसिक तनाव और अवसाद से मुक्ति

अर्जुन की तरह जो लोग जीवन के कुरुक्षेत्र में अवसाद या एंग्जाइटी से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक एक अचूक आध्यात्मिक औषधि का कार्य करता है।

4. कर्मठता और पुरुषार्थ की प्राप्ति

यह श्लोक भाग्यवादी बनाने के बजाय परम पुरुषार्थी बनाता है। यह सिखाता है कि भगवान की योजना पर विश्वास करते हुए अपना कर्म पूरी निष्ठा से करना चाहिए।

5. शत्रुओं और बाधाओं पर विजय

'जित्वा शत्रून्' के प्रभाव से साधक के जीवन में आने वाली बाहरी और आंतरिक बाधाएँ (षड्ररिप्स) नियंत्रित होती हैं और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।

6. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

जब कर्म फल की आसक्ति त्यागकर, स्वयं को निमित्त मानकर कार्य किया जाता है, तो कर्म के बंधन नहीं बनते और चित्त शुद्ध होता है।

7. दिव्य कृपा और यश की प्राप्ति

धर्म के मार्ग पर चलते हुए समाज में मान-प्रतिष्ठा और 'यश' की प्राप्ति होती है, जो साधक के जीवन को सार्थक बनाती है।

8. आध्यात्मिक एकाग्रता (Focus)

नियमित रूप से इस श्लोक का जप करने से बुद्धि तीव्र होती है और लक्ष्य के प्रति अर्जुन जैसी एकाग्रता प्राप्त होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, पुराणों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों का संदेश आधुनिक पाठकों तक उनकी मूल पवित्रता, दार्शनिक गहराई और व्यावहारिक उपादेयता के साथ पहुँचे। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों के आध्यात्मिक विकास और मानसिक सबलता को ध्यान में रखकर पूरी निष्ठा से संकलित की गई है, ताकि हर सनातन धर्मी अपने जीवन के युद्धों में विजयी बन सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

"निमित्तमात्रं भव" का अर्थ है कि मनुष्य को अपने जीवन की हर बड़ी सफलता या घटना में स्वयं को असली कर्ता (Doer) न मानकर केवल ईश्वर की योजना का एक माध्यम (Instrument) मानना चाहिए। जब हम अहंकार का त्याग करके यह स्वीकार करते हैं कि सब कुछ परमात्मा की इच्छा से हो रहा है, तो हमारे कर्म अनासक्त हो जाते हैं और हम मानसिक तनाव से मुक्त हो जाते हैं।

'सव्यसाची' उस योद्धा को कहते हैं जो अपने दोनों हाथों से समान कुशलता से बाण चला सकता है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को इस विशेष नाम से इसलिए संबोधित किया ताकि अर्जुन को उनकी महान क्षमताओं, वीरता और क्षत्रिय धर्म का स्मरण हो सके। भगवान उन्हें याद दिला रहे हैं कि तुम साधारण मनुष्य नहीं हो, बल्कि असीम पराक्रम के धनी हो, अतः कायरता छोड़ो।

हाँ, इस श्लोक का नियमित पाठ और चिंतन करने से व्यक्ति के भीतर हीनभावना, भय और टालमटोल की प्रवृत्ति समाप्त होती है। यह श्लोक ऊर्जा और पुरुषार्थ का संचार करता है। जब मनुष्य अपने कर्तव्य को पूरी ईमानदारी और भगवान में निष्ठा रखकर करता है, तो उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र (कर्मक्षेत्र) में सफलता और यश अवश्य प्राप्त होता है।

दैनिक जीवन में जब भी आपके सामने कोई बड़ी चुनौती, परीक्षा, व्यवसायिक संकट या मानसिक दुविधा आए, तब इस श्लोक का स्मरण करें। यह सोचें कि आप अपना सर्वोत्तम प्रयास (कर्म) करने के लिए बाध्य हैं, और परिणाम ईश्वर के हाथ में है। यह दृष्टिकोण आपको भयमुक्त रखकर श्रेष्ठतम कार्य करने की शक्ति देगा।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय (जो कि 'विश्वदर्शन योग' के नाम से प्रसिद्ध है) का 33वां श्लोक है। इस प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाने के उपरांत कर्म और काल के सनातन सत्य का उपदेश दिया है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इसलिए तू उठ, यश प्राप्त कर, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग कर। ये सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाची, तू निमित्त मात्र बन।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

मनुष्य केवल कर्तव्य का पालन करता है, फल तो भगवान् के हाथ में है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 33 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 33/55 60% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!