आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:३० PM | सूर्यास्त: ०५:३१ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 33

अध्याय 11 · श्लोक 33

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३॥

tasmāt tvam uttiṣṭha yaśo labhasva jitvā śatrūn bhuṅkṣva rājyaṃ samṛddham | mayaivaite nihatāḥ pūrvam eva nimitta-mātraṃ bhava savya-sācin ||33||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तस्मात्: इसलिए; त्वम्: तुम; उत्तिष्ठ: उठो; यशः: यश; लभस्व: प्राप्त करो; जित्वा: जीतकर; शत्रून्: शत्रुओं को; भुङ्क्ष्व: भोगो; राज्यम्: राज्य; समृद्धम्: समृद्ध; मया: मेरे द्वारा; एव: ही; एते: ये; निहताः: मारे गए; पूर्वम्: पहले; एव: ही; निमित्तमात्रम्: निमित्त मात्र; भव: हो; सव्यसाचिन्: हे सव्यसाची।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इसलिए तू उठ, यश प्राप्त कर, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग कर। ये सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाची, तू निमित्त मात्र बन।

English Translation

Therefore, stand up and gain glory. Conquer your enemies and enjoy a prosperous kingdom. They have already been slain by Me; be merely an instrument, O Savyasachin.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं और बताते हैं कि वे तो केवल निमित्त हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।