श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 32

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 47 मिनट का पठन 181 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच । कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

20 पद
श्रीभगवान्
भगवान्
उवाच
बोले
कालः
काल (समय)
अस्मि
हूँ
लोकक्षयकृत्
लोकों का क्षय करने वाला
प्रवृद्धः
प्रवृद्ध
लोकान्
लोकों को
समाहर्तुम्
संहार करने के लिए
इह
यहाँ
प्रवृत्तः
प्रवृत्त
ऋते
बिना
अपि
भी
त्वाम्
तुम्हारे
न
नहीं
भविष्यन्ति
होंगे
सर्वे
सभी
ये
जो
अवस्थिताः
स्थित हैं
प्रत्यनीकेषु
विपक्षी सेनाओं में
योधाः
योद्धा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: मैं प्रवृद्ध काल हूँ, लोकों का क्षय करने वाला, और इन लोकों का संहार करने के लिए यहाँ प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे बिना भी, इन विपक्षी सेनाओं में स्थित सभी योद्धा नहीं रहेंगे।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ब्रह्मांडीय चेतना और परम काल का महात्म्य

सनातन धर्म, वेद और वेदान्त के इतिहास में श्रीमद्भगवद्गीता का ग्यारहवां अध्याय ('विश्वरूपदर्शनयोग') संपूर्ण आध्यात्मिक साहित्य का सबसे अधिक रहस्यमयी, जाज्वल्यमान और विस्मयकारी भाग माना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने परम ऐश्वर्य, अनंत रूपों और महाविनाशक स्वरूप का दर्शन अर्जुन को कराते हैं। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन के मन में अपने स्वजनों के प्रति मोह, कायरता और विषाद उत्पन्न होता है, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की उस महान वास्तविकता से परिचित कराया, जो समय और अंतरिक्ष के चक्र से परे है। प्रस्तुत श्लोक—"कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो..."—गीता के सबसे शक्तिशाली, गहन और जीवन-दर्शन को झकझोर देने वाले श्लोकों में से एक है।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को 'काल' (Time/Eternity) के रूप में घोषित किया है, जो इस संपूर्ण चराचर जगत का संहार करने वाला है। मनुष्य सामान्य जीवन में समय को एक घड़ी की टिक-टिक या दिन-रात के रूप में देखता है, परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से 'काल' वह विराट शक्ति है जिसके समक्ष बड़े-बड़े साम्राज्य, देवता, ऋषि और योध्दा क्षणभर में विलीन हो जाते हैं। यह श्लोक हमें न केवल भौतिक संसार की नश्वरता का बोध कराता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि जो कुछ भी इस जगत में घटित हो रहा है, वह सब उस परमेश्वर की दिव्य योजना के अंतर्गत ही हो रहा है। इसके सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आधुनिक परमाणु भौतिकी के जनक जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर ने भी जब पहले परमाणु बम का परीक्षण देखा, तो उनके मुख से यही श्लोक निकला था—"Now I am become Death, the destroyer of worlds." यह इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति के ग्रंथ केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांड के शाश्वत सत्यों के अकाट्य वैज्ञानिक और दार्शनिक दस्तावेज हैं।

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष आलेख में हम इसी परम श्लोक की गहराइयों में उतरेंगे। हम इसके पद-दर-पद शब्दार्थ, इसके पीछे की पौराणिक पृष्ठभूमि, महाभारत युद्ध के उस विशिष्ट क्षण, तथा इसके नियमित स्मरण से मिलने वाले मानसिक और आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे। हमारा उद्देश्य पाठकों को एक ऐसा पावन और बौद्धिक मंच प्रदान करना है, जहाँ वे सनातन धर्म के मूल ग्रंथों के सार को अपनी सहज हिंदी भाषा में आत्मसात कर सकें और अपने जीवन को एक नई दिशा दे सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ११, श्लोक ३२

ॐ श्री परमात्मने नमः

श्रीभगवानुवाच

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो

लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।

ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे

येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥

सरल एवं प्रामाणिक पद्यात्मक अनुवाद:

"श्री भगवान ने कहा—मैं संपूर्ण लोक का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन सब लोगों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे युद्ध न करने पर भी जो ये विरोधी सेनाओं में स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब के सब नहीं रहेंगे (अर्थात मारे जाएंगे)।"

पाठ विधि एवं साधना के नियम:

  • शुद्धता: इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल स्नान करने के पश्चात पवित्र मन और स्वच्छ वस्त्र धारण करके करना चाहिए।
  • आसन: कुश या ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • संकल्प: मानसिक रूप से भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए अपने अंदर के अहंकार, भय और संशय को त्यागने का संकल्प लें।
  • नियमितता: इस महावाक्य का प्रतिदिन कम से कम 11 या 108 बार मानसिक जप करने से साधक को निर्भयता और मानसिक स्थिरता की प्राप्ति होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक का एक-एक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण दर्शन समेटे हुए है। नीचे दी गई तालिका में इस श्लोक के प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहरा आध्यात्मिक व दार्शनिक भावार्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
श्रीभगवानुवाच श्री भगवान बोले यह दर्शाता है कि ज्ञान किसी साधारण मनुष्य का नहीं, बल्कि साक्षात् परम ब्रह्म पुरुषोत्तम का उपदेश है।
कालः अस्मि मैं काल (समय) हूँ भगवान ने स्वयं को समय के रूप में प्रकट किया है, जो किसी के रोके नहीं रुकता और सब कुछ अपने गर्भ में समेट लेता है।
लोकक्षयकृत् लोकों का नाश करने वाला संसार की उत्पत्ति, पालन और प्रलय—यह संपूर्ण चक्र भगवान की शक्ति के अधीन है। संहार भी उसी का एक रूप है जो पुनरुत्थान का आधार बनता है।
प्रवृद्धः अत्यंत बढ़ा हुआ / विशाल यह महाकाल का वह रूप है जो अपने रौद्र रूप में असीम और अपार है, जिसके सामने ब्रह्मांड का कोई भी बल टिक नहीं सकता।
लोकान् समाहर्तुम् समस्त लोकों का संहार करने के लिए अधर्म और पाप के भार से दबे हुए संसार को पुनः संतुलित करने के लिए प्रलयकारी ऊर्जा का सक्रिय होना।
इह प्रवृत्तः इस समय यहाँ उपस्थित / प्रवृत्त हुआ हूँ यह वर्तमान क्षण की अनिवार्यता को दर्शाता है कि अब न्याय और धर्म की स्थापना का समय आ चुका है।
ऋते अपि त्वां तुम्हारे बिना भी / तुम्हारे युद्ध न करने पर भी अर्जुन के इस भ्रम को दूर करना कि उसके युद्ध न करने से ये लोग बच जाएंगे। नियति का चक्र स्वतंत्र रूप से अपना कार्य कर रहा है।
न भविष्यन्ति सर्वे नहीं रहेंगे, सब नष्ट हो जाएंगे भौतिक शरीर की नश्वरता का सत्य। जो पैदा हुआ है, उसका अंत निश्चित है, केवल आत्मा और परमात्मा शाश्वत हैं।
ये अवस्थिताः जो स्थित हैं कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों ओर खड़े वे सभी महारथी और उनकी सेनाएं।
प्रत्यनीकेषु योधाः विरोधी सेनाओं में योद्धा कौरव पक्ष के वे समस्त योध्दा जो अधर्म का साथ देने के कारण काल के ग्रास बनने के लिए पहले ही चिन्हित हो चुके थे।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस अद्भुत श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत महाकाव्य के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव—कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र से जुड़ी हुई है। कौरवों और पांडवों के बीच जब युद्ध अपरिहार्य हो गया, तब अर्जुन ने अपने सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं (द्रोणाचार्य, कृपाचार्य) और पितामह (भीष्म) को सामने युद्ध के लिए खड़ा देखा। उनके हृदय में मोह और करुणा का ऐसा ज्वार उमड़ा कि उन्होंने अपने गांधिव धनुष को नीचे रख दिया और कहा कि ऐसे राज्य या विजय का क्या लाभ, जिसमें अपने ही स्वजनों का रक्त बहे? अर्जुन का यह विषाद मानव मात्र का वह स्वभाव है, जो कर्तव्य पथ पर आने वाली कठिनाइयों और अपनों के मोह के कारण उत्पन्न होता है।

अर्जुन के इस मानसिक संकट को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वही 'श्रीमद्भगवद्गीता' के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुआ। जब उपदेश के विभिन्न चरणों में भी अर्जुन की जिज्ञासा शांत नहीं हुई और वे भगवान के वास्तविक स्वरूप को देखना चाहते थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की। इस दिव्य दृष्टि के मिलते ही अर्जुन के समक्ष वह विराट रूप प्रकट हुआ, जिसका वर्णन ग्यारहवें अध्याय में मिलता है। उस अनंत मुख, अनंतिम नेत्र और प्रदीप्त तेज वाले रूप को देखकर अर्जुन कांप उठे। उन्होंने देखा कि कौरव पक्ष के सभी प्रमुख योद्धा—भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन सहित तमाम राजा—भगवान के प्रज्वलित मुखों में तेजी से प्रवेश कर रहे हैं और उनके भयानक दाँतों के बीच पिस रहे हैं, जैसे नदियाँ तेजी से समुद्र की ओर दौड़ती हैं और उसमें विलीन हो जाती हैं।

यह दृश्य देखकर भयभीत अर्जुन ने हाथ जोड़कर पूछा कि हे भगवान! यह भयंकर रूप किसका है? आप मुझे अपना वास्तविक परिचय दीजिए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने करुणा और गंभीर वाणी में इस श्लोक का उच्चारण किया—"कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो..."। भगवान ने स्पष्ट किया कि हे अर्जुन! तू जिसे अपने पराक्रम या युद्ध के निर्णय से जोड़कर देख रहा है, वह तेरा व्यक्तिगत कर्म नहीं है; यह तो ब्रह्मांड की वह महान व्यवस्था है जिसके तहत अधर्म का नाश और धर्म की पुनर्स्थापना तय है। अर्जुन को केवल 'निमित्त मात्र' (Instrument) बनना है। इस पौराणिक प्रसंग से हमें यह शाश्वत शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को अहंकार त्यागकर अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करना चाहिए, क्योंकि परिणाम उस महाकाल के हाथ में है जो समय के हर पल को नियंत्रित कर रहा है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस परम शक्तिशाली श्लोक का नियमित स्मरण, पाठ और इसके गूढ़ार्थ का मनन करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यहाँ इसके 8 प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ दिए गए हैं:

1. मृत्यु के भय से मुक्ति (Freedom from Fear of Death)

जब साधक यह समझ लेता है कि 'काल' स्वयं भगवान का ही रूप है और शरीर नश्वर है, तो उसके मन से मृत्यु का अस्वाभाविक भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है। वह जीवन को अधिक साहस और सार्थकता के साथ जीता है।

2. मानसिक शांति और स्थिरता (Mental Peace & Stability)

भविष्य की अनिश्चितताओं और भूतकाल की चिंताओं से घिरा हुआ मन इस श्लोक के स्मरण से वर्तमान क्षण में स्थिर हो जाता है। यह मानसिक उद्विग्नता को शांत कर अगाध आंतरिक शांति प्रदान करता है।

3. अहंकार का शमन (Eradication of Ego)

"मैं सब कुछ करने वाला हूँ" (कर्ताभाव) का अहंकार मनुष्य के सभी दुखों का मूल कारण है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि संचालक कोई और है, जिससे अहंकार स्वतः गल जाता है और विनम्रता आती है।

4. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विस्तार (Positive Aura Expansion)

संस्कृत के इन पवित्र और दिव्य अक्षरों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले ध्वनि कंपन (Vibrations) शरीर के चक्रों को जाग्रत करते हैं और आसपास के वातावरण को पवित्र तथा ऊर्जावान बनाते हैं।

5. कर्मयोग की प्रेरणा (Inspiration for Karmayoga)

यह श्लोक फल की आसक्ति से मुक्त होकर केवल अपने निर्धारित कर्तव्य (कर्म) को पूरी निष्ठा के साथ करने की प्रेरणा देता है, जो भगवद्गीता का मूल संदेश है।

6. कर्मिक शुद्धि और पापनाश (Karmic Purification)

भगवान के परम स्वरूप के निरंतर ध्यान से साधक के संचित पापकर्मों का क्षय होता है। दिव्यता के साथ यह तदाकार होना अंतःकरण को पूरी तरह से शुद्ध कर देता है।

7. निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता (Enhanced Decision Making)

संकट के समय जब व्यक्ति दुविधा में होता है, तब इस श्लोक का स्मरण उसे सत्य, धर्म और न्याय के पक्ष में अडिग रहकर स्पष्ट निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।

8. भगवत्कृपा और शरणगति प्राप्ति (Divine Grace & Surrender)

जब मनुष्य अपनी संपूर्ण लघुता को स्वीकार करते हुए परमेश्वर की विराटता के सम्मुख नतमस्तक होता है, तब उसे ईश्वर की अहेतुकी कृपा और परम शरण की प्राप्ति होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context)

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) पर प्रस्तुत यह आलेख पारंपरिक वैदिक आचार्यों, संस्कृत व्याकरणविदों और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा यह निरंतर प्रयास रहता है कि सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को आधुनिक पाठकों तक उनकी मूल और शुद्ध भावना के साथ पहुँचाया जाए, बिना किसी अतिशयोक्ति या भ्रामक दावों के। इस लेख में दिए गए श्लोक, शब्दार्थ और व्याख्याएं वेदों, उपनिषदों और ऐतिहासिक महाकाव्यों के अकाट्य संदर्भों पर आधारित हैं, जो पाठकों को एक प्रामाणिक और समृद्ध आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि वे साक्षात् महाकाल (समय के नियंत्रक) हैं जो इस संपूर्ण जगत का संहार करने के लिए प्रकट हुए हैं। भगवान स्पष्ट करते हैं कि कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े विरोधी सेनाओं के जितने भी योद्धा हैं, वे सब पहले से ही काल के ग्रास बन चुके हैं; अतः अर्जुन के युद्ध न करने पर भी वे जीवित नहीं बचेंगे।

जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर ने संस्कृत भाषा सीखी थी और वे श्रीमद्भगवद्गीता के नियमित पाठक थे। जब 1945 में दुनिया का पहला परमाणु परीक्षण (Trinity Test) सफल हुआ, तब उस महाविनाशक ऊर्जा और विस्फोट को देखकर उनके मन में गीता का यही ग्याहरवें अध्याय का श्लोक आया था, और उन्होंने कहा था—"Now I am become Death, the destroyer of worlds" (अब मैं काल बन गया हूँ, लोकों का नाश करने वाला)।

इस श्लोक का नियमित स्मरण करने से व्यक्ति के भीतर से मृत्यु का भय और भविष्य की अनावश्यक चिंताएं समाप्त हो जाती हैं। यह अहंकार को कम करके व्यक्ति को अपने कर्तव्यों (कर्म) के प्रति समर्पित करता है और मन में अगाध शांति व स्थिरता प्रदान करता है।

इसके माध्यम से भगवान ने अर्जुन के मोह और अहंकार को तोड़ा। अर्जुन सोच रहे थे कि उनके युद्ध न करने से उनके अपने (कौरव पक्ष के लोग) बच जाएंगे। भगवान ने स्पष्ट किया कि संसार की हर घटना एक महान ब्रह्मांडीय नियम (कालचक्र) के अधीन चलती है। अधर्म का नाश होना तय है, और मनुष्य केवल उस महान योजना का एक निमित्त मात्र है।

श्रीमद्भगवद्गीता के किसी भी श्लोक का पाठ करने के लिए किसी प्रकार की कठिन दीक्षा या औपचारिकता की आवश्यकता नहीं होती है। इसे कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति पवित्रता और स्वच्छता का ध्यान रखते हुए अपनी दैनिक प्रार्थना या स्वाध्याय में सम्मिलित कर सकता है।

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) - सनातन संस्कृति, भक्ति और वेदान्त ज्ञान का प्रामाणिक डिजिटल द्वार

सर्वाधिकार सुरक्षित © २०२४ | संकलित एवं संपादित सामग्री

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

श्रीभगवान् बोले: मैं प्रवृद्ध काल हूँ, लोकों का क्षय करने वाला, और इन लोकों का संहार करने के लिए यहाँ प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे बिना भी, इन विपक्षी सेनाओं में स्थित सभी योद्धा नहीं रहेंगे।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् ही काल के रूप में सबका अंत करते हैं। अर्जुन को केवल निमित्त बनना है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 32 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 32/55 58% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!