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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 32

अध्याय 11 · श्लोक 32

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच । कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२॥

śrī-bhagavān uvāca | kālo 'smi loka-kṣaya-kṛt pravṛddho lokān samāhartum iha pravṛttaḥ | ṛte 'pi tvāṃ na bhaviṣyanti sarve ye 'vasthitāḥ praty-anīkeṣu yodhāḥ ||32||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान्; उवाच: बोले; कालः: काल (समय); अस्मि: हूँ; लोकक्षयकृत्: लोकों का क्षय करने वाला; प्रवृद्धः: प्रवृद्ध; लोकान्: लोकों को; समाहर्तुम्: संहार करने के लिए; इह: यहाँ; प्रवृत्तः: प्रवृत्त; ऋते: बिना; अपि: भी; त्वाम्: तुम्हारे; न: नहीं; भविष्यन्ति: होंगे; सर्वे: सभी; ये: जो; अवस्थिताः: स्थित हैं; प्रत्यनीकेषु: विपक्षी सेनाओं में; योधाः: योद्धा।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: मैं प्रवृद्ध काल हूँ, लोकों का क्षय करने वाला, और इन लोकों का संहार करने के लिए यहाँ प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे बिना भी, इन विपक्षी सेनाओं में स्थित सभी योद्धा नहीं रहेंगे।

English Translation

The Blessed Lord said: I am the mighty world-destroying Time, now engaged in destroying the worlds. Even without you, none of the warriors arrayed in the opposing armies shall survive.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् स्वयं को काल (समय) बताते हैं, जो सबका संहार करने वाला है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।