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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 31

अध्याय 11 · श्लोक 31

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१॥

ākhyāhi me ko bhavān ugra-rūpo namo 'stu te deva-vara prasīda | vijñātum icchāmi bhavantam ādyaṃ na hi prajānāmi tava pravṛttim ||31||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

आख्याहि: बताइए; मे: मुझे; कः: कौन; भवान्: आप; उग्ररूपः: उग्र रूप वाले; नमः: नमस्कार; अस्तु: हो; ते: आपको; देववर: हे देवश्रेष्ठ; प्रसीद: प्रसन्न हों; विज्ञातुम्: जानने की; इच्छामि: इच्छा करता हूँ; भवन्तम्: आपको; आद्यम्: आदि; न: नहीं; हि: ही; प्रजानामि: जानता हूँ; तव: आपकी; प्रवृत्तिम्: प्रवृत्ति।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

आप कौन हैं, जो इस उग्र रूप में हैं, यह मुझे बताइए। हे देवश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है, प्रसन्न हों। मैं आपको, जो आदि हैं, जानना चाहता हूँ; क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।

English Translation

Tell me who You are, so fierce in form. Salutations to You, O best of gods, be gracious. I wish to know You, the primal One, for I do not know Your purpose.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन भगवान् के इस रूप का रहस्य जानना चाहते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।