विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 31

श्लोक ३१ में अर्जुन भगवान् के उग्र रूप का रहस्य जानना चाहते हैं। Verse 31: Arjuna wants to know the identity and purpose of the fierce form.

संस्कृत श्लोक

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१॥

ākhyāhi me ko bhavān ugra-rūpo namo 'stu te deva-vara prasīda | vijñātum icchāmi bhavantam ādyaṃ na hi prajānāmi tava pravṛttim ||31||

पदच्छेद / शब्दार्थ

आख्याहि: बताइए; मे: मुझे; कः: कौन; भवान्: आप; उग्ररूपः: उग्र रूप वाले; नमः: नमस्कार; अस्तु: हो; ते: आपको; देववर: हे देवश्रेष्ठ; प्रसीद: प्रसन्न हों; विज्ञातुम्: जानने की; इच्छामि: इच्छा करता हूँ; भवन्तम्: आपको; आद्यम्: आदि; न: नहीं; हि: ही; प्रजानामि: जानता हूँ; तव: आपकी; प्रवृत्तिम्: प्रवृत्ति।

हिंदी अनुवाद

आप कौन हैं, जो इस उग्र रूप में हैं, यह मुझे बताइए। हे देवश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है, प्रसन्न हों। मैं आपको, जो आदि हैं, जानना चाहता हूँ; क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।

English Translation

Tell me who You are, so fierce in form. Salutations to You, O best of gods, be gracious. I wish to know You, the primal One, for I do not know Your purpose.

टीका / Commentary

अर्जुन भगवान् के इस रूप का रहस्य जानना चाहते हैं।