श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 31

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 48 मिनट का पठन 128 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

19 पद
आख्याहि
बताइए
मे
मुझे
कः
कौन
भवान्
आप
उग्ररूपः
उग्र रूप वाले
नमः
नमस्कार
अस्तु
हो
ते
आपको
देववर
हे देवश्रेष्ठ
प्रसीद
प्रसन्न हों
विज्ञातुम्
जानने की
इच्छामि
इच्छा करता हूँ
भवन्तम्
आपको
आद्यम्
आदि
न
नहीं
हि
ही
प्रजानामि
जानता हूँ
तव
आपकी
प्रवृत्तिम्
प्रवृत्ति।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

आप कौन हैं, जो इस उग्र रूप में हैं, यह मुझे बताइए। हे देवश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है, प्रसन्न हों। मैं आपको, जो आदि हैं, जानना चाहता हूँ; क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और कॉस्मिक (ब्रह्मांडीय) चेतना

सनातन धर्म के आध्यात्मिक गगन में श्रीमद्भागवतगीता एक ऐसा सूर्य है, जो न केवल मनुष्य के अंतःकरण के अज्ञान रूपी अंधकार को चीरता है, बल्कि उसे परम सत्य के दर्शन भी करवाता है। भगवद्गीता के एकादश अध्याय (11th Chapter), जिसे 'विश्वविश्वरूपदर्शनयोग' के नाम से जाना जाता है, संपूर्ण वैदिक वाङ्मय का सबसे रहस्यमयी, उद्बोधक और विस्मयकारी भाग है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने परम ऐश्वर्यशाली, अनंत और भयानक रूप का दर्शन अर्जुन को कराते हैं। जिस समय अर्जुन भगवान के इस उग्र, प्रलयंकारी और लोक-संहारकारी रूप को देखते हैं, उस समय उनके मन में विस्मय, भय, और यह जानने की तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि आखिर यह महाविनाशक स्वरूप किसका है और इसका वास्तविक उद्देश्य क्या है?

इस लेख में हम श्रीमद्भागवतगीता के ग्यारहवें अध्याय के $31$ वें श्लोक—“आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥”—की अत्यंत सूक्ष्म, दार्शनिक, और शास्त्रीय समीक्षा प्रस्तुत करने जा रहे हैं। भारतीय संस्कृति में यह श्लोक केवल कुछ शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह अज्ञान के अंधकार से प्रकाश की ओर, भय से शरणागति की ओर और सीमित मानवीय चेतना से असीम ब्रह्मांडीय चेतना की ओर यात्रा करने का एक शाश्वत मार्ग है। जब एक साधक अपने जीवन में भीषण संकटों, अनिश्चितताओं और प्रलयंकारी परिस्थितियों से घिर जाता है, तब उसके भीतर भी ठीक वैसा ही विमर्श जन्म लेता है जैसा अर्जुन के मन में हुआ था। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब बुद्धि भ्रमित हो जाए, तब अहंकार का त्याग करके परम शक्ति के चरणों में नतमस्तक होकर प्रामाणिक जिज्ञासा प्रकट करना ही एक सच्चे भक्त का धर्म है।

भक्तिलोक.इन के इस समर्पित मंच पर हम वेदों, उपनिषदों और पुराणों के संदर्भों के साथ इस श्लोक की गहराई में उतरेंगे। हम समझेंगे कि कैसे भगवान का यह 'उग्र रूप' वास्तव में समय, काल और कर्म के उस चक्र का प्रतीक है, जिससे कोई भी जीव अछूता नहीं रह सकता। यह पाठकों को न केवल मानसिक शांति प्रदान करेगा, बल्कि उनके भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा, सकारात्मक और भयमुक्त आभा (Aura) का निर्माण भी करेगा। आइए, इस पावन यात्रा का आरंभ करें और भगवद्गीता के इस अमूल्य मंत्र के मर्म को आत्मसात करें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ अथ एकादशोध्यायः - विश्वरूपदर्शनयोगः ॥

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥

(उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक पद को स्पष्ट रूप से बोलें। 'नमोऽस्तु ते' में विसर्ग संधि और 'उग्ररूपो' में ओकार की ध्वनि पर विशेष ध्यान दें।)

श्लोक पाठ के लिए सरल हिंदी में भावार्थ:

हे देवश्रेष्ठ! आप मुझे यह बतलाइए कि ये उग्र रूप वाले आप कौन हैं? आपको मेरा नमस्कार हो, आप मुझपर प्रसन्न हों। मैं आदिपुरुष आपको विशेष रूप से जानना चाहता हूँ; क्योंकि मैं आपकी इस प्रवृत्ति (प्रयोजन या कार्य) को वास्तव में नहीं जानता हूँ।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

प्रत्येक संस्कृत शब्द अपने गर्भ में एक गाढ़ दार्शनिक अर्थ छिपाए हुए है। आइए, इस तालिका के माध्यम से श्लोक के प्रत्येक पद का व्याकरणिक और आध्यात्मिक विश्लेषण करते हैं:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
आख्याहि भली-भांति कहिए या बताइए गुरु या ईश्वर के समक्ष ज्ञान प्राप्ति की आर्त और विनम्र पुकार।
मे मुझसे / मेरे लिए व्यक्तिगत समर्पण और साधक की जिज्ञासा का प्रत्यक्ष बोध।
कः भवान् आप कौन हैं? माया और भ्रम से परे परम सत्य (ब्रह्म) के वास्तविक स्वरूप को जानने की इच्छा।
उग्ररूपः भयंकर, प्रलयंकारी या उग्र आकृति वाले काल (समय) का वह रूप जो समस्त संसार का संहार करने की क्षमता रखता है।
नमः अस्तु ते आपको मेरा नमस्कार हो भय के क्षणों में भी अहंकार छोड़कर परम शक्ति के प्रति अगाध श्रद्धा और नमन।
देववर हे देवताओं में श्रेष्ठ / सर्वशक्तिमान समस्त ब्रह्मांड के अधीश्वर और देवताओं के भी आराध्य के रूप में भगवान की स्वीकृति।
प्रसीद प्रसन्न होइए / कृपा कीजिए क्रोधित या संहारक रूप को शांत कर करुणामयी और सौम्य रूप में आने की प्रार्थना।
विज्ञातुम् इच्छामि मैं जानना चाहता हूँ जिज्ञासा (Inquiry) जो कि मोक्ष और ज्ञान का प्रथम सोपान है।
भवन्तम् आद्यम् आप आदिपुरुष (मूल कारण) को वह सत्ता जिससे संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है और जिसमें इसका विलय होता है।
न हि प्रजानामि मैं वास्तव में नहीं जानता हूँ अपनी अज्ञानता और सीमित बुद्धि का पूर्ण स्वीकार (Humility)।
तव प्रवृत्तिम् आपकी इस प्रवृत्ति (कार्य/लीला) को ईश्वर के उस रहस्यमयी विधान को समझना, जो साधारण मानव बुद्धि की पहुँच से परे है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले, जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन का गाण्डीव उनके हाथों से छूटने लगा और वे अपने स्वजनों को सामने युद्धरत देखकर गहरे शोक और मोह में डूब गए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वही 'श्रीमद्भागवतगीता' के रूप में अमर हो गया। दस अध्यायों तक भगवान ने योग, ज्ञान, भक्ति और ऐश्वर्य का वर्णन किया। अर्जुन ने भगवान के वचनों को सुना, समझा और अंत में अपनी जिज्ञासा प्रकट की कि वे भगवान के उस ऐश्वर्यशाली रूप का प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहते हैं, जिसके बारे में वे निरंतर चर्चा कर रहे थे।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन की इस उत्कट इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें 'दिव्य चक्षु' (Divine Sight) प्रदान किए। साधारण मानवी आँखों से कोई भी जीव भगवान के उस विराट, तेजोमय और अनंत रूप को सहन नहीं कर सकता था। जैसे ही वे दिव्य नेत्र अर्जुन को मिले, कुरुक्षेत्र का मैदान गायब हो गया और अर्जुन के समक्ष प्रकट हुआ एक ऐसा अनंत ब्रह्मांड, जिसके हजारों मुख, नेत्र, और हाथ थे। उस रूप में सूर्य और चंद्रमा जैसी दीप्तियाँ थीं, और उनके मुख से निकलती हुई प्रलयंकारी अग्नि संपूर्ण ब्रह्मांड को भस्म कर रही थी। कुरुक्षेत्र के युद्ध में आए हुए भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधनादि राजा उस महाकाल के मुख में तेज़ी से प्रवेश कर रहे थे और उनके दाँतों के बीच पिस रहे थे।

यह दृश्य इतना डरावना और अद्भुत था कि पराक्रमी अर्जुन, जो कभी युद्ध से पीछे नहीं हटना चाहते थे, भय से काँपने लगे। उनके रोंगटे खड़े हो गए। जिस अर्जुन ने कभी किसी अस्त्र-शस्त्र से भय नहीं खाया था, वह आज काल के इस विकराल रूप को देखकर हतप्रभ रह गया। इसी महासंकट और आन्तरिक विह्वलता के क्षण में अर्जुन ने हाथ जोड़कर भगवान से यह प्रश्न पूछा—"आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो..."। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि जब भी मनुष्य अपने जीवन में भयंकर परिस्थितियों का सामना करता है, जहाँ उसे अपने चारों ओर विनाश और अनिश्चितता दिखती है, तब उसे हताश होने के बजाय भगवान के इस विराट स्वरूप के मर्म को समझना चाहिए। यह सृष्टि का शाश्वत नियम है—जो जन्मा है, उसका विनाश निश्चित है, और इन सबके पीछे उसी परमपिता परमेश्वर की महान लीला कार्य कर रही है।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस भीष्म पर्व (गीता पर्व) के अंतर्गत आने वाला यह प्रसंग सनातन संस्कृति के दार्शनिक शिखर को छूता है। यह हमें यह भी बताता है कि भगवान केवल प्रेम, बांसुरी और मक्खन चोरी करने वाले नटखट बाल गोपाल ही नहीं हैं, बल्कि वे इस संपूर्ण ब्रह्मांड के रचयिता, पालक और संहारक महाकाल भी हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भागवतगीता के एकादश अध्याय के इस विशिष्ट श्लोक और उसके संदर्भ का नियमित स्मरण, पाठ और मनन करने से साधक के जीवन में अनेकानेक चमत्कारी परिवर्तन आते हैं। यहाँ इसके 8 प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ बताए गए हैं:

1. मानसिक भय और अज्ञात चिंताओं का नाश

जब हम यह समझ जाते हैं कि संसार की हर हलचल एक महान शक्ति के नियंत्रण में है, तो हमारे मन से भविष्य का अज्ञात भय और घबराहट स्वतः समाप्त होने लगती है।

2. विनम्रता और अहंकार का शमन

अर्जुन की तरह "न हि प्रजानामि" (मैं नहीं जानता) का भाव अपनाने से व्यक्ति के भीतर का अंहकार गल जाता है, जो कि आध्यात्मिक प्रगति का सबसे बड़ा शत्र है।

3. सकारात्मक और शक्तिशाली आभा (Positive Aura)

इस श्लोक के नियमित जप और इसके अर्थ पर ध्यान केंद्रित करने से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक और आध्यात्मिक ऊर्जा की रक्षात्मक दीवार बनती है।

4. संकट काल में निर्णय लेने की क्षमता

जिस प्रकार अर्जुन ने संकट में भगवान से मार्गदर्शन मांगा, उसी प्रकार नियमित साधक को भी कठिन परिस्थितियों में अंदरूनी विवेक और सही निर्णय लेने की शक्ति मिलती है।

5. कर्म और काल के सिद्धांत की गहरी समझ

साधक को यह स्पष्ट हो जाता है कि कर्म का फल अटल है और समय (काल) किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, जिससे वह अपने जीवन में सत्कर्मों के प्रति अधिक सजग हो जाता है।

6. तीव्र एकाग्रता और मानसिक शांति

संस्कृत के इन दिव्य शब्दों के उच्चारण से मस्तिष्क की तरंगें (Brain waves) शांत होती हैं, जिससे ध्यान (Meditation) में उतरना अत्यंत सहज हो जाता है।

7. भगवान के प्रति अनन्य शरणागति (Surrender)

यह श्लोक भक्त को सिखाता है कि कठिन समय में खुद को भगवान के चरणों में पूरी तरह समर्पित कर देना ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।

8. आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) का मार्ग

ब्रह्मांडीय सत्य से जुड़ने के कारण साधक धीरे-धीरे अपनी भौतिक पहचान से ऊपर उठकर आत्मा और परमात्मा के शाश्वत संबंध का अनुभव करने लगता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तलोक.इन (Bhaktilok.in) पर प्रकाशित यह विस्तृत आलेख वेदों, श्रीमद्भागवतगीता के शांकर भाष्य, रामानुज भाष्य और विभिन्न प्रामाणिक सनातन ग्रंथों के गहन अध्ययन के पश्चात हमारे वरिष्ठ विद्वानों और संस्कृत भाषाविदों की देखरेख में तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों और पुराणों का शुद्ध, अकाट्य और जीवनोपयोगी ज्ञान पहुँचाना है।

इस आलेख को तैयार करते समय वैयाकरण नियमों, शब्दों के सटीक प्राकृत अर्थों और दार्शनिक परंपराओं का पूर्ण सम्मान किया गया है। यदि आपके मन में इस श्लोक या इसके अर्थ से जुड़ा कोई भी प्रश्न हो, तो आप हमारे कमेंट सेक्शन के माध्यम से या हमारे विद्वान पैनल से संपर्क कर सकते हैं। भक्तलोक.इन सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार और प्रामाणिक सामग्री प्रदान करने के लिए कटिबद्ध है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: अर्जुन ने भगवान से उनके ऐश्वर्यशाली और अनंत स्वरूप के दर्शन कराने की प्रार्थना की थी (अध्याय 11, श्लोक 3-4)। भगवान ने अर्जुन की इस जिज्ञासा को पूरा करने और यह सिद्ध करने के लिए कि वे ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड के रचयिता, पालक और संहारक महाकाल हैं, अपना यह विराट और उग्र रूप प्रकट किया था। इसके माध्यम से यह भी दिखाना था कि कुरुक्षेत्र का युद्ध भगवान के दिव्य विधान के अंतर्गत ही हो रहा है।

उत्तर: यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब जीवन में भयंकर संकट, अनिश्चितताएं या प्रलय जैसी स्थितियां आ जाएं, तब हमें घबराने के बजाय अपनी अज्ञानता स्वीकार करनी चाहिए और भगवान के समक्ष विनम्र होकर प्रार्थना करनी चाहिए। यह संकट के समय धैर्य, संयम और ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति सिखाता है।

उत्तर: नहीं, गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि साधारण मानवी आँखों या भौतिक इंद्रियों से इस अनंत और तेजोमय रूप को देखना असंभव है। इसके लिए भगवान की विशेष कृपा और 'दिव्य चक्षु' (Divine Sight) की आवश्यकता होती है, जो उन्होंने अर्जुन को प्रदान किए थे।

उत्तर: जब हम इस श्लोक का उच्चारण और इसके दार्शनिक मर्म को समझते हैं, तो हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। हमें यह अहसास होता है कि हमारे जीवन की छोटी-मोटी चिंताएं उस महान कॉस्मिक चक्र के आगे क्षणिक हैं। यह समझ हमारे मन को भीतर से मजबूत करती है और मानसिक तनाव व भय को दूर भगाती है।

उत्तर: एकादश अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि भगवान श्रीकृष्ण ही इस सृष्टि के सर्वशक्तिमान नियंत्रक हैं। वेदों के कर्मकांड, योग और तपस्या से भी दुर्लभ उनके इस विराट रूप के दर्शन केवल अनन्य भक्ति (Bhakti Yoga) के माध्यम से ही संभव हैं। अंततः भगवान अर्जुन को भयमुक्त करके अपने शांत और सौम्य चतुर्बाहु रूप में पुनः प्रकट होते हैं, जो यह बताता है कि ईश्वर का मूल स्वभाव प्रेम और करुणा ही है।

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सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ॥

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आप कौन हैं, जो इस उग्र रूप में हैं, यह मुझे बताइए। हे देवश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है, प्रसन्न हों। मैं आपको, जो आदि हैं, जानना चाहता हूँ; क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के रहस्य को जानना ही मुक्ति का मार्ग है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 31 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 31/55 56% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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