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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 30

अध्याय 11 · श्लोक 30

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३०॥

lelihyase grasamānaḥ samantāl lokān samagrān vadanair jvaladbhiḥ | tejobhir āpūrya jagat samagraṃ bhāsas tavogrāḥ pratapanti viṣṇo ||30||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

लेलिह्यसे: चाट रहे हो; ग्रसमानः: निगलते हुए; समन्तात्: चारों ओर से; लोकान्: लोकों को; समग्रान्: सम्पूर्ण; वदनैः: मुखों से; ज्वलद्भिः: प्रज्वलित; तेजोभिः: तेज से; आपूर्य: भरकर; जगत्: जगत्; समग्रम्: सम्पूर्ण; भासः: किरणें; तव: आपकी; उग्राः: उग्र; प्रतपन्ति: तपा रही हैं; विष्णो: हे विष्णो।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

आप अपने प्रज्वलित मुखों से चारों ओर के समस्त लोकों को चाटते हुए निगल रहे हैं। हे विष्णो, आपकी उग्र किरणें सम्पूर्ण जगत् को तेज से भरकर तपा रही हैं।

English Translation

Licking all the worlds with Your blazing mouths, You are devouring them on all sides. Your fierce rays fill the whole universe with radiance and burn it, O Vishnu.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् के संहारक रूप का भयानक वर्णन।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।