श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 30

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 44 मिनट का पठन 144 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
लेलिह्यसे
चाट रहे हो
ग्रसमानः
निगलते हुए
समन्तात्
चारों ओर से
लोकान्
लोकों को
समग्रान्
सम्पूर्ण
वदनैः
मुखों से
ज्वलद्भिः
प्रज्वलित
तेजोभिः
तेज से
आपूर्य
भरकर
जगत्
जगत्
समग्रम्
सम्पूर्ण
भासः
किरणें
तव
आपकी
उग्राः
उग्र
प्रतपन्ति
तपा रही हैं
विष्णो
हे विष्णो।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

आप अपने प्रज्वलित मुखों से चारों ओर के समस्त लोकों को चाटते हुए निगल रहे हैं। हे विष्णो, आपकी उग्र किरणें सम्पूर्ण जगत् को तेज से भरकर तपा रही हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रस्तावना: महाकाल का विराट और प्रलयंकारी स्वरूप

सनातन धर्म और भारतीय अध्यात्म में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु मानव जीवन के प्रत्येक संशय को मिटाने वाला ब्रह्मविद्या का जीवंत प्रकाशपुंज माना गया है। गीता के एकादश अध्याय, जिसे 'विश्वस्वरूप दर्शन योग' के नाम से जाना जाता है, में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना वह अलौकिक, अनंत और विराट रूप दिखाते हैं जिसे देखने के लिए देवता भी तरसते हैं। इस संपूर्ण अध्याय में भगवान के सौम्य रूप से लेकर उनके घोर प्रलयंकारी और संहारक रूप तक का अत्यंत सजीव चित्रण महर्षि वेद व्यास ने किया है। प्रस्तुत श्लोक (संख्या 30) उसी महाप्रलय की भीषणता, भगवान की अनंत शक्ति और काल के ग्रास बनते संपूर्ण ब्रह्मांड का अत्यंत मार्मिक एवं झकझोर देने वाला वर्णन है।

सांसारिक मोह-माया और अहंकार में डूबा हुआ मानव जब अपनी लघुता को भूलकर स्वयं को ही सब कुछ मान बैठता है, तब गीता का यह श्लोक उसे यह अहसास कराता है कि यह संपूर्ण चराचर जगत उस महाकाल के नियंत्रण में है। भगवान विष्णु का यह 'लेलिह्यमान' (जीभ से चाटते हुए) और 'ग्रसमान' (निगलते हुए) रूप हमें इस बात का स्मरण कराता है कि जन्म और मृत्यु, उत्पत्ति और प्रलय इस ब्रह्मांड के शाश्वत नियम हैं। इस श्लोक की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता इस बात में निहित है कि यह अर्जुन के मन में बचे हुए अंतिम भ्रम और भय को तोड़कर उसे उसके वास्तविक कर्तव्य (धर्म) की ओर प्रवृत्त करता है। भक्तलौक (Bhaktilok.in) के इस विशेष अध्ययन में हम इसी दिव्य श्लोक के हर एक शब्द, उसके व्याकरण, उसकी पौराणिक पृष्ठभूमि और उसके व्यावहारिक व आध्यात्मिक प्रभावों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।

तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३०॥

श्लोक का उच्चारण एवं पाठ विधि:

इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को अपनी श्वास और उच्चारण की शुद्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। 'लेलिह्यसे' शब्द का उच्चारण करते समय जिह्वा की गति और 'ग्रसमानः' में अनुस्वार की स्पष्टता होनी आवश्यक है। एकादश अध्याय के इनोग्रेशन या विशेष संकट काल के समय इस श्लोक का मानसिक जप साधक के भीतर साहस, निर्भीकता और वैराग्य की भावना का संचार करता है। इसका पाठ संध्याकाल में या ध्यान की अवस्था में किया जाना अत्यंत फलदायी माना गया है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
लेलिह्यसे (Lelihyase) बार-बार चाट रहे हो भगवान काल के रूप में संपूर्ण लोकों और प्राणियों को अपनी प्रलयंकारी अग्नि से लगातार ग्रसित कर रहे हैं।
ग्रसमानः (Grasamanah) ग्रास बनाते हुए / निगलते हुए सृष्टि के अंत समय में सभी जीव-जंतु और लोक स्वतः ही परमात्मा के मुख में समाहित हो जाते हैं।
समन्तात (Samantaat) सब ओर से / चारों तरफ से काल की गति से कोई भी दिशा, कोई भी लोक या कोई भी प्राणी अछूता नहीं बचा है।
लोकान् समग्रान् (Lokan Samagran) संपूर्ण लोकों को ब्रह्मांड के चौदह भवन और उसमें निवास करने वाले सभी चर-अचर जीव।
वदनैः ज्वलद्भिः (Vadanaih Jvaladbhih) प्रज्वलित (धधकते हुए) मुखों से क्रोध और प्रलय की अग्नि से दमकते हुए अनंत मुख जो विनाश का प्रतीक हैं।
तेजोभिः (Tejobhih) अपने तीव्र तेजों से / प्रकाश से भगवान की ऊर्जा इतनी प्रचंड है कि वह सूर्य और अग्नि के प्रकाश को भी तिरोहित कर रही है।
आपूर्य (Aapoorya) परिपूर्ण करके / भरकर परमात्मा का तेज संपूर्ण ब्रह्मांड के चप्पे-चप्पे में व्याप्त हो चुका है।
जगत् समग्रम् (Jagat Samagram) समस्त ब्रह्मांड को भौतिक और आध्यात्मिक जगत का संपूर्ण विस्तार।
भासः तव उग्राः (Bhasah Tava Ugran) आपकी भयंकर और उग्र कांतियाँ ऐसी आभा जो साधारण नेत्रों के देखने योग्य नहीं है, अत्यंत भीषण और डरावनी है।
प्रतपन्ति विष्णो (Pratapanti Vishno) तपा रही हैं हे विष्णो! सर्वव्यापक भगवान विष्णु का यह उग्र प्रताप संपूर्ण सृष्टि को संतप्त और भयभीत कर रहा है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले, जब अर्जुन कौरव सेना को सामने देखकर विषाद से भर जाते हैं और अपने गांडीव धनुष को रख देते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जो उपदेश देते हैं, वही 'श्रीमद्भगवद्गीता' के रूप में विख्यात है। कुरुक्षेत्र के मैदान में दिए गए इन उपदेशों के अंत तक आते-आते, अर्जुन के मन में जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि वे भगवान के उस परम ऐश्वर्य और मूल रूप का दर्शन करें जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड को संचालित करता है। अर्जुन के इस विनम्र अनुरोध पर भगवान श्रीकृष्ण उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं।

दिव्य दृष्टि मिलते ही अर्जुन के सामने जो दृश्य प्रकट होता है, वह मानव कल्पना से परे था। सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र और सहस्रों भुजाओं वाले उस विराट रूप में अर्जुन देखते हैं कि कौरव पक्ष के तमाम महारथी—भीष्म, द्रोण, कर्ण और उनके अपने ही सैनिक—भगवान के जलते हुए मुखों की ओर तेजी से खिंचे चले जा रहे हैं और उनके भयंकर दाँतों के बीच पिस रहे हैं। इस ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंग में महर्षि वेद व्यास ने यह दर्शाया है कि युद्ध का परिणाम क्या होने वाला है और काल का चक्र किस प्रकार सबके भाग्य का निर्धारण कर रहा है।

यह प्रसंग केवल कुरुक्षेत्र तक सीमित नहीं है, यह सनातन सत्य का प्रतीक है। भगवान विष्णु, जो इस सृष्टि के पालनकर्ता हैं, आवश्यकता पड़ने पर संहारक (काल) का विकराल रूप भी धारण कर लेते हैं। 'विष्णो' संबोधन यहाँ इस बात की ओर संकेत करता है कि जो सर्वव्यापक है, वही अंततः सब कुछ अपने भीतर समेटने की कुवत भी रखता है। इस पृष्ठभूमि का स्मरण करने मात्र से साधक के हृदय में संसार की अनित्यता (नश्वरता) का बोध जागृत हो जाता है और वह क्षणिक सुख-दुखों से ऊपर उठकर परम सत्य की खोज में प्रवृत्त होता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

भगवान श्रीकृष्ण के इस विराट एवं संहारक रूप के स्मरण और श्लोकों के नियमित अभ्यास से साधक को निम्नलिखित अमूल्य आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. निर्भीकता और साहस की प्राप्ति

इस भीषण रूप के दर्शन और पाठ से मनुष्य के मन से मृत्यु और भविष्य का अज्ञात भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है, क्योंकि उसे ज्ञात हो जाता है कि सब कुछ ईश्वर के नियंत्रण में है।

2. अहंकार का नाश

जब साधक यह देखता है कि संपूर्ण लोक भगवान के मुख में समा रहे हैं, तो उसका 'मैं और मेरा' का अहंकार स्वतः ही नष्ट हो जाता है और विनम्रता जन्म लेती है।

3. मानसिक एकाग्रता एवं शांति

गीता के इन गहरे और शक्तिशाली श्लोकों का मानसिक मंथन करने से चित्त की चंचलता शांत होती है और मन में गहन एकाग्रता (डिप मेडिटेशन) की स्थिति बनती है।

4. कर्म प्रधान दृष्टिकोण (कर्मयोग)

यह श्लोक फल की चिंता छोड़े बिना केवल अपने कर्तव्य (धर्म) का पालन करने की प्रेरणा देता है, क्योंकि परिणाम का निर्धारण तो साक्षात महाकाल कर रहे हैं।

5. कार्मिक शुद्धि (पाप कर्मों से मुक्ति)

भगवान के विराट स्वरूप के प्रति पूर्ण समर्पण और भक्तिभाव रखने से पूर्वजन्मों और वर्तमान के नकारात्मक कर्मों के बंधनों का प्रभाव कम होने लगता है।

6. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

श्लोक में वर्णित 'तेजोभिरापूर्य' (तेज से परिपूर्ण) का भाव साधक के औरा (Aura) को शुद्ध करता है और उसके आसपास एक सुरक्षात्मक आध्यात्मिक आवरण बनाता है।

7. तीव्र वैराग्य की भावना

संसार की नश्वरता का साक्षात दर्शन होने से भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति कम होती है और साधक मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होता है।

8. भगवत्कृपा और शरणगति

विकराल काल रूप को देखकर साधक भगवान की शरण में जाने के लिए विवश हो जाता है, जिससे उसे अनन्य भक्ति और भगवान की सीधी कृपा प्राप्त होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख और श्लोक की व्याख्या पारंपरिक वैदिक परंपरा, श्रीमद्भगवद्गीता (वेद व्यास कृत महाभारत का अंश), और आचार्यों की टीकाओं (विशेषकर आदि शंकराचार्य और स्वामी रामसुखदास जी के दृष्टिकोण) के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के गूढ़ सत्यों को अत्यंत सरल, स्पष्ट और प्रामाणिक हिंदी में पहुँचाना है। प्रत्येक शब्द के अर्थ और उसके दार्शनिक निहितार्थों को सत्यापित करने के बाद ही इसे प्रकाशित किया गया है ताकि जिज्ञासु और भक्तजन इसका पूर्ण आध्यात्मिक लाभ उठा सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण के विराट, अनंत और प्रलयंकारी (संहार करने वाले) महाकाल रूप का वर्णन किया गया है। इसमें उनके जलते हुए मुखों और प्रचंड तेजों द्वारा संपूर्ण ब्रह्मांड को ग्रसित किए जाने का दृश्य दर्शाया गया है।

बिल्कुल नहीं। यद्यपि यह रूप देखने में भीषण है, किंतु इसका उद्देश्य साधक के मन से संसार के प्रति मोह और मृत्यु का भय हटाना है। जब आप यह समझ जाते हैं कि काल भी भगवान के नियंत्रण में है, तो आपके भीतर एक असीम निर्भीकता पैदा होती है।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के एकादश (11वें) अध्याय 'विश्वस्वरूप दर्शन योग' के अंतर्गत आता है, जिसमें कुल 55 श्लोक हैं और भगवान ने अर्जुन को अपना विराट स्वरूप दिखाया था।

जब हम इस श्लोक का पाठ और इसके अर्थ पर मनन करते हैं, तो हमारे व्यक्तिगत अहंकार और छोटी-छोटी चिंताओं का दायरा छोटा हो जाता है। हमें यह अहसास होता है कि हम एक विराट व्यवस्था का हिस्सा हैं, जिससे मन शांत और स्थिर हो जाता है।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक हर मनुष्य के लिए है, चाहे वह गृहस्थ हो, सन्यासी हो या विद्यार्थी हो। गृहस्थ जीवन में रहते हुए कर्तव्यों का पालन करते हुए भगवान के इस विराट स्वरूप का स्मरण करने से व्यक्ति अपने मार्ग से विचलित नहीं होता और धर्म के पथ पर अडिग रहता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आप अपने प्रज्वलित मुखों से चारों ओर के समस्त लोकों को चाटते हुए निगल रहे हैं। हे विष्णो, आपकी उग्र किरणें सम्पूर्ण जगत् को तेज से भरकर तपा रही हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

प्रलयकाल में भगवान् ही सबका संहार करते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 30 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 30/55 55% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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