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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 29

अध्याय 11 · श्लोक 29

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९॥

yathā pradīptaṃ jvalanaṃ pataṅgā viśanti nāśāya samṛddha-vegāḥ | tathaiva nāśāya viśanti lokās tavāpi vaktrāṇi samṛddha-vegāḥ ||29||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यथा: जैसे; प्रदीप्तम्: प्रज्वलित; ज्वलनम्: अग्नि में; पतङ्गा: पतंगे; विशन्ति: प्रवेश करते हैं; नाशाय: नाश के लिए; समृद्धवेगाः: तीव्र वेग से; तथा: वैसे ही; एव: ही; नाशाय: नाश के लिए; विशन्ति: प्रवेश करते हैं; लोकाः: लोक; तव: आपके; अपि: भी; वक्त्राणि: मुखों में; समृद्धवेगाः: तीव्र वेग से।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जैसे प्रज्वलित अग्नि में पतंगे तीव्र वेग से नाश के लिए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी तीव्र वेग से आपके मुखों में नाश के लिए प्रवेश कर रहे हैं।

English Translation

As moths with great speed rush into a blazing fire for destruction, so do these people with great speed rush into Your mouths for their destruction.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

पतंगों के अग्नि में गिरने का उदाहरण।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।