विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 29
श्लोक २९ में पतंगों के अग्नि में गिरने जैसा विनाश दिखाया गया है। Verse 29: Warriors rush into the Lord's mouths like moths into fire.
संस्कृत श्लोक
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९॥
yathā pradīptaṃ jvalanaṃ pataṅgā viśanti nāśāya samṛddha-vegāḥ | tathaiva nāśāya viśanti lokās tavāpi vaktrāṇi samṛddha-vegāḥ ||29||
पदच्छेद / शब्दार्थ
यथा: जैसे; प्रदीप्तम्: प्रज्वलित; ज्वलनम्: अग्नि में; पतङ्गा: पतंगे; विशन्ति: प्रवेश करते हैं; नाशाय: नाश के लिए; समृद्धवेगाः: तीव्र वेग से; तथा: वैसे ही; एव: ही; नाशाय: नाश के लिए; विशन्ति: प्रवेश करते हैं; लोकाः: लोक; तव: आपके; अपि: भी; वक्त्राणि: मुखों में; समृद्धवेगाः: तीव्र वेग से।
हिंदी अनुवाद
जैसे प्रज्वलित अग्नि में पतंगे तीव्र वेग से नाश के लिए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी तीव्र वेग से आपके मुखों में नाश के लिए प्रवेश कर रहे हैं।
English Translation
As moths with great speed rush into a blazing fire for destruction, so do these people with great speed rush into Your mouths for their destruction.
टीका / Commentary
पतंगों के अग्नि में गिरने का उदाहरण।