श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 27

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 51 मिनट का पठन 133 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
वक्त्राणि
मुखों में
ते
आपके
त्वरमाणाः
शीघ्रता से
विशन्ति
प्रवेश कर रहे हैं
दंष्ट्राकरालानि
दाढ़ों से विकराल
भयानकानि
भयानक
केचित्
कुछ
विलग्नाः
चिपके हुए
दशनान्तरेषु
दाँतों के बीच
सन्दृश्यन्ते
दिख रहे हैं
चूर्णितैः
चूर्ण हुए
उत्तमाङ्गैः
सिरों से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वे सब आपके उन भयानक दाढ़ों वाले मुखों में शीघ्रता से प्रवेश कर रहे हैं। कुछ तो दाँतों के बीच चिपके हुए दिख रहे हैं और उनके सिर चूर्ण हो गए हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

विराट रूप का महाकाव्यिक एवं आध्यात्मिक स्वरूप: एक गहन दृष्टि

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु मानव चेतना के उत्थान और संपूर्ण ब्रह्मांड के रहस्यों को उद्घाटित करने वाला महाविज्ञान माना गया है। गीता के एकादश अध्याय (11वें अध्याय) में वर्णित 'विश्वयोनि' या 'विराट रूप दर्शन योग' सनातन साहित्य का सबसे अधिक रोमांचक, विस्मयकारी और प्रलयंकारी प्रसंग है। अर्जुन की विनम्र प्रार्थना और जिज्ञासा के उत्तर में भगवान श्री कृष्ण ने अपने ऐश्वर्य, योगशक्ति और महाकाल स्वरूप का जो प्रत्यक्ष दर्शन कराया, वह मानवीय कल्पना की समस्त सीमाओं को पार कर जाता है।

प्रस्तुत श्लोक—"वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि। केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७॥"—उसी महाप्रलय के साक्षात् प्रसंग का चरम और अत्यंत डरावना दृश्य प्रस्तुत करता है। यह श्लोक काल के उस ग्रास को दर्शाता है जहाँ सम्पूर्ण चराचर जगत, विशेषकर धृतराष्ट्र के पुत्रों सहित समस्त शत्रु योद्धा, भगवान के भयानक और दाढ़ों से सुसज्जित मुखमंडल में अनियंत्रित रूप से प्रवेश कर रहे हैं। यहाँ भगवान केवल एक रक्षक या सखा के रूप में नहीं, अपितु 'काल' (महाकाल) के रूप में प्रकट हुए हैं, जो संपूर्ण सृष्टि के संहार और पुनर्रचना के चक्र को नियंत्रित कर रहे हैं।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक हमें इस नश्वर संसार की वास्तविकता से अवगत कराता है। यह हमें यह सिखाता है कि जो कुछ भी जन्मा है, उसका विलीन होना इस ब्रह्मांडीय नियम (ऋत) के अंतर्गत निश्चित है। जब भक्तजन या साधक इस श्लोक का अध्ययन और मनन करते हैं, तो उनके मन में अहंकार, मोह और आसक्ति का शमन होता है तथा परमपिता परमात्मा के प्रति एक विस्मययुक्त भक्ति (भययुक्त विस्मय) जाग्रत होती है। Bhaktilok.in के इस विशेष अंक में हम इसी गूढ़ श्लोक के प्रत्येक शब्द, उसके दार्शनिक निहितार्थ, पौराणिक पृष्ठभूमि और व्यावहारिक जीवन में उसके आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से विश्लेषण करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ श्लोकः २७ (एकादशोध्यायः - विश्वरूपदर्शनयोगः)

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७॥

(वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि|
केचित् विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैः उत्तमाङ्गैः॥)

पठन विधि एवं उच्चारण निर्देश: इस श्लोक का पाठ करते समय वैदिक छंदों की लय का ध्यान रखना चाहिए। 'वक्त्राणि' का उच्चारण स्पष्ट अनुस्वार के साथ होना चाहिए। 'त्वरमाणा' शब्द में गति और वेग का भाव झलकलना चाहिए, जबकि 'दंष्ट्राकरालानि' (दाढ़ों के कारण भयंकर) बोलते समय भगवत स्वरूप की भीषणता का स्मरण करना चाहिए। नित्य प्रति एकादश अध्याय के पाठ के अंतर्गत इस श्लोक के सस्वर पाठ से साधक की मानसिक एकाग्रता में वृद्धि होती है और भय पर विजय प्राप्त करने की आंतरिक शक्ति मिलती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक के प्रत्येक पद में अगाध दार्शनिक और तात्विक संदेश छिपा है। नीचे दी गई तालिका में शब्दों के सरल हिंदी अर्थ के साथ-साथ उनके गहन आध्यात्मिक भावों को स्पष्ट किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
वक्त्राणि (Vaktrani) मुखों में भगवान के अनंत और सर्वव्यापी मुख, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।
ते (Te) आपके उस परम पुरुष, वासुदेव श्री कृष्ण का सर्वशक्तिमान और अद्वितीय स्वरूप।
त्वरमाणाः (Tvaramanah) वेगपूर्वक, शीघ्रता से दौड़ते हुए योद्धाओं की अपनी नियति (मृत्यु) की ओर अनियंत्रित और तीव्र गति, जिससे बचा नहीं जा सकता।
विशन्ति (Vishanti) प्रवेश कर रहे हैं काल के गाल में समा जाने की अनिवार्यता, जहाँ जीवात्माएँ अपने कर्मों के फलस्वरूप विलीन हो रही हैं।
दंष्ट्राकरालानि (Datashtrakaralani) दाढ़ों के कारण अत्यंत भयानक भगवान का वह रौद्र रूप जो भौतिक जगत के बंधनों और अज्ञानता का संहार करने वाला है।
भयानकानि (Bhayanakani) भय उत्पन्न करने वाले अहंकार और पापी प्रवृत्तियों के मन में ईश्वरीय न्याय का स्वाभाविक भय।
केचित् (Kechit) कुछ (योद्धा) विशिष्ट आत्माएं या प्राणी जो कर्म चक्र के उस विशेष चरण में फँसे हुए हैं।
विलग्नाः (Vilagnah) फँसे हुए, अटके हुए कर्मों के बंधनों में जकड़े रहना और मृत्यु के उपरांत भी माया से मुक्ति न पा पाना।
दशनान्तरेषु (Dashanantreshu) दाँतों के बीच में काल के नियंत्रण और उसकी अमोघ शक्ति की जकड़, जिससे कोई भी प्राणी बाहर नहीं निकल सकता।
सन्दृश्यन्ते (Sandrishyante) दिखाई दे रहे हैं दिव्य दृष्टि (प्रज्ञान चक्षु) के माध्यम से संजय या अर्जुन द्वारा प्रत्यक्ष अनुभव किया गया सत्य।
चूर्णितैः (Churnitaih) चूर्ण हुए, कुचले हुए अहंकार, बल और भौतिकता का सर्वनाश और उनकी पूर्ण असारता।
उत्तमाङ्गैः (Uttamangaih) मस्तकों सहित, सिरों से मनुष्य के सबसे ऊंचे और अभिमानी अंग (मस्तक) का काल द्वारा मिट्टी में मिला दिया जाना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय की यह पृष्ठभूमि महाभारत युद्ध के ठीक आरंभिक क्षणों की है, जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन विषादग्रस्त थे और भगवान श्री कृष्ण उन्हें कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का उपदेश दे चुके थे। अपने सखा कृष्ण के ऐश्वर्य और उनके परम ईश्वर स्वरूप को पूरी गहराई से जानने की लालसा व्यक्त करते हुए अर्जुन ने प्रार्थना की थी—"यदि मन्मष्यसि मया श शक्यं मया द्रष्टुम् प्रभो। योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्॥" (हे प्रभु, यदि आप समझते हैं कि वह रूप मेरे द्वारा देखा जा सकता है, तो हे योगेश्वर, आप मुझे अपना वह अविनाशी स्वरूप दिखाइए।)

भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन की इस प्रार्थना को स्वीकार किया और उन्हें दिव्य दृष्टि (अलौकिक चक्षु) प्रदान की। इस दिव्य दृष्टि के मिलते ही अर्जुन के समक्ष वह ब्रह्मांडीय दृश्य प्रकट हुआ जिसे आज हम 'विराट रूप' के नाम से जानते हैं। इस रूप में न केवल आकाश, पाताल, दिशाएं और संपूर्ण ब्रह्मांड समाहित था, अपितु कुरुक्षेत्र के मैदान में उपस्थित भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन जैसे महारथी तथा स्वयं उनकी अपनी सेनाएं भी भगवान के उन प्रलयंकारी मुखों में प्रवेश करती हुई दिखाई दे रही थीं।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस पर्व में यह प्रसंग इस महान सत्य को स्थापित करता है कि भौतिक युद्ध के पीछे एक अदृश्य आध्यात्मिक और दैवीय नियम कार्य कर रहा है। धृतराष्ट्र के पुत्रों और उनके सहयोगियों की आसुरी वृत्तियां पहले ही काल के मुख में समा चुकी थीं; कुरुक्षेत्र का युद्ध तो केवल उस आंतरिक और ब्रह्मांडीय संहार की एक बाहरी अभिव्यक्ति मात्र था। यह दृश्य देखकर अर्जुन कांप उठे और उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना की कि वे अपने इस भयानक रूप को समेटकर पुनः अपने शांत, सौम्य चतुर्बाहु या द्विबाहु रूप में आ जाएं। इस प्रकार, यह कथा हमें सिखाती है कि परमेश्वर का केवल पालक और प्रेमी रूप ही नहीं, बल्कि उनका संघारक और नियंत्रक रूप भी उतना ही सत्य और शाश्वत है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के एकादश अध्याय के इन श्लोकों का नियमित पठन, मनन और स्मरण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. अहंकार का पूर्ण शमन

जब साधक यह देखता है कि बड़े-बड़े महारथी और राजा काल के मुख में समा रहे हैं, तो उसका 'मैं' (अहंकार) स्वतः समाप्त हो जाता है और विनम्रता की भावना उत्पन्न होती है।

2. मृत्यु के भय से मुक्ति

इस विराट रूप के दर्शन से यह स्पष्ट हो जाता है कि मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा अमर है। इससे जीवन के अंतिम सत्य (मृत्यु) को स्वीकार करने का साहस मिलता है।

3. कर्म प्रधान जीवन की प्रेरणा

यह श्लोक स्मरण कराता है कि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, अतः प्रत्येक मनुष्य को निष्काम भाव से अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन तुरंत करना चाहिए।

4. मानसिक एकाग्रता और स्थिरता

गीता के इन गूढ़ श्लोकों के जाप और ध्यान से मन की चंचलता शांत होती है और ध्यान (Meditation) की गहराई तक पहुँचना आसान हो जाता है।

5. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

भगवान की असीम शक्ति और न्याय के विधान का स्मरण करने से आसपास की नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती हैं और एक दिव्य कवच का अनुभव होता है।

6. कर्म शुद्धि (Karmic Purification)

ईश्वरीय नियंत्रण के प्रति अटूट विश्वास रखने से गलत कार्यों से भय लगता है, जिससे अनजाने में होने वाले पापों और बुरे कर्मों से मुक्ति मिलती है।

7. संकट काल में धैर्य

जीवन के सबसे बड़े संकटों या विपरीत परिस्थितियों में भी यह बोध रहता है कि सब कुछ उस परमेश्वर की महान योजना का हिस्सा है, जिससे धैर्य बढ़ता है।

8. शरणागति भाव की प्राप्ति

संपूर्ण ब्रह्मांड को भगवान के नियंत्रण में देखकर साधक के भीतर स्वतः ही "त्वमेव माता च पिता त्वमेव" का शरणागति भाव जागृत हो जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह सामग्री सनातन धर्म के वेदों, उपनिषदों, पुराणों और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (विशेषकर आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और स्वामी विद्यारण्य के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार की गई है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक जो भी आध्यात्मिक और दार्शनिक सामग्री पहुँचे, वह शास्त्रीय मर्यादाओं के अनुकूल हो और आधुनिक जीवनशैली में प्रासंगिक भी हो।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: इस लेख का उद्देश्य केवल अनुवाद प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि श्लोक के अंतरंग रहस्यों को सरल हिंदी में आधुनिक साधकों तक पहुँचाना है ताकि वे अपने दैनिक जीवन में गीता के व्यावहारिक ज्ञान को उतार सकें। किसी भी प्रकार के संशय की स्थिति में पारंपरिक आचार्यों और प्रामाणिक ग्रंथों के परामर्श की संस्तुति की जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि भगवान श्री कृष्ण ही संपूर्ण ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता, पालक और संहारक (काल) हैं। यह श्लोक दिखाता है कि भौतिक जगत के सभी अहंकारी और पापी तत्व अंततः महाकाल के नियंत्रण और उनके प्रलयकारी मुख में समा जाते हैं, जिससे यह बोध होता है कि परमेश्वर की सर्वोच्च सत्ता से कोई भी बच नहीं सकता।

उत्तर: अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण के वचनों से संतुष्ट होने के बाद उनके ईश्वर रूप की असीम महिमा और ऐश्वर्य को अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देखने की जिज्ञासा प्रकट की थी। भगवान ने उनकी इसी सच्ची जिज्ञासा और अनन्य भक्ति को देखकर उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे वे उस विराट और प्रलयकारी रूप के दर्शन कर सके।

उत्तर: हाँ, यद्यपि यह श्लोक भगवान के एक भयंकर (प्रलयकारी) रूप का वर्णन करता है, परंतु इसका पाठ करने से साधक के भीतर यह सत्य स्थापित हो जाता है कि सब कुछ ईश्वर के नियंत्रण में है। इससे मृत्यु का भय और सांसारिक मोह-माया समाप्त होती है, जिससे मन को असीम आंतरिक शांति और निर्भयता प्राप्त होती है।

उत्तर: 'दंष्ट्राकरालानि' का शाब्दिक अर्थ है 'दाढ़ों के कारण अत्यंत भयानक'। दार्शनिक रूप से यह शब्द इस बात का प्रतीक है कि काल (समय) किसी को भी क्षमा नहीं करता। भौतिक अहंकार, अज्ञान और पापकर्म करने वालों के लिए काल की दाढ़ें अत्यंत डरावनी और अपरिहार्य होती हैं, जो कर्मों का सटीक हिसाब चुकता करती हैं।

उत्तर: एकादश अध्याय (विश्वरूपदर्शनयोग) का पाठ करने से पहले पवित्रता का ध्यान रखें, दीप प्रज्वलित करें और भगवान श्री कृष्ण का स्मरण करें। श्लोकों का सस्वर पाठ शांत चित्त से करें और उनके अर्थों पर विचार करें। पाठ के अंत में भगवान से क्षमा प्रार्थना और संपूर्ण समर्पण का भाव व्यक्त करना उत्तम माना गया है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वे सब आपके उन भयानक दाढ़ों वाले मुखों में शीघ्रता से प्रवेश कर रहे हैं। कुछ तो दाँतों के बीच चिपके हुए दिख रहे हैं और उनके सिर चूर्ण हो गए हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के संहारक रूप का यह दृश्य अर्जुन को युद्ध की अनिवार्यता का बोध कराता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 27 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 27/55 49% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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