श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 26

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 46 मिनट का पठन 135 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
अमी
ये
च
और
त्वाम्
आपमें
धृतराष्ट्रस्य
धृतराष्ट्र के
पुत्राः
पुत्र
सर्वे
सभी
सह
सहित
एव
ही
अवनिपालसङ्घैः
राजाओं के समूहों के साथ
भीष्मः
भीष्म
द्रोणः
द्रोण
सूतपुत्रः
कर्ण
तथा
इसी प्रकार
असौ
वह
सह
सहित
अस्मदीयैः
हमारे
अपि
भी
योधमुख्यैः
प्रमुख योद्धाओं के साथ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

धृतराष्ट्र के ये सभी पुत्र तथा राजाओं के समूह, भीष्म, द्रोण, कर्ण और हमारे प्रमुख योद्धा भी आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्याय ११, श्लोक २६: ब्रह्मांडीय सत्य और कालग्रस्त विनाश की शाश्वत कथा

श्रीमद्भगवद्गीता सनातन धर्म, वेदान्त और आध्यात्मिक दर्शन का वह अद्वितीय ग्रंथ है, जो मानव मात्र को जीवन के परम सत्य से परिचित कराता है। ग्यारहवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिखाया गया उनका विराट रूप (विश्वकोश रूप) संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और लय का साक्षात दर्शन है। इस महाकाव्यीय प्रसंग में जहाँ एक ओर चराचर जगत की दिव्यता और अनंतता प्रकट होती है, वहीं दूसरी ओर कालग्रस्त विनाश का ऐसा विहंगम चित्र प्रस्तुत किया जाता है, जिसे देखकर साक्षात् गांडीवधारी अर्जुन भी विस्मित और भयभीत हो जाते हैं। प्रस्तुत श्लोक—"अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः..."—उसी कुरुक्षेत्र के निर्णायक रणक्षेत्र में घटित हो रहे एक अत्यंत सूक्ष्म परंतु ब्रह्मांडीय स्तर पर सत्य सत्य का उद्घाटन करता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक केवल महाभारत के युद्ध तक सीमित नहीं है, अपितु यह इस बात का प्रतीक है कि समय (काल) किसी के लिए नहीं रुकता। धृतराष्ट्र के पुत्र, दुर्योधन के नेतृत्व में अधर्म का पक्ष लेने वाले समस्त राजा, और स्वयंष् भीष्म, द्रोण तथा कर्ण जैसे महान योद्धा, जो अपने समय के अद्वितीय शूरवीर थे, वे सब भी प्रकृति के अमोघ विधान यानी भगवान के महाकाल रूपी मुख में समाहित होते जा रहे हैं। यह दृश्य मनुष्य को अहंकार से मुक्त होने और अपने कर्मों को परमेश्वर के समर्पण भाव से करने की प्रेरणा देता है। भगवद्गीता का यह अंश साधकों को भौतिक संसार की नश्वरता का बोध कराता है और यह सिखाता है कि जो कुछ भी उत्पन्न हुआ है, उसका काल के गर्भ में विलीन होना एक अटल ब्रह्मांडीय नियम है।

वैदिक साहित्य और संस्कृत भाषा के मर्मज्ञों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का यह रूप काल-स्वरूप है। यहाँ 'काल' का अर्थ केवल समय नहीं, अपितु वह शक्ति है जो संपूर्ण चराचर जगत को अपने भीतर समाहित कर लेती है। भक्तीलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष अध्ययन में हम इसी गूढ़ श्लोक के प्रत्येक शब्द, उसके व्याकरणिक अर्थ, इसकी पौराणिक पृष्ठभूमि और आज के आधुनिक युग में इसके प्रासंगिक आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे, जिससे साधक इस श्लोक की गहराई तक उतर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

वैदिक मंत्रों और श्लोकों के सस्वर पाठ से न केवल एकाग्रता बढ़ती है, बल्कि मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है। श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय के इस छब्बीसवें श्लोक को अत्यंत श्रद्धा, स्पष्ट उच्चारण और उचित लय के साथ पढ़ना चाहिए। नीचे इस श्लोक का प्रामाणिक मूल पाठ देवनागरी लिपि में दिया गया है:

॥ श्रीमद्भगवद्गीता अथ एकादशोऽध्यायः (विराट रूप दर्शन योग) ॥

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६॥

श्लोक पाठ की सरल विधि एवं अनुष्ठान

इस श्लोक के नियमित पाठ या स्मरण के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी माना गया है:

  • स्थान की पवित्रता: प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर अपने घर के पूजा गृह या किसी शांत, पवित्र स्थान पर आसन बिछाकर बैठें।
  • मानसिक शुद्धि: अपने इष्टदेव भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें और मन में किसी भी प्रकार का द्वेष या नकारात्मकता न रखें।
  • दीपक प्रज्वलन: घी का दीपक और धूप प्रज्वलित कर भगवान के चरणों में नमन करें।
  • सस्वर उच्चारण: श्लोक का कम से कम 11 या 21 बार स्पष्ट उच्चारण के साथ पाठ करें तथा इसके अर्थ पर मनन करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक का एक-एक शब्द अपने आप में एक गहरा दार्शनिक संदेश समेटे हुए है। संस्कृत व्याकरण और वेदान्त दर्शन के आधार पर इस श्लोक का पद-विच्छेद और विस्तृत विश्लेषण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अमी ये सब सामने प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहे समस्त दृश्यमान प्राणी और योद्धा।
च और समुच्चय बोधक, जो पाण्डवों और कौरवों दोनों पक्षों की उपस्थिति को जोड़ता है।
त्वाम् आपको (आपके मुख में) सर्वव्यापी और कालस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण के विराट मुख की ओर।
धृतराष्ट्रस्य पुत्राः धृतराष्ट्र के पुत्र (दुर्योधनादि) अधर्म का मार्ग अपनाने वाले, अहंकार और मोह में अंधे हुए वे तमाम लोग जो सत्ता के लोभी थे।
सर्वे सभी बिना किसी अपवाद के संपूर्ण कौरव सेना और उनके सहयोगी।
सह एव सहित ही किसी को भी छोड़े बिना संपूर्ण राजाओं के समूह के साथ।
अवनिपालसङ्घैः पृथ्वी के पालकों (राजाओं) के समूहों के साथ देश-विदेश से युद्ध में सम्मिलित होने आए समस्त सम्राट और आधिपत्यधारी शासक।
भीष्मः पितामह भीष्म इच्छा मृत्यु का वरदान पाने वाले, नीति और ज्ञान के प्रतीक परंतु गलत पक्ष में खड़े महान योद्धा।
द्रोणः आचार्य द्रोण समस्त शस्त्र और अस्त्र विद्या के गुरु, जिनका मोह उन्हें कौरव पक्ष में खींच लाया था।
सूतपुत्रः सूतपुत्र (कर्ण) दानशीलता और शौर्य के प्रतीक, परंतु दुर्योधन के प्रति मित्रता के कारण अधर्म के संवाहक बने कर्ण।
तथा असौ तथा वे ही उसी प्रकार से अन्य प्रमुख योद्धा भी।
सह अस्मदीयैः अपि तथा हमारे पक्ष के भी पांडव सेना के प्रमुख वीर योद्धा, जो सांसारिक दृष्टि से वहाँ उपस्थित हैं।
योधमुख्यैः प्रधान योद्धाओं सहित दोनों सेनाओं के सेनापति और अतिरथी महारथी।

विस्तृत भावार्थ: इस श्लोक में अर्जुन देख रहे हैं कि धृतराष्ट्र के सभी पुत्र, उनके साथ आए हुए राजाओं के समूह, पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण और कर्ण, तथा उनके अपने पक्ष के भी तमाम मुख्य योद्धा—वे सब के सब भगवान के विकराल और दाढ़ों से युक्त भयानक मुखों में तेजी से प्रवेश कर रहे हैं और कई तो उनके दाँतों के बीच पिसकर नष्ट हो रहे हैं। यह इस बात का द्योतक है कि इतिहास के इस विशाल महायुद्ध में कोई भी अपनी मर्जी से नहीं जी रहा है, बल्कि सब काल के विराट चक्र के अधीन हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध का प्रसंग सनातन इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ है। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और मित्रों को देखकर मोहग्रस्त हो गए और उन्होंने युद्ध करने से इंकार कर दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाई। इस उपदेश के दौरान, अर्जुन की जिज्ञासा को शांत करने और अपनी परम ईश्वरता को सिद्ध करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना 'विराट रूप' या 'विश्वोपाधि रूप' दिखाया।

पौराणिक ग्रंथों जैसे महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत गीता के ये अध्याय आते हैं। इस प्रसंग में यह स्पष्ट किया गया है कि अर्जुन दिव्य दृष्टि प्राप्त करके जब भगवान के उस अलौकिक, तेजोमय और भयावह रूप को देखते हैं, तो वे पाते हैं कि सूर्य और अग्नि के समान कांति वाले उस शरीर में संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ है। आकाश से लेकर पाताल तक, और भविष्य के गर्भ में छिपी हुई हर घटना उस विराट स्वरूप में चलचित्र की भांति घटित हो रही है।

इस श्लोक में जिन योद्धाओं का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है—भीष्म, द्रोण, कर्ण और धृतराष्ट्र के पुत्र—वे सभी अपने-अपने समय के सर्वश्रेष्ठ और अपराजेय योद्धा माने जाते थे। पितामह भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, आचार्य द्रोण ब्रह्मास्त्र के ज्ञाता थे, और कर्ण के पास अमोघ शक्तियाँ थीं। परंतु भगवान के काल-रूप के सामने इन सबका व्यक्तिगत कौशल और बल बौना साबित हो जाता है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि अहंकार कितना भी बड़ा क्यों न हो, और शक्ति कितनी भी असीम क्यों न हो, अंतिम सत्य ईश्वरीय विधान और काल की गति ही है। इस शास्त्रीय पृष्ठभूमि का स्मरण करने से मानव जीवन की क्षुद्रता और परमात्मा की महानता का बोध होता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रकार के गंभीर और दार्शनिक श्लोकों का नियमित पठन, मनन या श्रवण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। भक्तीलोक (Bhaktilok.in) के पाठकों के लिए यहाँ आठ प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभों का वर्णन किया गया है:

1. अहंकार का शमन (Ego Dissolution)

जब साधक यह देखता है कि भीष्म और द्रोण जैसे महान योद्धा भी काल के गाल में समा रहे हैं, तो उसका व्यक्तिगत अहंकार स्वतः समाप्त हो जाता है और वह विनम्रता की ओर अग्रसर होता है.

2. मृत्यु के भय से मुक्ति (Fearlessness of Death)

यह श्लोक और इसका दर्शन मनुष्य को यह समझाता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है। इससे मृत्यु का स्वाभाविक भय धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है और जीवन के प्रति एक उच्च दृष्टिकोण विकसित होता है.

3. मानसिक शांति और एकाग्रता (Mental Peace & Focus)

दिव्य श्लोकों के नियमित सस्वर पाठ और उनके अर्थ पर ध्यान केंद्रित करने से चित्त की चंचलता शांत होती है, जिससे ध्यान (Meditation) में गहरी उतरने की क्षमता प्राप्त होती है.

4. कर्म के प्रति निष्ठा (Dedication to Righteous Action)

परिणाम की चिंता किए बिना अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने की प्रेरणा मिलती है, क्योंकि सब कुछ एक उच्चतर शक्ति के नियंत्रण में है.

5. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura & Vibration)

संस्कृत के इन पवित्र अक्षरों के उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें आसपास के वातावरण को शुद्ध करती हैं और नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाती हैं.

6. कर्म शुद्धि और पापों का नाश (Karmic Purification)

भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकले इन वचनों का स्मरण करने से चित्त के मैल धुलते हैं और पूर्वकृत कर्मों के बंधनों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है.

7. भक्ति भाव और समर्पण की वृद्धि (Deepened Devotion)

परमात्मा के विराट और सर्वशक्तिमान स्वरूप के दर्शन से साधक के हृदय में अनन्य भक्ति, श्रद्धा और शरणागति का भाव जागृत होता है.

8. जीवन संकटों में धैर्य (Resilience in Crisis)

जीवन की कठिन परिस्थितियों या संकटों के समय व्यक्ति विचलित नहीं होता, बल्कि यह समझता है कि यह भी समय का एक चक्र है जो बीत जाएगा.

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, पुराणों, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के पारंपरिक टीकाओं (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और संत ज्ञानेश्वर जी के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारा मुख्य उद्देश्य सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों के गूढ़ रहस्यों को सरल, सुबोध और प्रामाणिक हिंदी में आधुनिक पाठकों तक पहुँचाना है। प्रत्येक शब्द के अर्थ और उसके दार्शनिक निहितार्थों को सत्यापित करने के बाद ही इसे प्रकाशित किया गया है, ताकि हमारे पाठकों को उच्चतम स्तर की आध्यात्मिक और साहित्यिक सामग्री प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि समय (काल) सर्वशक्तिमान है। कौरव पक्ष के सभी योद्धा, भीष्म, द्रोण, कर्ण और स्वयं युद्ध में उपस्थित सभी महान शूरवीर भगवान के काल-स्वरूप मुख में समाहित हो रहे हैं। यह संसार नश्वर है और अंततः सब कुछ परमात्मा के नियंत्रण में विलीन हो जाता है।

अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के 'विराट रूप' (विश्वोपाधि रूप) को देखकर यह वर्णन किया है। इस रूप में भगवान का शरीर अनंत, तेजोमय और भयावह दाढ़ों वाला था, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड और भविष्य में होने वाली घटनाएं प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रही थीं।

भीष्म, द्रोण और कर्ण महाभारत युद्ध के सबसे शक्तिशाली, अपराजेय और मुख्य स्तंभ थे। उनके नाम का उल्लेख यह दर्शाने के लिए किया गया है कि व्यक्तिगत बल, विद्या और वरदान भी काल की गति और ईश्वरीय विधान के आगे विवश हैं। किसी भी mortal (नश्वर) प्राणी की शक्ति ईश्वर के विराट रूप के सामने टिक नहीं सकती।

हाँ, इस श्लोक और गीता के अन्य अध्यायों का नियमित पाठ तथा इसके दार्शनिक अर्थ पर मनन करने से व्यक्ति का दृष्टिकोण विस्तृत होता है। जब साधक यह समझता है कि सुख-दुःख और जीवन-मृत्यु एक बड़े चक्र का हिस्सा हैं, तो उसका अहंकार और अनावश्यक तनाव स्वतः समाप्त होने लगता है, जिससे मानसिक शांति प्राप्त होती है।

'अवनिपालसङ्घैः' का शाब्दिक अर्थ पृथ्वी के पालकों यानी राजाओं और सम्राटों के समूहों से है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों से आए सैकड़ों राजा और उनके सैन्यदल कौरवों और पांडवों की ओर से लड़ने के लिए एकत्र हुए थे, जो सभी इस महायुद्ध में काल का ग्रास बनने जा रहे थे।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

धृतराष्ट्र के ये सभी पुत्र तथा राजाओं के समूह, भीष्म, द्रोण, कर्ण और हमारे प्रमुख योद्धा भी आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् ही सबका संहार करते हैं, मनुष्य तो निमित्त मात्र हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 26 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 26/55 47% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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