विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 25

श्लोक २५ में अर्जुन विकराल रूप से भयभीत होकर शांति की याचना करते हैं। Verse 25: Arjuna, terrified, pleads for peace.

संस्कृत श्लोक

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५॥

daṃṣṭrā-karālāni ca te mukhāni dṛṣṭvaiva kālānala-sannibhāni | diśo na jāne na labhe ca śarma prasīda deveśa jagannivāsa ||25||

पदच्छेद / शब्दार्थ

दंष्ट्राकरालानि: दाढ़ों से विकराल; च: और; ते: आपके; मुखानि: मुखों को; दृष्ट्वा: देखकर; एव: ही; कालानलसन्निभानि: प्रलयकाल की अग्नि के समान; दिशः: दिशाएँ; न: नहीं; जाने: जानता; न: नहीं; लभे: पाता; च: और; शर्म: शांति; प्रसीद: प्रसन्न हों; देवेश: हे देवेश; जगन्निवास: हे जगन्निवास।

हिंदी अनुवाद

आपके उन मुखों को, जो दाढ़ों से विकराल हैं और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रतीत होते हैं, देखकर मुझे दिशाओं का भी ज्ञान नहीं रहा और मुझे शांति नहीं मिलती। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।

English Translation

Seeing Your mouths terrible with tusks, like the fires of cosmic dissolution, I lose all sense of direction and find no peace. O Lord of gods, O abode of the universe, be gracious!

टीका / Commentary

अर्जुन भगवान् से शांति की याचना करते हैं।