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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 25

अध्याय 11 · श्लोक 25

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५॥

daṃṣṭrā-karālāni ca te mukhāni dṛṣṭvaiva kālānala-sannibhāni | diśo na jāne na labhe ca śarma prasīda deveśa jagannivāsa ||25||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

दंष्ट्राकरालानि: दाढ़ों से विकराल; च: और; ते: आपके; मुखानि: मुखों को; दृष्ट्वा: देखकर; एव: ही; कालानलसन्निभानि: प्रलयकाल की अग्नि के समान; दिशः: दिशाएँ; न: नहीं; जाने: जानता; न: नहीं; लभे: पाता; च: और; शर्म: शांति; प्रसीद: प्रसन्न हों; देवेश: हे देवेश; जगन्निवास: हे जगन्निवास।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

आपके उन मुखों को, जो दाढ़ों से विकराल हैं और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रतीत होते हैं, देखकर मुझे दिशाओं का भी ज्ञान नहीं रहा और मुझे शांति नहीं मिलती। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।

English Translation

Seeing Your mouths terrible with tusks, like the fires of cosmic dissolution, I lose all sense of direction and find no peace. O Lord of gods, O abode of the universe, be gracious!

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन भगवान् से शांति की याचना करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।