श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 25

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 40 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
दंष्ट्राकरालानि
दाढ़ों से विकराल
च
और
ते
आपके
मुखानि
मुखों को
दृष्ट्वा
देखकर
एव
ही
कालानलसन्निभानि
प्रलयकाल की अग्नि के समान
दिशः
दिशाएँ
न
नहीं
जाने
जानता
न
नहीं
लभे
पाता
च
और
शर्म
शांति
प्रसीद
प्रसन्न हों
देवेश
हे देवेश
जगन्निवास
हे जगन्निवास।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

आपके उन मुखों को, जो दाढ़ों से विकराल हैं और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रतीत होते हैं, देखकर मुझे दिशाओं का भी ज्ञान नहीं रहा और मुझे शांति नहीं मिलती। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भूमिका एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भागवतगीता के ग्यारहवें अध्याय, जिसे 'विश्वरूपदर्शनयोग' के नाम से जाना जाता है, सनातन धर्म, वेदान्त दर्शन और योगशास्त्र का अत्यंत रहस्यमय एवं शक्तिशाली भाग है। इस अध्याय में अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के बीच का वह अद्भुत संवाद प्रस्तुत किया गया है, जहाँ अर्जुन की प्रार्थना पर भगवान ने अपने अनंत, ऐश्वर्यशाली, और सर्वव्यापी विश्वरूप को प्रकट किया। इस विराट रूप के दर्शन मात्र से अर्जुन की चेतना में एक अभूतपूर्व कंपन उत्पन्न होता है, जो भौतिक जगत की सीमाओं से परे अलौकिक सत्यों का साक्षात्कार कराता है। प्रस्तुत श्लोक संख्या 25—"दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि..."—उसी महाभयानक और तेजोमय रूप को देखकर अर्जुन के मन में उत्पन्न हुई आकुलता, विस्मय, भय और उसके उपरांत पूर्ण शरणागति (आत्मसमर्पण) की पराकाष्ठा का अत्यंत सजीव चित्रण करता है।

वैदिक संस्कृति और भारतीय अध्यात्म में भगवान के इस रौद्र और प्रलयंकारी रूप को केवल भय का प्रतीक नहीं माना गया है, अपितु यह सृष्टि के चक्र—उत्पत्ति, स्थिति और संहार—का अकाट्य और परम सत्य स्वरूप है। जब मनुष्य अपनी सीमित अहंता (इगो) और भौतिक सुखों के अहंकार में डूब जाता है, तब भगवान का यह कालानल रूप उसे उसकी वास्तविक नश्वरता का बोध कराता है। अर्जुन इस श्लोक के माध्यम से अपनी मानवीय सीमाओं को स्वीकार करते हुए भगवान के चरणों में आर्त भाव से शरण मांगते हैं। यह श्लोक साधकों को यह सिखाता है कि जीवन की किसी भी भीषण परिस्थिति, आपदा या आंतरिक संकट में जब दिशाएँ भ्रमित होने लगें और शांति छिन जाए, तब केवल और केवल परमपिता परमात्मा की शरण में जाने से ही त्राण और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। यह सामग्री पाठकों को इस श्लोक के गूढ़ रहस्यों, दार्शनिक तर्कों और व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग से अवगत कराने के लिए अत्यंत प्रामाणिक रूप से तैयार की गई है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अर्जुन उवाच
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५॥

श्लोकोच्चारण एवं पाठ की शास्त्रीय विधि:
  • शुचिता: इस श्लोक का पाठ करते समय शारीरिक एवं मानसिक पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। प्रातः स्नान के पश्चात शांत चित्त से आसन पर बैठें।
  • उच्चारण शुद्धता: संस्कृत के अनुस्वारों (ं) और विसर्गों (ः) का उचित उच्चारण करते हुए इसे सस्वर पढ़ना चाहिए ताकि इसकी ऊर्जा कंपन आपके सूक्ष्म शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डाले।
  • भावना: पाठ के दौरान अपने भीतर अर्जुन की तरह परमेश्वर के प्रति अनन्य श्रद्धा, विनीत भाव और समर्पण का भाव जागृत करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

श्लोक के प्रत्येक शब्द की गहराई में जाकर उसके वास्तविक आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ को समझना आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में इसका विस्तृत विश्लेषण किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
दंष्ट्राकरालानि दाढ़ों के कारण भयानक भगवान के मुख में प्रलयंकारी दाढ़ें काल (मृत्यु) और संहार की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो कर्मफल के कठोर नियमों को दर्शाती हैं।
च ते मुखानि और आपके मुखों को विश्वरूप में अनगिनत मुखों का होना यह सिद्ध करता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना और उसके अनुभव का स्रोत एक ही परम शक्ति है।
दृष्ट्वैव देखकर ही सत्य का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होते ही मनुष्य की सारी भ्रांतियाँ और अज्ञान क्षण भर में समाप्त हो जाते हैं।
कालानलसन्निभानि प्रलयकालीन अग्नि के समान यह अग्नि समस्त विकारों, पापों और अज्ञान का दहन करने वाली दिव्य चेतना की अग्नि है, जो साधक के अंतःकरण को शुद्ध करती है।
दिशो न जाने दिशाओं को नहीं जानता हूँ (दिशाएं भूल गया हूँ) जब साधक का अहंकार विलीन होता है, तो भौतिक संसार की दिशाएँ और समय का बोध समाप्त होकर शून्य में विलीन हो जाता है।
न लभे च शर्म और सुख या शांति नहीं पा रहा हूँ भगवान से विच्छिन्न होकर या उनके विराट रूप के रौद्र पक्ष से भयभीत होकर जीव तब तक अशांत रहता है जब तक वह शरणागत नहीं होता।
प्रसीद प्रसन्न होइए / कृपा कीजिए यह जीवात्मा की परमात्मा के समक्ष सबसे बड़ी पुकार है; वह अपनी गलतियों और अज्ञान के लिए क्षमा माँगते हुए कृपा की भीख मांगता है।
देवेश हे देवों के देव! समस्त ब्रह्मांडीय शक्तियों, देवताओं और ऊर्जाओं के नियंत्रक सर्वोच्च अधिपति को संबोधित संबोधन।
जगन्निवास हे संपूर्ण जगत के आश्रय! यह इस बात का द्योतक है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड जिसमें स्थित है और जो सबका आधार है, वही भगवान सबके आश्रयदाता हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भागवतगीता का ग्यारहवां अध्याय महाभारत के युद्धारम्भ से ठीक पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में घटित हुआ था। जब अर्जुन विषादग्रस्त थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, कर्म, धर्म और आत्मा के शाश्वत सत्यों का ज्ञान दिया। ज्ञान की पराकाष्ठा के रूप में, अर्जुन के अनुरोध पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने 'ऐश्वर्य योग' यानी विश्वरूप के दर्शन कराए। यह रूप साधारण नेत्रों से देखना असंभव था, इसलिए भगवान ने अर्जुन को 'दिव्य दृष्टि' प्रदान की।

इस विराट रूप में अर्जुन ने देखा कि संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही शरीर में समाहित है—देवता, ऋषि, भूत-प्रेत, और कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े दोनों पक्षों के योद्धा (भीष्म, द्रोण, कर्ण आदि) काल के मुख में समाते जा रहे हैं। भगवान का वह रूप अत्यंत तेजोमय, भयानक दाढ़ों वाला और प्रलयकालीन अग्नि के समान प्रज्वलित था। इस दृश्य को देखकर अर्जुन का वीर हृदय भी कांप उठा। जो अर्जुन अपने गांडीव धनुष और बाहुबल पर गर्व करता था, उसे अचानक यह बोध हुआ कि मनुष्य चाहे कितना भी पराक्रमी क्यों न हो, वह उस महाकाल (परमात्मा) के नियंत्रण से बाहर नहीं है।

यह प्रसंग हमें महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत के भीष्म पर्व से प्राप्त होता है। यह घटना दर्शाती है कि मनुष्य का अहंकार और उसकी भौतिक उपलब्धियाँ ब्रह्मांडीय व्यवस्था के सामने अत्यंत शूद्र हैं। इस ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंग के माध्यम से व्यास जी ने यह संदेश दिया है कि वास्तविक ज्ञान वही है जो मनुष्य को उसकी औकात और उसकी अनंत संभावना—दोनों का एक साथ बोध कराकर उसे परमेश्वर की शरण में ला खड़ा करे। अर्जुन की यह विह्वल अवस्था और उनका विलाप इस बात का प्रमाण है कि भगवान का साक्षात्कार केवल आनंद का विषय नहीं है, बल्कि यह जीव के संपूर्ण अहंकार के विध्वंस का भी मार्ग है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भागवतगीता के इन गूढ़ श्लोकों का नियमित पठन, मनन और स्मरण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

जीवन की उथल-पुथल और मानसिक तनाव के बीच जब व्यक्ति भगवान के इस सर्वशक्तिमान स्वरूप का स्मरण करता है, तो उसके भीतर की छोटी-मोटी चिंताएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं और मन शांत होने लगता है।

2. अहंकार का शमन (Ego Dissolution)

यह श्लोक मनुष्य को उसके वास्तविक स्थान का बोध कराता है। इसे नियमित पढ़ने से व्यक्ति के भीतर का घमंड और अहंकार गलने लगता है, जिससे वह विनम्र बनता है।

3. सकारात्मक और शक्तिशाली ऊर्जा (Aura)

वैदिक मंत्रों और श्लोकों के सटीक उच्चारण से उत्पन्न होने वाले ध्वनि कंपन (Sound Vibrations) शरीर के सूक्ष्म चक्रों को जाग्रत करते हैं, जिससे एक मजबूत सकारात्मक और सुरक्षात्मक आवरण बनता है।

4. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

भगवान के परम स्वरूप के प्रति समर्पण भाव रखने से पिछले कर्मों के बंधनों और मानसिक ग्रंथियों (Granthiyas) को सुलझाने में आध्यात्मिक शक्ति मिलती है।

5. भय और आशंकाओं से मुक्ति

भविष्य को लेकर अज्ञात भय या मृत्यु का डर मनुष्य को अंदर से कमजोर करता है। इस श्लोक का बोध यह सिखाता है कि काल भी उसी परमात्मा के अधीन है, जिससे निर्भीकता उत्पन्न होती है।

6. शरणागति और भक्ति की वृद्धि

साधक के हृदय में भगवान के प्रति अगाध प्रेम, विश्वास और 'प्रसीद' (कृपा की कामना) का भाव प्रगाढ़ होता है, जो भक्तियोग की सबसे ऊंची सीढ़ी है।

7. संकट काल में दिशा-बोध

जब जीवन में चारों तरफ से कठिनाइयाँ घेर लें और कोई रास्ता न दिखाई दे (दिशो न जाने), तब यह श्लोक भीतर से आंतरिक मार्गदर्शन और ईश्वरीय सहायता का अहसास कराता है।

8. आध्यात्मिक एकाग्रता (Focus)

संस्कृत के इन भव्य श्लोकों को याद करने और उनके अर्थ पर विचार करने से मानसिक एकाग्रता और स्मरण शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह सामग्री सनातन संस्कृति, वेद, पुराण और विशेष रूप से श्रीमद्भागवतगीता के प्रामाणिक ग्रंथों के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारी संपादकीय टीम ने यह सुनिश्चित किया है कि श्लोक का अनुवाद, शब्दार्थ और इसका दार्शनिक मर्म वेदान्त के पारंपरिक आचार्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज आदि) के दृष्टिकोण के अनुकूल हो। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों को बिना किसी भ्रम के, शुद्ध और उच्च कोटि का आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। हम प्राचीन ग्रंथों की पवित्रता और आधुनिक पाठकों की समझ के बीच एक सेतु का कार्य करते हैं ताकि सनातन धर्म का सार घर-घर तक पहुँच सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भागवतगीता के अध्याय 11 (विश्वरूपदर्शनयोग) से है, जहाँ अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिखाए गए उनके प्रलयंकारी और अनंत विश्वरूप को देखकर भयभीत और विस्मयकारी अवस्था में हैं और वे ईश्वर से शांति की याचना कर रहे हैं।

हाँ, अर्जुन भगवान के इस प्रचण्ड, कालानल (प्रलय की अग्नि) के समान तेजोमय और दाढ़ों से विकराल मुखों को देखकर अत्यधिक विह्वल हो गए थे। उन्हें दिशाओं का ज्ञान नहीं रहा और उनके मन की शांति छिन गई, जिसके बाद उन्होंने भगवान से अपने शांत रूप में आने की प्रार्थना की।

'देवेश' का अर्थ है समस्त देवताओं के स्वामी या ईश्वर, और 'जगन्निवास' का अर्थ है वह परम सत्ता जिसमें संपूर्ण जगत निवास करता है या जो इस समस्त ब्रह्मांड का मूल आश्रय स्थल है।

इस श्लोक का नियमित पठन और इसके अर्थ पर मनन करने से अहंकार का नाश होता है, मानसिक शांति मिलती है, और जीवन के बड़े से बड़े संकट या अनिश्चितता के समय भी ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास और शरणागति की भावना मजबूत होती है।

इसके लिए किसी कठिन अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है, परंतु शारीरिक और मानसिक स्वच्छता, शुद्ध उच्चारण तथा भक्तिपूर्ण और विनीत भाव का होना अत्यंत आवश्यक है। इसे आप अपनी दैनिक गीता पाठ या पूजा के दौरान सम्मिलित कर सकते हैं।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आपके उन मुखों को, जो दाढ़ों से विकराल हैं और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रतीत होते हैं, देखकर मुझे दिशाओं का भी ज्ञान नहीं रहा और मुझे शांति नहीं मिलती। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के रौद्र रूप से मुक्ति का एकमात्र उपाय उनकी कृपा है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 25 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 25/55 45% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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