श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 24

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 36 मिनट का पठन 136 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
नभःस्पृशम्
आकाश को स्पर्श करने वाला
दीप्तम्
दीप्त
अनेकवर्णम्
अनेक रंगों वाला
व्यात्ताननम्
फैले हुए मुख वाला
दीप्तविशालनेत्रम्
दीप्त और विशाल नेत्रों वाला
दृष्ट्वा
देखकर
हि
ही
त्वाम्
आपको
प्रव्यथितान्तरात्मा
व्याकुल अंतरात्मा वाला
धृतिम्
धैर्य
न
नहीं
विन्दामि
पाता हूँ
शमम्
शांति
च
और
विष्णो
हे विष्णो।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे विष्णो, आपको आकाश को स्पर्श करते हुए, दीप्त, अनेक रंगों वाले, फैले हुए मुख वाले तथा दीप्त और विशाल नेत्रों वाले देखकर मेरी अंतरात्मा व्याकुल हो रही है और मुझे न धैर्य मिलता है, न शांति।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भूमिका एवं आध्यात्मिक महत्व

सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का ग्यारहवां अध्याय 'विश्वरूपदर्शनयोग' के नाम से जाना जाता है। यह अध्याय केवल संवाद का भाग नहीं है, अपितु यह उस विराट चेतना का साक्षात् प्रकटीकरण है, जिसमें संपूर्ण चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाहित हैं। जब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी योगैश्वर्य शक्ति का परिचय देते हुए अपने अनंत रूपों, अस्त्र-शस्त्रों, दिव्य माल्याव्यों और तेजोमय विग्रह का दर्शन कराते हैं, तब अर्जुन की सीमित मानवीय चेतना उस अपरिमित ब्रह्मतेज को सहन करने में असमर्थ होने लगती है। प्रस्तुत श्लोक — “नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्...” — उसी अतीन्द्रिय और विस्मयकारी क्षण की पराकाष्ठा है, जहाँ अर्जुन के भीतर भक्त की विनीत भावना के साथ-साथ एक महान योद्धा की मानवीय दुर्बलता और विह्वलतता का অপূর্ব समन्वय दिखाई देता है।

वैदिक और पौराणिक दृष्टिकोण से यह श्लोक यह रेखांकित करता है कि जब जीव अपने सीमित अहंकार और भौतिक चक्षुओं से परे जाकर उस परब्रह्म के विराट स्वरूप का अनुभव करता है, तो उसके भीतर एक तीव्र कंपन और संपूर्ण अस्तित्व का विसर्जन जैसा अनुभव होता है। भगवान श्रीकृष्ण का वह रूप जो आकाश को छू रहा है, जिसकी दीप्ति से दसों दिशाएं प्रदीप्त हो रही हैं, और जिसके मुख भयानक रूप से खुले हुए हैं, वह प्रलयंकारी काल का ही दूसरा नाम है। इस लेख में हम इसी गूढ़ श्लोक के शाब्दिक अर्थ, व्याकरणिक संरचना, दार्शनिक पृष्ठभूमि, और साधकों के लिए इसके व्यावहारिक व मानसिक लाभों का विस्तार से विश्लेषण करेंगे, जो पाठकों को गीता के मर्म को गहराई से समझने में सहायता प्रदान करेगा।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ११, श्लोक २४

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥

पाठ विधि एवं ध्यान: इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को शांत चित्त होकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के विश्वरूप का मानसिक ध्यान करना चाहिए। यद्यपि यह श्लोक अर्जुन के भय और विह्वलतता को व्यक्त करता है, तथापि इसका नियमित स्मरण साधक के मन में संसार की नश्वरता और भगवान की सर्वव्यापकता के प्रति अगाध श्रद्धा उत्पन्न करता है। पाठ के उपरांत भगवान से प्रार्थना की जाती है कि हे प्रभु! हमारे अंतःकरण को भी अपनी शरण में लें और हमें शांति तथा स्थिरता प्रदान करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द का संस्कृत व्याकरण और दार्शनिक मर्म के आधार पर सूक्ष्म विश्लेषण निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
नभःस्पृशम् आकाश को स्पर्श करने वाले को यह भगवान के सर्वव्यापी, अनंत और असीम विस्तार का प्रतीक है जो भौतिक सीमाओं से परे है।
दीप्तम् तेजोमय, कांतिवान या प्रदीप्त ब्रह्म की उस अग्नि के समान ज्योति, जो अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर देती है और सतोगुण का प्रतीक है।
अनेकवर्णम् अनेक रंगों वाले (विविध वर्णों से युक्त) संपूर्ण सृष्टि की विविधता, प्रकृति के तीन गुण (सत्, रज, तम) और समस्त ब्रह्मांडीय रूपों की समष्टि।
व्यात्ताननम् खुले हुए मुख वाले प्रलयकाल की उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ समय सबको ग्रास बनाने के लिए अपना मुख फैलाए हुए है।
दीप्तविशालनेत्रम् दीप्तिमान और बड़े-बड़े नेत्रों वाले परमात्मा की सर्वज्ञता और दृष्टि जो चराचर जगत के हर सूक्ष्म कर्म को देख रही है।
दृष्ट्वा हि त्वां निश्चय ही आपको देखकर दिव्य चक्षुओं के माध्यम से जब जीव यथार्थ सत्य का साक्षात्कार करता है, तो उसकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक होती है।
प्रव्यथितान्तरात्मा भयभीत या विचलित अंतःकरण वाला अहंकार और भौतिकता से जुड़ी चेतना का उस विराट सत्य के सामने कांप उठना और विह्वल होना।
धृतिं न विन्दामि धैर्य या स्थिरता को नहीं पाता हूँ मन की वह अवस्था जहाँ सांसारिक सुरक्षा के सारे उपाय समाप्त हो जाते हैं और मानसिक संतुलन डगमगा जाता है।
शमं च और शांति को भी (नहीं पाता) चित्त की शांति का अभाव, जो केवल ईश्वर की शरण में जाने पर ही पुनः प्राप्त हो सकती है।
विष्णो हे सर्वव्यापी विष्णु! (संबोधन) अर्जुन का भगवान को 'विष्णु' कहकर संबोधित करना यह दर्शाता है कि वे सब में व्याप्त उसी पालनहार से अपनी रक्षा की गुहार लगा रहे हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन कर्तव्यविमूढ़ हो गए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वह श्रीमद्भगवद्गीता कहलाई। ग्यारहवें अध्याय के आरंभ में अर्जुन ने भगवान से निवेदन किया कि यदि आप मानते हैं कि मैं इस योग्य हूँ, तो आप अपने उस ऐश्वर्ययुक्त दिव्य रूप को मुझे दिखाइए। अर्जुन के इस सप्रेम और आदरयुक्त अनुरोध पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें दिव्य चक्षु प्रदान किए।

जैसे ही दिव्य दृष्टि खुली, अर्जुन के सामने वह अद्भुत दृश्य प्रकट हुआ जो आज तक किसी मनुष्य ने नहीं देखा था। सहस्रों मुख, अनगिनत नेत्र, अद्भुत आभूषण, हाथ में उठाए हुए दिव्य अस्त्र और शरीर से निकलती हुई सूर्य के समान हजारों सूर्यों की एक साथ दीप्ति। इस विश्वरूप में अर्जुन ने न केवल कौरव सेना के महारथियों को उस मुख में समाते हुए देखा, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के ग्रहों, नक्षत्रों और लोकों को भी नाचते और विलीन होते देखा।

इस प्रसंग के रचयिता महर्षि वेद व्यास हैं, जिन्होंने महाभारत महाकाव्य और उसके अंतर्गत गीता के इन श्लोकों को लिपिबद्ध किया है। ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टि से यह प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि मानव मस्तिष्क और उसकी चेतना एक सीमा तक ही भौतिक या अलौकिक विमर्श को सहन कर सकती है। जब असीम का साक्षात्कार ससीम से होता है, तो भय का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। अर्जुन का यह भय कोई साधारण कायरता नहीं थी, अपितु यह उस विराट सत्य के प्रति विस्मय, आश्चर्य और आदर का मिला-जुला रूप था, जिसने उनके भीतर के सारे अभिमान को चूर-चूर कर दिया।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

1. मानसिक शांति और आत्म-नियंत्रण

इस श्लोक और ग्यारहवें अध्याय के भावों का चिंतन करने से मन की उद्विग्नता शांत होती है। यह साधक को सिखाता है कि जीवन के संकटों के समय घबराने के बजाय उस सर्वव्यापी शक्ति का स्मरण करना चाहिए।

2. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

श्लोक के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले ध्वनि कंपन (Sound Vibrations) शरीर के सूक्ष्म चक्रों को जाग्रत करते हैं, जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और एक सकारात्मक आवरण बनता है।

3. कर्मिक शुद्धि और अहंकार का शमन

जब व्यक्ति भगवान के विराट रूप का स्मरण करता है, तो उसका व्यक्तिगत अहंकार स्वतः गल जाता है। 'मैं ही सब कुछ करने वाला हूँ' यह भाव समाप्त होकर समर्पण की भावना प्रबल होती है, जिससे कर्मों के बंधन कटते हैं।

4. दिव्य कृपा और भय से मुक्ति

भले ही अर्जुन इस श्लोक में भयभीत दिखाई देते हैं, किंतु गीता के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि जो भक्त इस स्वरूप को समझ लेता है, उसे संसार के किसी भी भौतिक भय से मुक्ति मिल जाती है।

5. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि

संस्कृत श्लोकों के नियमित सस्वर पाठ से मस्तिष्क की नसें सक्रिय होती हैं, बौद्धिक क्षमता बढ़ती है और ध्यान लगाने की (Meditation) शक्ति में अभूतपूर्व सुधार होता है।

6. जीवन के प्रति दार्शनिक दृष्टिकोण

यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि यह संसार क्षणभंगुर है और सब कुछ उस महाकाल के नियंत्रण में है। इससे मनुष्य मोह-माया और अनैतिक इच्छाओं से दूर होकर धर्म के मार्ग पर चलता है।

7. भय और संकट निवारण

अज्ञात भय, मानसिक तनाव या बुरे सपनों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए भगवद्गीता के इन अध्यायों का पाठ एक अचूक मानसिक औषधि का कार्य करता है।

8. मोक्ष और उच्च लोकों की प्राप्ति

शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति गीता के इस मर्मज्ञ ज्ञान को अपने जीवन में उतारता है और अंतःकरण से भगवान की शरण में जाता है, वह भवसागर से तर जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक संस्करणों (जैसे गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित मूल श्लोक और शंकराचार्य, रामानुजाचार्य तथा ज्ञानेश्वर महाराज के भाष्यों) के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, वेदों, पुराणों और उपनिषदों के संदेश को आधुनिक पाठकों के लिए सरल, सुबोध और सांस्कृतिक गरिमा के साथ प्रस्तुत किया जाए। इस सामग्री का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, अपितु वेदान्त के शाश्वत सत्यों से समाज को अवगत कराना है। सभी तथ्य शास्त्रीय परंपराओं के अनुरूप पूरी सावधानी के साथ सत्यापित किए गए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: अर्जुन ने जब भगवान श्रीकृष्ण के उस अनंत, आकाश को छूने वाले, तेजोमय और प्रलयंकारी विश्वरूप का दर्शन किया, तो उनकी सीमित मानवीय चेतना उस अपरिमित ऊर्जा को सहन नहीं कर पाई। भगवान के खुले हुए मुख और विशाल नेत्रों में उन्हें संपूर्ण सृष्टि का संहार होते दिखाई दिया, जिससे उनका अंतःकरण विचलित हो गया और उन्होंने अपनी धृति (धैर्य) खो दी।

उत्तर: 'विष्णु' शब्द का अर्थ है 'जो सब जगह व्याप्त है' (व्याप्नोति इति विष्णुः)। अर्जुन भगवान को इस रूप में संबोधित करके यह स्मरण कराते हैं कि आप ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनहार और सर्वव्यापी ईश्वर हैं। जब सब कुछ आपके ही भीतर समाहित है, तो आप ही मेरे इस भय को शांत कर सकते हैं।

उत्तर: हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का सस्वर पाठ और उनका मनन करने से मानसिक एकाग्रता बढ़ती है। यद्यपि यह श्लोक भय को व्यक्त करता है, परंतु इसका समग्र अध्ययन साधक को यह बोध कराता है कि संसार की हर परिस्थिति ईश्वर के नियंत्रण में है, जिससे अनावश्यक चिंता और तनाव स्वतः समाप्त होने लगते हैं।

उत्तर: विश्वरूप दर्शन योग श्रीमद्भगवद्गीता का ग्यारहवां (11वां) अध्याय है। इस अध्याय में कुल 55 श्लोक हैं, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के अनुरोध पर अपने दिव्य और विराट स्वरूप का विस्तार से दर्शन कराया है।

उत्तर: भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट किया है कि यह विराट रूप सामान्य भौतिक नेत्रों से देखना असंभव है। इसके लिए उन्होंने अर्जुन को 'दिव्य चक्षु' (अलौकिक दृष्टि) प्रदान की थी। आज के समय में साधक अपनी भक्ति, ध्यान, और आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से उस सर्वव्यापी परमात्मा की ऊर्जा का अनुभव अपने अंतःकरण में कर सकता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे विष्णो, आपको आकाश को स्पर्श करते हुए, दीप्त, अनेक रंगों वाले, फैले हुए मुख वाले तथा दीप्त और विशाल नेत्रों वाले देखकर मेरी अंतरात्मा व्याकुल हो रही है और मुझे न धैर्य मिलता है, न शांति।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् का विकराल रूप मनुष्य के सामान्य धैर्य को भी हिला सकता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 24 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 24/55 44% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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