विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 24
श्लोक २४ में अर्जुन कहते हैं कि आपके रूप को देखकर मेरा धैर्य नष्ट हो गया। Verse 24: Arjuna loses his composure seeing the Lord's form.
संस्कृत श्लोक
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४॥
nabhaḥ-spṛśaṃ dīptam aneka-varṇaṃ vyāttānanaṃ dīpta-viśāla-netram | dṛṣṭvā hi tvāṃ pravyathitāntar-ātmā dhṛtiṃ na vindāmi śamaṃ ca viṣṇo ||24||
पदच्छेद / शब्दार्थ
नभःस्पृशम्: आकाश को स्पर्श करने वाला; दीप्तम्: दीप्त; अनेकवर्णम्: अनेक रंगों वाला; व्यात्ताननम्: फैले हुए मुख वाला; दीप्तविशालनेत्रम्: दीप्त और विशाल नेत्रों वाला; दृष्ट्वा: देखकर; हि: ही; त्वाम्: आपको; प्रव्यथितान्तरात्मा: व्याकुल अंतरात्मा वाला; धृतिम्: धैर्य; न: नहीं; विन्दामि: पाता हूँ; शमम्: शांति; च: और; विष्णो: हे विष्णो।
हिंदी अनुवाद
हे विष्णो, आपको आकाश को स्पर्श करते हुए, दीप्त, अनेक रंगों वाले, फैले हुए मुख वाले तथा दीप्त और विशाल नेत्रों वाले देखकर मेरी अंतरात्मा व्याकुल हो रही है और मुझे न धैर्य मिलता है, न शांति।
English Translation
O Vishnu, seeing You touching the sky, shining in many colors, with mouths wide open, and large glowing eyes, my inner self is perturbed, and I find no courage or peace.
टीका / Commentary
अर्जुन का भय और बढ़ जाता है।