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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 21

अध्याय 11 · श्लोक 21

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१॥

amī hi tvāṃ sura-saṅghā viśanti kecid bhītāḥ prāñjalayo gṛṇanti | svastīty uktvā maharṣi-siddha-saṅghāḥ stuvanti tvāṃ stutibhiḥ puṣkalābhiḥ ||21||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अमी: ये; हि: ही; त्वाम्: आपमें; सुरसङ्घाः: देवताओं के समूह; विशन्ति: प्रवेश कर रहे हैं; केचित्: कुछ; भीताः: भयभीत; प्राञ्जलयः: हाथ जोड़े हुए; गृणन्ति: स्तुति कर रहे हैं; स्वस्ति: कल्याण हो; इति: इस प्रकार; उक्त्वा: कहकर; महर्षिसिद्धसङ्घाः: महर्षियों और सिद्धों के समूह; स्तुवन्ति: स्तुति करते हैं; त्वाम्: आपकी; स्तुतिभिः: स्तुतियों से; पुष्कलाभिः: अनेक प्रकार की।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

ये देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं; कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपकी स्तुति कर रहे हैं; तथा महर्षियों और सिद्धों के समूह "कल्याण हो" कहकर अनेक प्रकार की स्तुतियों से आपकी स्तुति करते हैं।

English Translation

Indeed, these hosts of gods enter into You; some, frightened, praise You with folded hands; and the hosts of great sages and perfected ones, saying "May all be well," sing Your praises with elaborate hymns.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

देवता और ऋषि भी विराट रूप से प्रभावित होकर उसकी स्तुति कर रहे हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।