श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 20

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 41 मिनट का पठन 158 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

19 पद
द्यावापृथिव्योः
स्वर्ग और पृथ्वी के
इदम्
यह
अन्तरम्
अंतरिक्ष
हि
ही
व्याप्तम्
व्याप्त
त्वया
आपके द्वारा
एकेन
अकेले
दिशः
दिशाएँ
च
और
सर्वाः
सभी
दृष्ट्वा
देखकर
अद्भुतम्
अद्भुत
रूपम्
रूप
उग्रम्
उग्र
तव
आपका
इदम्
यह
लोकत्रयम्
तीनों लोक
प्रव्यथितम्
व्याकुल हो गए
महात्मन्
हे महात्मन्।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे महात्मन्, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का यह सम्पूर्ण अंतरिक्ष तथा सभी दिशाएँ आपके द्वारा ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत एवं उग्र रूप को देखकर तीनों लोक व्याकुल हो रहे हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

विश्वरूप की महानता और ब्रह्मांडीय कंपन की पृष्ठभूमि

सनातन धर्म के सर्वाेत्तम दार्शनिक ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के एकादश अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए 'विश्वरूप दर्शन' का प्रसंग भारतीय आध्यात्मिकता का सबसे रोमांचक, रहस्यमयी और परात्पर अनुभव माना जाता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपनी दिव्य दृष्टि प्रदान की, तो अर्जुन के सम्मुख संपूर्ण चराचर जगत, देवता, ऋषि, महर्षि, गंधर्व और ब्रह्मांड की अनंत शक्तियों का एक साथ प्रकटीकरण हुआ। प्रस्तुत श्लोक—"द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः। दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २०॥"—उसी विराट् और अकल्पनीय दृश्य का जीवंत शब्द-चित्र है, जो मनुष्य की सीमित बुद्धि और नेत्रों से परे परमात्मा के उस स्वरूप का बोध कराता है जो समस्त कालों, दिशाओं और लोक-लोकांतरो में व्याप्त है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक केवल एक युद्धभूमि का दृश्य नहीं है, अपितु यह उस शाश्वत सत्य का उद्घोष है जहाँ संपूर्ण सृष्टि एक ही महा-ऊर्जा या परमात्मा के भीतर उद्भूत होती है और अंततः उसी में विलीन हो जाती है। जब अर्जुन ने देखा कि आकाश और पृथ्वी के बीच का संपूर्ण अंतरिक्ष तथा दसों दिशाएं भगवान के इस एक ही अद्भुत और उग्र रूप से परिपूर्ण हैं, तो उनके अंतःकरण में आश्चर्य, भय और भक्ति का एक अभूतपूर्व ज्वार उमड़ पड़ा। यह श्लोक हमें सिखाता है कि भौतिक जगत की नश्वरता के पीछे एक ऐसा शाश्वत और विराट् नियम कार्य कर रहा है, जिसके समक्ष तीनों लोक (स्वर्ग, मर्च और पाताल) कांप रहे हैं। यह जीव को उसके अहंकार से मुक्त कर संपूर्ण शरणागति की ओर अग्रसर करने वाला सर्वोच्च आध्यात्मिक संदेश है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ एकादशोऽध्यायः (विश्वरूपदर्शनयोग) - श्लोक २०

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।

दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २०॥


"हे महात्मन्! स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का यह संपूर्ण आकाश और सब दिशाएं आपके द्वारा एक ही रूप से व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक अत्यंत व्यथित (भयभीत और कांप) हो रहे हैं।"

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
द्यावापृथिव्योः स्वर्ग और पृथ्वी के यह द्वैत भाव का प्रतीक है; जहाँ ऊंचे (स्वर्ग) और नीचे (पृथ्वी) का भेद समाप्त होकर दोनों परमात्मा में एकरूप हो जाते हैं।
इदमन्तरम् बीच का यह (अंतरिक्ष या आकाश) संपूर्ण मध्यवर्ती स्थान, जो रिक्त नहीं है अपितु दिव्य चेतना से पूरी तरह परिपूर्ण है।
हि निश्चय ही / क्योंकि इस बात की सत्यता और अकाट्य प्रमाणिकता को दर्शाता है कि यह कोई कल्पना नहीं, अपितु प्रत्यक्ष सत्य है।
व्याप्तम् व्याप्त है / भरा हुआ है परमात्मा की सर्वव्यापकता (विभुत्व) का द्योतक, जहाँ कण-कण में भगवान की उपस्थिति है।
त्वया एकेन आपके द्वारा अकेले ही अद्वैत सिद्धांत की पुष्टि; अनेक रूपों में दिखने वाली सृष्टि का मूल आधार केवल एक ही अद्वय ब्रह्म है।
दिशः च सर्वाः और सब दिशाएं भी काल और अंतरिक्ष की कोई भी सीमा भगवान की परिधि से बाहर नहीं है, संपूर्ण दसों दिशाएं आच्छादित हैं।
दृष्ट्वा देखकर दिव्य चक्षुओं के माध्यम से सत्य के साक्षात्कार का क्षण, जो साधक की दृष्टि में क्रांतिकारी परिवर्तन लाता है।
अद्भुतम् आश्चर्यजनक, विलक्षण ऐसा रूप जो मानव बुद्धि की कल्पना से परे हो और जिसके सौंदर्य व प्रचंडता दोनों विस्मयकारी हों।
रूपम् उग्रम् भयंकर, उग्र और प्रचंड रूप काल का महाप्रलयकारी रूप, जो अधर्म का नाश और सृष्टि के नियंत्रण का प्रतीक है।
तत् इदम् उस इस (रूप को) वर्तमान में अर्जुन द्वारा प्रत्यक्ष अनुभूत और दृश्यमान विराट स्वरूप की ओर संकेत।
लोकत्रयम् तीनों लोक (स्वर्ग, मर्च, पाताल) समस्त ब्रह्मांडीय तलों और चेतना के विभिन्न स्तरों का सामूहिक बोध।
प्रव्यथितम् अत्यंत व्यथित, भयभीत या कांपता हुआ जीवमात्र का अपने छोटे अहंकार के साथ उस विराट शक्ति के सामने विचलित और भयचकित होना।
महात्मन् हे महात्मन्! (हे महान आत्मा वाले भगवान) अर्जुन द्वारा भगवान की महत्ता, विशालता और सर्वोपरि सत्ता के प्रति संबोधन और विनीत भाव।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय की कथा महाभारत के युद्ध के आरंभिक क्षणों से जुड़ी हुई है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन ने अपने स्वजनों, गुरुओं और मित्रों को शत्रु पक्ष में खड़ा देखा, तो वे मोहग्रस्त होकर अपने गांडीव धनुष को रख बैठे और युद्ध करने से मना कर दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, कर्तव्य, आत्मा की अमरता और कर्मयोग का उपदेश दिया। अर्जुन के सभी संशयों का निवारण करने के पश्चात, अर्जुन की जिज्ञासा शांत नहीं हुई और उन्होंने भगवान के परम ऐश्वर्ययुक्त रूप के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की।

अर्जुन ने कहा—"यादृशं त्वत्त्मानं परमेश वंशीत तद्द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरम्।" (हे परमेश्वर! जैसा आप अपने को कहते हैं, मैं आपके उस ऐश्वर्ययुक्त रूप को देखना चाहता हूँ।) अर्जुन की इस निष्कपट और तीव्र जिज्ञासा को देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें साधारण नेत्रों के स्थान पर 'दिव्य दृष्टि' प्रदान की। इस दिव्य दृष्टि के मिलते ही सूतजी द्वारा वर्णित और वेद-पुराणों में गाए जाने वाले उस विराट् स्वरूप का प्रकटीकरण हुआ, जिसके हजार सिर, हजार आंखें और हजार पैर थे।

इस प्रसंग का वर्णन करते हुए व्यासजी ने महाभारत (भीष्म पर्व) में लिखा है कि वह रूप न तो कभी किसी ने पहले देखा था और न ही कोई उसकी कल्पना कर सकता था। सूर्य और चंद्रमा जिसके नेत्र थे, अग्नि जिसका मुख था, और जिसकी तेजस्विनी प्रभा से दसों दिशाएं जलने लगी थीं। उस विराट् रूप को देखकर केवल अर्जुन ही नहीं, बल्कि आकाश में विचरण करने वाले देवता, गंधर्व, सिद्ध और महर्षिगण भी भयभीत होकर हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। प्रस्तुत श्लोक इसी ऐतिहासिक और पराभौतिक संवाद का केंद्रीय बिंदु है, जहाँ अर्जुन भगवान के उग्र और प्रलयकारी स्वरूप को देखकर विचलित हो उठते हैं और उनकी महानता के आगे नतमस्तक होते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

1. मानसिक शांति और एकाग्रता

विश्वरूप दर्शन से संबंधित इन श्लोकों का मनन करने से मन के भीतर चल रहे व्यर्थ के संशय, भय और चिंताएं शांत होती हैं। यह चेतना को एक सुदृढ़ एकाग्रता प्रदान करता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विस्तार

भगवान के सर्वव्यापक स्वरूप का ध्यान करने से साधक के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है.

3. अहंकार का शमन और विनीत भाव

जब व्यक्ति तीनों लोकों को और संपूर्ण ब्रह्मांड को भगवान में व्याप्त देखता है, तो उसका व्यक्तिगत अहंकार स्वतः गल जाता है और जीवन में विनम्रता का उदय होता है।

4. कार्मिक शुद्धि और पापों का नाश

भगवद्गीता के इन पावन श्लोकों का नियमित पाठ और स्वाध्याय करने से चित्त की शुद्धि होती है, पुराने नकारात्मक कर्म संस्कारों का प्रभाव क्षीण होता है।

5. भय और असुरक्षा की भावना से मुक्ति

जो व्यक्ति यह जान लेता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड उसी एक महाशक्ति के नियंत्रण में है, उसके मन से मृत्यु, भविष्य और अज्ञात का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।

6. दिव्य कृपा और शरणागति की प्राप्ति

इस श्लोक के भाव को आत्मसात करने से भगवान के प्रति अनन्य भक्ति और 'शरणागत वत्सल' भाव जागृत होता है, जिससे साधक को भगवद्कृपा की अनुभूति होती है।

7. आध्यात्मिक जिज्ञासा की तृप्ति

यह श्लोक दार्शनिक रूप से यह समझाने में सहायक है कि संसार का वास्तविक स्वरूप क्या है, जिससे साधक मोह-माया के बंधनों से ऊपर उठकर सत्य की खोज करता है।

8. स्मरण शक्ति और बौद्धिक तीक्ष्णता

संस्कृत के इन क्लिष्ट और उच्च कोटि के श्लोकों का उच्चारण करने से वाणी शुद्ध होती है, मस्तिष्क की कार्यप्रणाली बेहतर होती है और बौद्धिक क्षमता बढ़ती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के हमारे विद्वान आचार्यों और संस्कृत भाषाविदों द्वारा इस आलेख को महर्षि वेद व्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता (भीष्म पर्व, महाभारत) तथा आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज एवं स्वामी गीतानंद जैसे महान आचार्यों की टीकाओं के आधार पर अत्यंत सावधानी और प्रामाणिकता के साथ तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का शुद्ध, वैज्ञानिक और दार्शनिक स्वरूप पहुंचाना है, बिना किसी अतिशयोक्ति के। प्रत्येक श्लोक के व्याकरण, पदच्छेद और आध्यात्मिक निहितार्थों को परंपरासम्मत विधियों द्वारा सत्यापित किया गया है, ताकि आधुनिक जिज्ञासुओं को वेदों और पुराणों का सटीक मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता के एकादश (11वें) अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट् 'विश्वरूप दर्शन' कराया था। इस अध्याय का नाम ही 'विश्वरूपदर्शन योग' है, जिसमें कुल 55 श्लोक हैं।

उत्तर: इस श्लोक का मुख्य संदेश परमात्मा की सर्वव्यापकता और उनके प्रचंड काल-स्वरूप का बोध कराना है। यह बताता है कि स्वर्ग से लेकर पृथ्वी तक और दसों दिशाओं में केवल और केवल वही एक परम शक्ति व्याप्त है, जिसके उग्र रूप को देखकर संपूर्ण ब्रह्मांड विचलित हो उठता है।

उत्तर: साधारण मानवीय नेत्रों से भगवान के इस अनंत और उग्र स्वरूप को देखना संभव नहीं था। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को विशेष 'दिव्य दृष्टि' (Divine Vision) प्रदान की थी, जिसके माध्यम से उन्होंने इस ब्रह्मांडीय रूप का साक्षात्कार किया।

उत्तर: इसके नियमित पाठ और मनन से मन का अहंकार समाप्त होता है, अज्ञात भय दूर होता है, चित्त में एकाग्रता बढ़ती है और भगवान के प्रति अनन्य शरणागति तथा भक्ति का भाव जागृत होता है।

उत्तर: हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के सभी श्लोक सार्वभौमिक हैं और कोई भी साधक या जिज्ञासु श्रद्धा और पवित्रता के साथ इनका पाठ, अध्ययन और मनन कर सकता है। इसके लिए किसी विशेष प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे महात्मन्, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का यह सम्पूर्ण अंतरिक्ष तथा सभी दिशाएँ आपके द्वारा ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत एवं उग्र रूप को देखकर तीनों लोक व्याकुल हो रहे हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् का विराट रूप समस्त सृष्टि में व्याप्त है और उसकी महिमा अपार है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 20 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 20/55 36% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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