विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 19

श्लोक १९ में अर्जुन भगवान् के अनंत रूप और पराक्रम का वर्णन करते हैं। Verse 19: Arjuna describes the Lord's infinite power and radiance.

संस्कृत श्लोक

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९॥

anādi-madhyāntam ananta-vīryam ananta-bāhuṃ śaśi-sūrya-netram | paśyāmi tvāṃ dīpta-hutāśa-vaktraṃ sva-tejasā viśvam idaṃ tapantam ||19||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अनादिमध्यान्तम्: जिसका न आदि, न मध्य, न अंत है; अनन्तवीर्यम्: अनंत पराक्रम वाले; अनन्तबाहुम्: अनंत भुजाओं वाले; शशिसूर्यनेत्रम्: चंद्र और सूर्य रूपी नेत्रों वाले; पश्यामि: देखता हूँ; त्वाम्: आपको; दीप्तहुताशवक्त्रम्: प्रज्वलित अग्नि के समान मुख वाले; स्वतेजसा: अपने तेज से; विश्वम्: जगत्; इदम्: इस; तपन्तम्: तपाते हुए।

हिंदी अनुवाद

मैं आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत पराक्रम वाले, अनंत भुजाओं वाले, चंद्र और सूर्य रूपी नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि के समान मुख वाले तथा अपने तेज से इस सम्पूर्ण जगत् को तपाते हुए देखता हूँ।

English Translation

I see You without beginning, middle, or end, of infinite power, with countless arms, having the sun and moon as Your eyes, with a face like blazing fire, consuming the universe with Your own radiance.

टीका / Commentary

विराट रूप के और भी विशाल गुणों का वर्णन।