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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 18

अध्याय 11 · श्लोक 18

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८॥

tvam akṣaraṃ paramaṃ veditavyaṃ tvam asya viśvasya paraṃ nidhānam | tvam avyayaḥ śāśvata-dharma-goptā sanātanas tvaṃ puruṣo mato me ||18||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

त्वम्: आप; अक्षरम्: अक्षर (अविनाशी); परमम्: परम; वेदितव्यम्: जानने योग्य; त्वम्: आप; अस्य: इस; विश्वस्य: विश्व के; परम्: परम; निधानम्: आधार; त्वम्: आप; अव्ययः: अविनाशी; शाश्वतधर्मगोप्ता: सनातन धर्म के रक्षक; सनातनः: सनातन; त्वम्: आप; पुरुषः: पुरुष; मतः: माने जाते हैं; मे: मेरे द्वारा।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

आप परम अक्षर (अविनाशी) हैं और जानने योग्य हैं; आप इस विश्व के परम आधार हैं; आप अविनाशी तथा सनातन धर्म के रक्षक हैं; आप सनातन पुरुष हैं – ऐसा मैं मानता हूँ।

English Translation

You are the imperishable, the supreme object of knowledge; You are the ultimate refuge of this universe; You are the inexhaustible protector of the eternal dharma; You are the eternal Purusha, I believe.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन भगवान् की स्तुति करते हुए उनके गुणों का वर्णन करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।