विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 17

श्लोक १७ में अर्जुन भगवान् के मुकुट, गदा, चक्र और तेज का वर्णन करते हैं। Verse 17: Arjuna describes the Lord's crown, mace, discus, and splendor.

संस्कृत श्लोक

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७॥

kirīṭinaṃ gadinaṃ cakriṇaṃ ca tejo-rāśiṃ sarvato dīptimantam | paśyāmi tvāṃ durnirīkṣyaṃ samantād dīptānalārka-dyutim aprameyam ||17||

पदच्छेद / शब्दार्थ

किरीटिनम्: मुकुट धारण किए हुए; गदिनम्: गदा धारण किए हुए; चक्रिणम्: चक्र धारण किए हुए; च: और; तेजोराशिम्: तेज के ढेर; सर्वतः: सब ओर; दीप्तिमन्तम्: दीप्तिमान; पश्यामि: देखता हूँ; त्वाम्: आपको; दुर्निरीक्ष्यम्: दुर्निरीक्ष्य (कठिनता से देखे जाने योग्य); समन्तात्: चारों ओर; दीप्त: प्रज्वलित; अनल: अग्नि; अर्क: सूर्य; द्युतिम्: कांति वाला; अप्रमेयम्: अप्रमेय (जिसका माप न हो)।

हिंदी अनुवाद

मैं आपको मुकुट धारण किए, गदा और चक्र धारण किए, तेज के ढेर के रूप में सब ओर दीप्तिमान देखता हूँ। आप चारों ओर से दुर्निरीक्ष्य हैं, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान कांति वाले और अप्रमेय हैं।

English Translation

I see You wearing a crown, wielding a mace and a discus, a mass of radiance shining on all sides, difficult to look at, with the effulgence of blazing fire and sun, immeasurable.

टीका / Commentary

अर्जुन भगवान् के आयुधों और तेज का वर्णन करते हैं।