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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 17

अध्याय 11 · श्लोक 17

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७॥

kirīṭinaṃ gadinaṃ cakriṇaṃ ca tejo-rāśiṃ sarvato dīptimantam | paśyāmi tvāṃ durnirīkṣyaṃ samantād dīptānalārka-dyutim aprameyam ||17||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

किरीटिनम्: मुकुट धारण किए हुए; गदिनम्: गदा धारण किए हुए; चक्रिणम्: चक्र धारण किए हुए; च: और; तेजोराशिम्: तेज के ढेर; सर्वतः: सब ओर; दीप्तिमन्तम्: दीप्तिमान; पश्यामि: देखता हूँ; त्वाम्: आपको; दुर्निरीक्ष्यम्: दुर्निरीक्ष्य (कठिनता से देखे जाने योग्य); समन्तात्: चारों ओर; दीप्त: प्रज्वलित; अनल: अग्नि; अर्क: सूर्य; द्युतिम्: कांति वाला; अप्रमेयम्: अप्रमेय (जिसका माप न हो)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मैं आपको मुकुट धारण किए, गदा और चक्र धारण किए, तेज के ढेर के रूप में सब ओर दीप्तिमान देखता हूँ। आप चारों ओर से दुर्निरीक्ष्य हैं, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान कांति वाले और अप्रमेय हैं।

English Translation

I see You wearing a crown, wielding a mace and a discus, a mass of radiance shining on all sides, difficult to look at, with the effulgence of blazing fire and sun, immeasurable.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन भगवान् के आयुधों और तेज का वर्णन करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।