विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 16
श्लोक १६ में अर्जुन भगवान् के अनंत रूपों का वर्णन करते हैं। Verse 16: Arjuna describes the infinite forms of the Lord.
संस्कृत श्लोक
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६॥
aneka-bāhūdara-vaktra-netraṃ paśyāmi tvāṃ sarvato 'nanta-rūpam | nāntaṃ na madhyaṃ na punas tavādiṃ paśyāmi viśveśvara viśva-rūpa ||16||
पदच्छेद / शब्दार्थ
अनेक: अनेक; बाहु: भुजाएँ; उदर: उदर; वक्त्र: मुख; नेत्रम्: नेत्र; पश्यामि: देखता हूँ; त्वाम्: आपको; सर्वतः: सब ओर; अनन्तरूपम्: अनंत रूपों वाला; न: नहीं; अन्तम्: अंत; न: नहीं; मध्यम्: मध्य; न: नहीं; पुनः: फिर; तव: आपका; आदिम्: आदि; पश्यामि: देखता हूँ; विश्वेश्वर: हे विश्वेश्वर; विश्वरूप: हे विश्वरूप।
हिंदी अनुवाद
हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, मैं आपको अनेक भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों से युक्त, सब ओर अनंत रूप धारण किए हुए देखता हूँ। मैं आपका न अंत देखता हूँ, न मध्य और न ही आदि।
English Translation
I see You with countless arms, bellies, faces, and eyes, possessing infinite forms on all sides. I see no end, no middle, and no beginning of You, O Lord of the universe, O Universal Form.
टीका / Commentary
अर्जुन भगवान् के विराट रूप की अनंतता का वर्णन करते हैं।