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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 16

अध्याय 11 · श्लोक 16

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६॥

aneka-bāhūdara-vaktra-netraṃ paśyāmi tvāṃ sarvato 'nanta-rūpam | nāntaṃ na madhyaṃ na punas tavādiṃ paśyāmi viśveśvara viśva-rūpa ||16||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अनेक: अनेक; बाहु: भुजाएँ; उदर: उदर; वक्त्र: मुख; नेत्रम्: नेत्र; पश्यामि: देखता हूँ; त्वाम्: आपको; सर्वतः: सब ओर; अनन्तरूपम्: अनंत रूपों वाला; न: नहीं; अन्तम्: अंत; न: नहीं; मध्यम्: मध्य; न: नहीं; पुनः: फिर; तव: आपका; आदिम्: आदि; पश्यामि: देखता हूँ; विश्वेश्वर: हे विश्वेश्वर; विश्वरूप: हे विश्वरूप।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, मैं आपको अनेक भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों से युक्त, सब ओर अनंत रूप धारण किए हुए देखता हूँ। मैं आपका न अंत देखता हूँ, न मध्य और न ही आदि।

English Translation

I see You with countless arms, bellies, faces, and eyes, possessing infinite forms on all sides. I see no end, no middle, and no beginning of You, O Lord of the universe, O Universal Form.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन भगवान् के विराट रूप की अनंतता का वर्णन करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।