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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 2

अध्याय 11 · श्लोक 2

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २॥

bhavāpyayau hi bhūtānāṃ śrutau vistaraśo mayā | tvattaḥ kamala-patrākṣa māhātmyam api cāvyayam ||2||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

भव: उत्पत्ति; अप्ययौ: प्रलय; हि: निश्चय ही; भूतानाम्: प्राणियों की; श्रुतौ: सुने गए; विस्तरशः: विस्तार से; मया: मेरे द्वारा; त्वत्तः: आपसे; कमलपत्राक्ष: कमल-नेत्र; माहात्म्यम्: महिमा; अपि: भी; च: और; अव्ययम्: अविनाशी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कमलनेत्र! मैंने आपसे सब प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय तथा आपकी अविनाशी महिमा का विस्तारपूर्वक श्रवण किया है।

English Translation

O lotus-eyed Krishna, I have heard from You in detail about the appearance and disappearance of all beings, and also about Your imperishable glory.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन अब विराट रूप देखने की इच्छा प्रकट करने से पूर्व, कृष्ण के पिछले उपदेशों का सारांश देते हैं और उनकी महिमा स्वीकार करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।