विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – श्लोक 2
श्लोक २ में अर्जुन कहते हैं कि उन्होंने कृष्ण से सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय के बारे में सुना। Verse 2: Arjuna acknowledges hearing about creation and dissolution.
संस्कृत श्लोक
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २॥
bhavāpyayau hi bhūtānāṃ śrutau vistaraśo mayā | tvattaḥ kamala-patrākṣa māhātmyam api cāvyayam ||2||
पदच्छेद / शब्दार्थ
भव: उत्पत्ति; अप्ययौ: प्रलय; हि: निश्चय ही; भूतानाम्: प्राणियों की; श्रुतौ: सुने गए; विस्तरशः: विस्तार से; मया: मेरे द्वारा; त्वत्तः: आपसे; कमलपत्राक्ष: कमल-नेत्र; माहात्म्यम्: महिमा; अपि: भी; च: और; अव्ययम्: अविनाशी।
हिंदी अनुवाद
हे कमलनेत्र! मैंने आपसे सब प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय तथा आपकी अविनाशी महिमा का विस्तारपूर्वक श्रवण किया है।
English Translation
O lotus-eyed Krishna, I have heard from You in detail about the appearance and disappearance of all beings, and also about Your imperishable glory.
टीका / Commentary
अर्जुन अब विराट रूप देखने की इच्छा प्रकट करने से पूर्व, कृष्ण के पिछले उपदेशों का सारांश देते हैं और उनकी महिमा स्वीकार करते हैं।