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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 1

अध्याय 11 · श्लोक 1

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अर्जुन उवाच । मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १॥

arjuna uvāca | mad-anugrahāya paramaṁ guhyam adhyātma-saṁjñitam | yat tvayoktaṁ vacas tena moho 'yaṁ vigato mama ||1||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अर्जुन: अर्जुन; उवाच: बोले; मत्: मुझ पर; अनुग्रहाय: कृपा करने के लिए; परमम्: परम; गुह्यम्: गोपनीय; अध्यात्मसंज्ञितम्: अध्यात्म कहा गया; यत्: जो; त्वया: आपके द्वारा; उक्तम्: कहा गया; वच: वचन; तेन: उससे; मोह: मोह; अयम्: यह; विगत: दूर हो गया; मम: मेरा।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अर्जुन बोले: आपने मुझ पर कृपा करके जो परम गोपनीय अध्यात्म-विषयक वचन कहे हैं, उनसे मेरा यह मोह दूर हो गया है।

English Translation

Arjuna said: By this statement of Yours about the most confidential spiritual knowledge, given to me out of compassion, my illusion is dispelled.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन भगवान् कृष्ण के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं कि उनके उपदेशों से उनका अज्ञान दूर हुआ। यह श्लोक पूर्व अध्यायों के ज्ञान की सार्थकता को दर्शाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।