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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 14

अध्याय 11 · श्लोक 14

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४॥

tataḥ sa vismayāviṣṭo hṛṣṭa-romā dhanañjayaḥ | praṇamya śirasā devaṃ kṛtāñjalir abhāṣata ||14||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

ततः: तब; स: वह; विस्मयाविष्ट: आश्चर्य से युक्त; हृष्टरोमा: रोमांचित; धनञ्जय: धनंजय (अर्जुन); प्रणम्य: प्रणाम करके; शिरसा: सिर से; देवम्: देव को; कृताञ्जलि: हाथ जोड़े हुए; अभाषत: बोले।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

तब आश्चर्यचकित और रोमांचित होकर धनंजय अर्जुन ने भगवान् को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोले।

English Translation

Then, struck with wonder, his hair standing on end, Arjuna bowed his head to the Lord and spoke with joined palms.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन की प्रतिक्रिया: आश्चर्य, रोमांच, और फिर स्तुति।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।