श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 14

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 44 मिनट का पठन 150 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
ततः
तब
स
वह
विस्मयाविष्ट
आश्चर्य से युक्त
हृष्टरोमा
रोमांचित
धनञ्जय
धनंजय (अर्जुन)
प्रणम्य
प्रणाम करके
शिरसा
सिर से
देवम्
देव को
कृताञ्जलि
हाथ जोड़े हुए
अभाषत
बोले।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

तब आश्चर्यचकित और रोमांचित होकर धनंजय अर्जुन ने भगवान् को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोले।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवद्गीता के एकादश अध्याय (विश्वरूपदर्शन योग) का अत्यंत पावन, दार्शनिक एवं प्रेरणादायी श्लोक - Bhaktilok.in विशेष प्रस्तुति

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्माण्डिक चेतना

सनातन धर्म के सर्वोच्च ग्रंथ श्रीमद्भागवतगीता के ग्यारहवें अध्याय, जिसे 'विश्वरूपदर्शन योग' के नाम से जाना जाता है, का यह चौदहवां श्लोक मानव चेतना के उस अद्भुत और दिव्य रूपांतरण का प्रतीक है जहाँ अज्ञान के अंधकार से घिरा हुआ पार्थ (अर्जुन) अनंत ब्रह्मांडीय चेतना के साक्षात दर्शन के पश्चात विस्मय, भक्ति और समर्पण के सागर में डूब जाता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम ऐश्वर्यशाली, असीम, सर्वव्यापी और तेजोमय विश्वरूप को अर्जुन के समक्ष प्रकट किया, तब अर्जुन की मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति का जो वर्णन इस श्लोक में मिलता है, वह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि हर उस साधु-पुरुषाभिलाषी जीव की आंतरिक यात्रा का दर्पण है जो ब्रह्म के विराट स्वरूप को अनुभव करता है।

वैदिक संस्कृति में 'विस्मय' या आश्चर्य केवल बौद्धिक कुतूहल नहीं है, अपितु यह उस परम विस्मृति को तोड़ने वाला हथौड़ा है जो जीव को भौतिक संसार में बांधकर रखती है। 'विस्मयाविष्टः' का अर्थ है उस परम आश्चर्य में पूरी तरह से तल्लीन हो जाना, जहाँ अपनी लघुता और परमात्मा की विशालता का बोध एक साथ जागृत होता है। 'हृष्टरोमा' अर्थात् रोमांचित होना, शरीर के रोम-रोम का पुलकित हो जाना, इस बात का प्रमाण है कि अर्जुन का अनुभव केवल मानसिक या वैचारिक नहीं था, बल्कि यह उसके भौतिक शरीर और सूक्ष्म तंत्रिका तंत्र तक को झकझोर देने वाला एक अतीन्द्रिय और आध्यात्मिक प्रकटीकरण था। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब मनुष्य अपनी सीमाओं को लांघकर उस असीम शक्ति के संपर्क में आता है, तो अहंकार स्वतः ही गल जाता है और उसकी जगह परम विनय, शिष्टाचार और शरणागति ले लेती है।

Bhaktilok.in के इस विशेष लेख में हम इसी गूढ़ श्लोक के माध्यम से यह समझने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार अर्जुन की यह प्रतिक्रिया हमारे दैनिक जीवन, साधना पद्धति और मानसिक संतुलन को सुदृढ़ कर सकती है। वेद, पुराणों और उपनिषदों की ऋचाओं के मर्म को आधार बनाते हुए, यह विवेचन पाठकों को भगवद्गीता के इस अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव की गहराई तक ले जाने के लिए पूरी निष्ठा और प्रामाणिक शास्त्रीय पद्धतियों के साथ तैयार किया गया है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

गीताजी के ग्यारहवें अध्याय (विश्वरूपदर्शन योग) का १४वां श्लोक

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।

प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४॥


उच्चारण विधि एवं पाठ निर्देश:

इस श्लोक का उच्चारण करते समय स्वरों की शुद्धता और मात्राओं का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 'ततः' में विसर्ग का उच्चारण स्पष्ट हो, 'विस्मयाविष्टः' में 'विस्मय' और 'आविष्टः' का दीर्घ संधि प्रभाव स्पष्ट सुनाई दे। 'हृष्टरोमा' बोलते समय आंतरिक उल्लास और श्रद्धा का भाव मन में होना चाहिए। पाठ करने से पूर्व मन को शांत कर भगवान श्रीकृष्ण के उस विराट रूप का मानसिक स्मरण करना चाहिए जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाहित है। प्रतिदिन प्रातः स्नान के पश्चात पवित्र मन से इस श्लोक का 11 या 21 बार जप करने से एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

नीचे दी गई तालिका में इस श्लोक के प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहरा आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ततः उसके पश्चात, इसके बाद यह शब्द काल और घटनाक्रम की निरंतरता को दर्शाता है; जब अर्जुन ने भगवान का विराट रूप देख लिया, उसके तुरंत बाद यह आंतरिक परिवर्तन हुआ।
सः वह यहाँ 'वह' से तात्पर्य साक्षात नर-नारायण के प्रतीक, पांडুपुत्र अर्जुन से है जो अब तक सखा भाव में थे, परंतु अब ऐश्वर्य भाव से परिपूर्ण हो रहे हैं।
विस्मयाविष्टः आश्चर्य से युक्त, विस्मय में डूबा हुआ सांसारिक बुद्धि से परे की घटना को देखकर जब तार्किक मन निःशब्द हो जाता है, उस अगाध आश्‍चर्य की स्थिति को विस्मयाविष्ट कहा गया है।
हृष्टरोमा जिसके शरीर के रोम खड़े हो गए हों, रोमांचित यह आंतरिक दिव्यता के स्पर्श का शारीरिक प्रमाण है। जब आत्मा परमात्मा के प्रचंड सत्य से रूबरू होती है, तो स्थूल देह भी स्पंदित हो उठती है।
धनंजयः धनंजय (अर्जुन का एक नाम, जिन्होंने दिशाओं को जीतकर धन जीता था) यह नाम स्मरण कराता है कि भले ही अर्जुन ने संपूर्ण संसार की ऐश्वर्य संपदा और दिशाओं को जीत लिया हो, किंतु परम ब्रह्म के आगे उनका अहंकार शून्य हो गया।
प्रणम्य प्रणाम करके, नमस्कार करके सिर झुकाना केवल शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह अपने अहम् (EGO), जिद्द और स्वतंत्र बौद्धिक अहंकार का परमात्मा के चरणों में पूर्ण समर्पण है।
शिरसा मस्तक से, सिर के द्वारा मस्तक शरीर का सबसे ऊपरी और अहंकारी अंग माना जाता है; जब मस्तक झुकता है, तो इसका अर्थ है कि बुद्धि अब दिव्यता के आधीन हो चुकी है।
देवम् देवता को, प्रकाशस्वरूप परमात्मा को 'देव' शब्द 'दिव्' धातु से बना है जिसका अर्थ है प्रकाशमान। जो समस्त ब्रह्मांड को अपनी ज्योति से प्रकाशित कर रहे हैं, ऐसे परमेश्वर को संबोधित किया गया है।
कृताञ्जलिः हाथ जोड़े हुए, प्रांजलि मुद्रा में दोनों हाथों को जोड़ना योग की वह मुद्रा है जहाँ इड़ा और पिಂಗಳा नाड़ियाँ तथा दाएं-बाएं पक्ष संतुलित होकर संपूर्ण समर्पण का भाव प्रकट करते हैं।
अभाषत कहने लगे, बोले अब अर्जुन की वाणी साधारण मित्रवत नहीं रही, बल्कि वह एक शुद्ध, पवित्र और स्तुतिपरक दिव्य वाणी में रूपांतरित हो चुकी है जो आगे के श्लोकों में प्रकट होती है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के ठीक आरंभ में, जब कुरुक्षेत्र की रणभूमि में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, अर्जुन घोर विषाद और मोह के वशीभूत होकर अपने शस्त्र त्याग चुके थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाई। इस महान ग्रंथ के शुरुआती अध्यायों में भगवान ने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग के विभिन्न आयामों को सरल और गहन रूप से समझाया। परंतु अर्जुन के मन में अभी भी जिज्ञासा थी—वे भगवान के उस परम ऐश्वर्यशाली रूप को प्रत्यक्ष देखना चाहते थे, जिसे वेदों और उपनिषदों में 'विराट् रूप' या 'विश्वस्वरूप' कहा गया है। अर्जुन की इस अदम्य और पवित्र जिजीविषा को शांत करने के लिए, भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें दिव्य चक्षु (दिव्य दृष्टि) प्रदान की।

जैसे ही वह दिव्य दृष्टि अर्जुन को प्राप्त हुई, उनके सामने संपूर्ण ब्रह्मांड का पर्दाफाश हो गया। उन्होंने देखा कि एक ही शरीर में अनंत सूर्य, चंद्र, अग्नि, समस्त लोक, देवता, ऋषि-मुनि, और यहाँ तक कि कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े कौरव पक्ष के सभी योद्धा (भीष्म, द्रोण, कर्ण आदि) काल के ग्रास बनते हुए भगवान के प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। यह दृश्य इतना विराट, भीषण और प्रचंड था कि सामान्य मानव नेत्रों या साधारण चेतना के लिए इसे सहन करना असंभव था। अर्जुन का यह विस्मय और रोमांच उसी असाधारण ब्रह्मांडीय अनुभव की तात्कालिक और स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी।

ऋषि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस अंश (भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के ११वें अध्याय) में यह प्रसंग इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि भगवान श्रीकृष्ण केवल द्वारका के साधारण राजा या सखा नहीं, बल्कि साक्षात परब्रह्म नारायण हैं। महर्षि व्यास ने इस श्लोक के माध्यम से यह संदेश दिया है कि जब जीव को अपने वास्तविक स्वरूप और सृष्टिकर्ता के विराट आयाम का बोध होता है, तो उसके भीतर का सारा संशय, भय और द्वंद्व समाप्त हो जाता है। वह अज्ञानी से ज्ञानी और साधारण मनुष्य से भक्त बन जाता है। इस ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि को स्मरण करते हुए जब कोई साधक इस श्लोक का पठन करता है, तो उसे महाभारतकालीन उस पवित्र रणभूमि की ऊर्जा और दिव्य सान्निध्य का अहसास होने लगता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस चौदहवें श्लोक का नियमित पठन, मनन और स्मरण करने से साधक के जीवन में अनेकों आध्यात्मिक, मानसिक और ऊर्जावान परिवर्तन आते हैं। यहाँ इसके प्रमुख लाभों को बिंदुवार प्रस्तुत किया गया है:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

आधुनिक जीवन की भागदौड़ और मानसिक तनाव के बीच इस श्लोक का पाठ मन को अगाध शांति प्रदान करता है। यह विचारों की उलझनों को शांत कर चित्त को एकाग्र बनाता है।

2. सकारात्मक और दिव्य औरा (Aura) का निर्माण

श्लोक के संस्कृत वर्णों और उनके उच्च कंपन से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें आसपास के वातावरण को शुद्ध करती हैं और शरीर के चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का रक्षात्मक आवरण बनाती हैं.

3. अहंकार और जिद्दीपन का शमन

जिस प्रकार अर्जुन ने अपना मस्तक झुकाकर 'कृत-अंजलि' मुद्रा अपनाई, उसी प्रकार नियमित अभ्यास से मनुष्य के भीतर का दंभ, अहंकार और अकारण क्रोध स्वतः ही गलने लगता है।

4. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

परमात्मा के विराट स्वरूप के प्रति श्रद्धा प्रकट करने से संचित कर्मों के बंधनों में शिथिलता आती है और साधक धीरे-धीरे निष्काम कर्म की ओर अग्रसर होता है।

5. भय और अनिश्चितता का निवारण

भविष्य की अनिश्चितता और अज्ञात भय से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए यह श्लोक संबल बनता है, क्योंकि यह सिखाता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड एक सर्वोच्च अनुशासित शक्ति के नियंत्रण में है।

6. भक्ति और शरणागति भाव की वृद्धि

यह श्लोक भक्त और भगवान के बीच के प्रेम को सुदृढ़ करता है। इसके माध्यम से साधक के हृदय में अनन्य भक्ति और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव जाग्रत होता है।

7. निर्णय लेने की क्षमता में सुधार

अर्जुन की तरह भम्रित और दुविधाग्रस्त अवस्था में जब कोई इस श्लोक के मर्म को समझता है, तो उसे अपने कर्तव्यों का पालन करने हेतु आंतरिक स्पष्टता और दूरदर्शिता प्राप्त होती है।

8. दिव्य कृपा की प्राप्ति

नियमित रूप से भगवद्गीता के अध्यायों और इन विशेष श्लोकों का पारायण करने वाले साधक पर भगवान श्रीकृष्ण की अहेतुक कृपा और आशीर्वाद सदैव बना रहता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस लेख को हमारे वरिष्ठ संस्कृत भाषाविदों, प्राचीन ग्रंथों के शोधकर्ताओं और वेदान्त आचार्यों की देखरेख में अत्यंत सावधानी और प्रामाणिकता के साथ तैयार किया गया है। श्रीमद्भागवतगीता के इस श्लोक की व्याख्या करते समय आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुजचार्य और आधुनिक संतों के टीका-ग्रंथों (जैसे श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप, गीताप्रेस गोरखपुर के संस्करण और व्यास रचित महाभारत के मूल संस्कृत श्लोक) को आधार बनाया गया है।

हमारा यह प्रयास है कि पाठकों तक सनातन संस्कृति का शुद्ध, मिलावट रहित और अद्यतन आध्यात्मिक ज्ञान पहुंचे, जो आधुनिक जीवनशैली में मानसिक शांति और आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सके। यदि आपको इस श्लोक के पाठ या अर्थ को समझने में किसी प्रकार का मार्गदर्शन चाहिए, तो आप हमारे अन्य लेखों और वेदान्त पाठमाला का अध्ययन कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

यह श्लोक श्रीमद्भागवतगीता के ग्यारहवें (11वें) अध्याय, जिसे 'विश्वरूपदर्शन योग' कहा जाता है, का चौदहवां (14वां) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपने असीम ब्रह्मांडीय स्वरूप के दर्शन कराए थे।

'धनंजय' का शाब्दिक अर्थ है वह व्यक्ति जिसने सभी दिशाओं को जीतकर धन या विजय प्राप्त की हो। महाभारत काल में अर्जुन ने राजसूय यज्ञ और अन्य अभियानों के दौरान विभिन्न राजाओं को पराजित कर भारी धन और यश अर्जित किया था, इसलिए उन्हें 'धनंजय' कहा गया। यहाँ इस नाम का उपयोग यह दर्शाने के लिए है कि सांसारिक विजय प्राप्त करने वाला महान योद्धा भी परमेश्वर के विराट रूप के आगे विनीत हो गया।

'हृष्टरोमा' का अर्थ है—रोमांचित हो जाना या शरीर के रोम-रोम का पुलक उठना। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, जब जीवात्मा को किसी दिव्य, अलौकिक या परमात्मा के प्रचंड सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव होता है, तो उसका स्थूल शरीर भी उस उच्च ऊर्जा के कंपन से स्पंदित हो उठता है, जिसे रोमांच या सात्विक भाव कहा जाता है।

इस श्लोक के नियमित पाठ और मनन से मन में व्याप्त अनावश्यक भय, चिंता और मानसिक तनाव दूर होते हैं। यह साधक में विनम्रता, एकाग्रता, और भगवान के प्रति अगाध श्रद्धा व शरणागति का भाव उत्पन्न करता है, जिससे जीवन के संघर्षों से निपटने की आंतरिक शक्ति मिलती है।

श्रीमद्भागवतगीता का प्रत्येक श्लोक सार्वभौमिक और मानवता के कल्याण के लिए है। इस श्लोक के पाठ या स्मरण के लिए किसी भी प्रकार की कठिन दीक्षा या औपचारिकता की आवश्यकता नहीं है। इसे कोई भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा, पवित्रता और निष्ठा के साथ अपने दैनिक जीवन में अपना सकता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

तब आश्चर्यचकित और रोमांचित होकर धनंजय अर्जुन ने भगवान् को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोले।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के दर्शन से भक्त का हृदय भावविभोर हो जाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 14 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 14/55 25% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!