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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 13

अध्याय 11 · श्लोक 13

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३॥

tatraika-sthaṃ jagat kṛtsnaṃ pravibhaktam anekadhā | apaśyad deva-devasya śarīre pāṇḍavas tadā ||13||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तत्र: वहाँ; एकस्थम्: एक स्थान पर स्थित; जगत्: जगत्; कृत्स्नम्: सम्पूर्ण; प्रविभक्तम्: विभक्त; अनेकधा: अनेक प्रकार से; अपश्यत्: देखा; देवदेवस्य: देवों के देव (कृष्ण) के; शरीरे: शरीर में; पाण्डव: पाण्डुपुत्र (अर्जुन); तदा: तब।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

तब पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस देवों के देव (कृष्ण) के शरीर में सम्पूर्ण जगत् को अनेक प्रकार से विभक्त होकर एक स्थान पर स्थित देखा।

English Translation

Then Arjuna, the son of Pandu, saw the entire universe, divided into many parts, situated in one place in the body of the God of gods.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन ने विराट रूप में सम्पूर्ण ब्रह्मांड को एक साथ देखा।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।