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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 12

अध्याय 11 · श्लोक 12

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२॥

divi sūrya-sahasrasya bhaved yugapad utthitā | yadi bhāḥ sadṛśī sā syād bhāsas tasya mahātmanaḥ ||12||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

दिवि: आकाश में; सूर्यसहस्रस्य: हजारों सूर्यों की; भवेत्: हो; युगपत्: एक साथ; उत्थिता: उठी हुई; यदि: यदि; भाः: प्रभा; सदृशी: समान; सा: वह; स्यात्: हो; भासः: प्रभा के; तस्य: उस; महात्मनः: महात्मा (विराट रूप) की।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यदि आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदय हो जाएँ, तो उनकी प्रभा कहीं उस महात्मा (विराट रूप) की प्रभा के समान हो सकती है।

English Translation

If the splendor of thousands of suns were to blaze forth simultaneously in the sky, that might resemble the splendor of that exalted Being.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

विराट रूप की अद्वितीय चमक का वर्णन।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।