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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 11

अध्याय 11 · श्लोक 11

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११॥

divya-mālyāmbara-dharaṃ divya-gandhānulepanam | sarvāścarya-mayaṃ devam anantaṃ viśvato-mukham ||11||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

दिव्य: दिव्य; माल्य: मालाएँ; अम्बर: वस्त्र; धरम्: धारण किए हुए; दिव्य: दिव्य; गन्ध: गंध; अनुलेपनम्: अनुलेपन (चंदन आदि) वाला; सर्व: सब; आश्चर्यमयम्: आश्चर्यमय; देवम्: देव; अनन्तम्: अनंत; विश्वतोमुखम्: सब ओर मुख वाला।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

वह दिव्य मालाओं और वस्त्रों से युक्त, दिव्य गंध और चंदन से विभूषित, सब प्रकार से आश्चर्यमय, अनंत और सब ओर मुख वाला देव था।

English Translation

Wearing divine garlands and garments, anointed with divine unguents, the all-wonderful, resplendent, infinite, and all-facing Lord.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

विराट रूप के और अधिक गुणों का वर्णन।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।