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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 · श्लोक 10

अध्याय 11 · श्लोक 10

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १०॥

aneka-vaktra-nayanam anekādbhuta-darśanam | aneka-divyābharaṇaṃ divyānekodyatāyudham ||10||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अनेक: अनेक; वक्त्र: मुख; नयनम्: नेत्रों वाला; अनेक: अनेक; अद्भुत: अद्भुत; दर्शनम्: दर्शन वाला; अनेक: अनेक; दिव्य: दिव्य; आभरणम्: आभूषणों वाला; दिव्य: दिव्य; अनेक: अनेक; उद्यत: उठाए हुए; आयुधम्: शस्त्रों वाला।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

उस विराट रूप के अनेक मुख और नेत्र थे, अनेक अद्भुत दृश्य थे, अनेक दिव्य आभूषण थे और अनेक दिव्य शस्त्र उठे हुए थे।

English Translation

(Arjuna saw) the Universal Form with many mouths and eyes, and many wonderful sights, with many divine ornaments, and many divine weapons upraised.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन द्वारा देखे गए विराट रूप का वर्णन प्रारंभ होता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।