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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · श्लोक 20

अध्याय 3 · श्लोक 20

कर्म योग (Karma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः | लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ||२०||

karmaṇaiva hi saṃsiddhim āsthitā janakādayaḥ | lokasaṅgraham evāpi sampaśyan kartum arhasi ||20||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कर्मणा: कर्म से; एव: ही; हि: निश्चय ही; संसिद्धिम्: सिद्धि को; आस्थिता: प्राप्त हुए; जनकादय: जनक आदि; लोकसंग्रहम्: लोकसंग्रह (लोगों के कल्याण); एव: ही; अपि: भी; सम्पश्यन्: देखते हुए; कर्तुम्: करने के लिए; अर्हसि: तू योग्य है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जनक आदि राजर्षि भी कर्म द्वारा ही सिद्धि को प्राप्त हुए थे। तू भी लोकसंग्रह (लोगों के कल्याण) को देखते हुए कर्म करने को योग्य है।

English Translation

Janaka and others attained perfection through action alone. You should also perform your duty with a view to guide the people (loka-saṅgraha).

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान अब उदाहरण देते हैं – राजा जनक जैसे ज्ञानी भी कर्म करते थे। इसलिए अर्जुन को भी लोककल्याण के लिए कर्म करना चाहिए, भले ही वह स्वयं मुक्त क्यों न हो। The Lord gives examples – even enlightened kings like Janaka performed action. Therefore Arjuna should also act for the welfare of the world, even if he himself is liberated.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।