रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
प्रेतान् समभिवीक्ष्यापि रामायणमिदं पठेत् । तेऽपि यान्ति परं स्थानं पितरो हृष्टमानसाः ॥
हिंदी अनुवाद
पितरों को देखकर भी यदि यह रामायण पढ़ा जाए, तो वे पितर भी प्रसन्न मन से परम स्थान को प्राप्त होते हैं।
अर्थ / व्याख्या
रामायण पाठ से पितरों की मुक्ति और उन्नति।
टिप्पणी
यह श्लोक पितरों (पूर्वजों) के कल्याण के लिए रामायण पाठ का महत्त्व बताता है। जब कोई व्यक्ति पितरों को देखकर (उनके उद्देश्य से) रामायण का पाठ करता है, तो वे पितर भी प्रसन्न होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। यह श्राद्ध-तर्पण आदि कर्मों के समान ही पितृ-उद्धार का साधन है।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक ३९ ॥
तेऽपि यान्ति परं स्थानं पितरो हृष्टमानसाः ॥
te'pi yānti paraṃ sthānaṃ pitaro hṛṣṭamānasāḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : पितरों को देखकर भी यदि यह रामायण पढ़ा जाए, तो वे पितर भी प्रसन्न मन से परम स्थान को प्राप्त होते हैं।
🔹 English Translation : Even after seeing the departed ancestors, if one recites this Ramayana, those ancestors too, with joyful minds, attain the supreme abode.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| प्रेतान् | संज्ञा, पुल्लिंग, द्वितीया बहुवचन | पितरों को, प्रेतों को |
| समभिवीक्ष्य | ल्यबन्त अव्यय (सम् + अभि + वीक्ष् धातु) | देखकर, सामने पाकर (उनके उद्देश्य से) |
| अपि | अव्यय | भी |
| रामायणम् | संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | रामायण |
| इदम् | सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | इस |
| पठेत् | क्रिया, विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (पठ् धातु) | पढ़े |
| ते | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | वे |
| अपि | अव्यय | भी |
| यान्ति | क्रिया, लट्लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन (या धातु) | जाते हैं |
| परम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | परम, उत्तम |
| स्थानम् | संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | स्थान को |
| पितरः | संज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | पितर |
| हृष्टमानसाः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | प्रसन्न मन वाले |
📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी
इस श्लोक में पितरों के कल्याण हेतु रामायण पाठ की महिमा गाई गई है। "समभिवीक्ष्य" का अर्थ है उन्हें ध्यान में रखकर, उनके समक्ष या उनके निमित्त। ऐसा करने से पितर प्रसन्न होते हैं और परम धाम को प्राप्त होते हैं। यह रामायण की सार्वभौमिक हितकारिता को प्रदर्शित करता है।