संस्कृत श्लोक

रामायणमिदं काव्यं पठता यत्समाप्यते । तस्य पुण्यफलं यच्च ब्रह्मलोके न संशयः ॥

हिंदी अनुवाद

इस रामायण काव्य को पढ़ने वाला जब इसे समाप्त करता है, तो उसे जो पुण्य फल मिलता है, वह ब्रह्मलोक की प्राप्ति है, इसमें संदेह नहीं है।

अर्थ / व्याख्या

रामायण के सम्पूर्ण पाठ का फल ब्रह्मलोक की प्राप्ति है, इसमें कोई संदेह नहीं।

टिप्पणी

यह श्लोक दूसरे सर्ग का अन्तिम श्लोक है। यह रामायण के सम्पूर्ण पाठ के फल की घोषणा करता है – ब्रह्मलोक की प्राप्ति। "न संशयः" कहकर इस फल की निश्चितता बताई गई है। यह श्लोक रामायण पाठ के महत्त्व को स्थापित करते हुए सर्ग का समापन करता है।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक ४० ॥

रामायणमिदं काव्यं पठता यत्समाप्यते ।
तस्य पुण्यफलं यच्च ब्रह्मलोके न संशयः ॥
rāmāyaṇamidaṃ kāvyaṃ paṭhatā yatsamāpyate |
tasya puṇyaphalaṃ yacca brahmaloke na saṃśayaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : इस रामायण काव्य को पढ़ने वाला जब इसे समाप्त करता है, तो उसे जो पुण्य फल मिलता है, वह ब्रह्मलोक की प्राप्ति है, इसमें संदेह नहीं है।

🔹 English Translation : When this Ramayana poetry is completed by one who reads it, the fruit of merit that accrues to him is (attainment of) the world of Brahma – there is no doubt.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
रामायणम्संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनरामायण को
इदम्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनइस
काव्यम्संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनकाव्य को
पठतावर्तमान कृदंत, पुल्लिंग, तृतीया एकवचनपढ़ने वाले द्वारा
यत्अव्ययजब
समाप्यतेक्रिया, कर्मणि प्रयोग, लट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (सम् + आप् धातु)समाप्त किया जाता है
तस्यसर्वनाम, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचनउसके
पुण्यफलम्संज्ञा, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनपुण्य का फल
यत्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनजो
अव्ययऔर
ब्रह्मलोकेसंज्ञा, पुल्लिंग, सप्तमी एकवचनब्रह्मलोक में (अर्थात ब्रह्मलोक की प्राप्ति)
अव्ययनहीं
संशयःसंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनसंशय, संदेह

📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी

यह श्लोक दूसरे सर्ग का समापन करता है और रामायण पाठ के पूर्ण फल की घोषणा करता है। "पठता समाप्यते" – पाठ करते हुए जब कोई रामायण को समाप्त करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। यह फल असंदिग्ध है। इस प्रकार वाल्मीकि रामायण के अध्ययन को मोक्ष का साधन बताते हैं। यह श्लोक पाठकों को रामायण का सम्पूर्ण पाठ करने के लिए प्रेरित करता है।

इसके साथ ही बालकाण्ड का दूसरा सर्ग समाप्त होता है। अगले सर्ग में रामकथा का विस्तार से वर्णन आरम्भ होगा।