संस्कृत श्लोक

य इदं कीर्तयेद्विद्वान् ब्राह्मणः शृणुयादपि । सर्वपापैः प्रमुच्यते रामलोके महीयते ॥

हिंदी अनुवाद

जो विद्वान् ब्राह्मण इसका कीर्तन करता है और (दूसरे) सुनते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर रामलोक में पूजित होते हैं।

अर्थ / व्याख्या

रामायण के कीर्तन और श्रवण से पापमुक्ति और रामलोक की प्राप्ति होती है।

टिप्पणी

इस श्लोक में रामायण के कीर्तन (पाठ या गायन) करने वाले विद्वान् ब्राह्मण और उसे सुनने वाले श्रोता दोनों के लिए फल बताया गया है। दोनों ही सभी पापों से मुक्त होकर रामलोक में प्रतिष्ठित होते हैं। पिछले श्लोक में ब्रह्मलोक बताया था, यहाँ रामलोक कहा गया है – यह रामभक्ति की महिमा को दर्शाता है।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक ३७ ॥

य इदं कीर्तयेद्विद्वान् ब्राह्मणः शृणुयादपि ।
सर्वपापैः प्रमुच्यते रामलोके महीयते ॥
ya idaṃ kīrtayedvidvān brāhmaṇaḥ śṛṇuyādapi |
sarvapāpaiḥ pramucyate rāmaloke mahīyate ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : जो विद्वान् ब्राह्मण इसका कीर्तन करता है और (दूसरे) सुनते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर रामलोक में पूजित होते हैं।

🔹 English Translation : The learned Brahmana who recites this, and (those who) listen to it, are freed from all sins and are glorified in the world of Rama.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
यःसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनजो
इदम्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनइस (रामायण) का
कीर्तयेत्क्रिया, विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (कीर्त् धातु)कीर्तन करे, गाए, बोले
विद्वान्विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनविद्वान्, ज्ञानी
ब्राह्मणःसंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनब्राह्मण
शृणुयात्क्रिया, विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (श्रु धातु)सुने
अपिअव्ययभी
सर्वपापैःसंज्ञा, नपुंसकलिंग, पञ्चमी बहुवचनसब पापों से
प्रमुच्यतेक्रिया, कर्मणि प्रयोग, लट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (प्र + मुच् धातु)मुक्त हो जाता है
रामलोकेसंज्ञा, पुल्लिंग, सप्तमी एकवचनरामलोक में
महीयतेक्रिया, कर्मणि प्रयोग, लट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचनपूजित होता है

📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी

इस श्लोक में "कीर्तन" शब्द विशेष महत्त्व रखता है – इसका अर्थ है रामायण का सस्वर पाठ या गान। ऐसा करने वाला विद्वान् ब्राह्मण और उसे सुनने वाला श्रोता दोनों ही पापमुक्त होकर रामलोक (राम के धाम) को प्राप्त होते हैं। पिछले श्लोक में ब्रह्मलोक का उल्लेख था, यहाँ रामलोक कहकर राम की सर्वोच्चता स्थापित की गई है। रामायण की महिमा अपरम्पार है।