रामायण के लिए दिव्य मार्गदर्शन – श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
शृण्वन् रामायणं काव्यं पठन् यश्चाभिनन्दति । स सर्वपापनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥
हिंदी अनुवाद
जो मनुष्य इस रामायण काव्य को सुनता है, पढ़ता है और आदर करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पूजित होता है।
अर्थ / व्याख्या
रामायण के श्रवण, पठन और सम्मान का फल – पापमुक्ति और ब्रह्मलोक की प्राप्ति।
टिप्पणी
यह श्लोक रामायण के पाठ और श्रवण के महत्त्व को बताता है। "शृण्वन्" (सुनना), "पठन्" (पढ़ना), और "अभिनन्दति" (आदर करना) – ये तीन क्रियाएँ रामायण के प्रति श्रद्धा के विभिन्न रूप हैं। ऐसा व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। यह फल श्रवण-पाठ की महिमा को दर्शाता है।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – सर्ग २ – श्लोक ३६ ॥
स सर्वपापनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥
sa sarvapāpanirmukto brahmaloke mahīyate ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : जो मनुष्य इस रामायण काव्य को सुनता है, पढ़ता है और आदर करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पूजित होता है।
🔹 English Translation : He who listens to this Ramayana poetry, reads it, and honours it, being freed from all sins, is glorified in the world of Brahma.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| शृण्वन् | वर्तमान कृदंत, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (श्रु धातु) | सुनता हुआ |
| रामायणम् | संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | रामायण को |
| काव्यम् | संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | काव्य को |
| पठन् | वर्तमान कृदंत, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (पठ् धातु) | पढ़ता हुआ |
| यः | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | जो |
| च | अव्यय | और |
| अभिनन्दति | क्रिया, लट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (अभि + नन्द् धातु) | आदर करता है, सत्कार करता है |
| सः | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वह |
| सर्वपापनिर्मुक्तः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | सब पापों से मुक्त |
| ब्रह्मलोके | संज्ञा, पुल्लिंग, सप्तमी एकवचन | ब्रह्मलोक में |
| महीयते | क्रिया, कर्मणि प्रयोग, लट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (मह् धातु) | पूजित होता है, सम्मानित होता है |
📖 विशेष अर्थ एवं टिप्पणी
रामायण के पाठ और श्रवण को अत्यन्त फलदायी बताया गया है। "अभिनन्दति" का अर्थ केवल पढ़ना नहीं, बल्कि श्रद्धापूर्वक ग्रहण करना, उसका आदर करना है। ऐसे व्यक्ति को "सर्वपापनिर्मुक्तः" कहा गया है – अर्थात उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। फलस्वरूप वह ब्रह्मलोक में "महीयते" – पूजित, प्रतिष्ठित होता है। यह श्लोक रामायण की आध्यात्मिक शक्ति को रेखांकित करता है।